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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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यदि वह इस ओर से उदासीन हो (और आज्ञा करने पर ही सेवा करने को राजी हो तो) उससे न कराकर स्वयं करे।यदि वह भगवत- सेवा के विरुद्ध हो, तो एकदम घर को त्यागकर एकान्त में ही जाकर भगवत-पूजा-अर्चा करनी चाहिये। (जाके प्रिय न राम बैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम सनेही।।) जो विष्णुपरागमुख हों उनके त्याग ने में किसी भी प्रकार का दूषण नहीं है। (संसारी भोगों की इच्छा से तो किसी से किसी प्रकार का सम्बन्ध रखना ही नहीं चाहिए।)
अनुकूलस्य संकल्पः प्रतिकूलविसर्जनम्।
रक्षिष्यतीति विश्वासो भर्तृत्वे वरणे यथा।।
आत्मनैवेद्यकार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः।
भगवत-सेवा में जो अनुकूल पड़े उसी का चिन्तन करना और जो भगवत-सेवा में विघा तक हो उनका सर्वथा त्याग करना। जिस प्रकार पतिव्रता स्त्री को इस बात का पूर्ण विश्वास होता है कि जिसने मेरा एक बार अग्नि के सम्मुख पाणिग्रहण किया है।वह मेरी अवश्य ही रक्षा करेगा, उसी प्रकार श्रीकृष्ण पर भरोसा रखना कि वे हमारी अवश्य ही रक्षा करेंगे। भगवान को आत्म निवेदन करने पर उनके प्रति भारी दीनता रखना यही छः प्रकार की शरणागति है।
फिर से स्पष्ट समझिये-
1. (सर्वोत्तम) गृहत्याग, असमर्थावस्था में कृष्णप्रीत्यर्थ घर में ही रहकर भगवत-सेवारूपी कर्मों का करना।
2. सर्वसंगपरित्याग, असमर्थ होने पर साधु-संग करना।
3. भगवत-सेवा के अनुकूल भाव और पदार्थों का ग्रहण, प्रतिकूलों का परित्याग।
4. यदि परिवार अनुकूल हो तो उसमें रहकर, नही तो उसका परित्याग करके एकान्तभाव से भगवत-सेवा-पूजा करना।
5. प्रभु में दृढ़ विश्वास।
6. आत्मनिवेदनपूर्वक गुण और दीनता धारण करना।
कितने उच्च और सर्वसम्मत सिद्धान्त हैं। इतना स्पष्ट करने पर भी कोई शंका करे और अपनी बात को ही पुष्ट करके त्याग की आड़ में उम्र भर विषयों को भोगने का समर्थन करे तो उसके लिये क्या उपाय है। बस, भगवान के शब्दों में हम यही कह सकते हैं 'मम माया दुरत्यया' मेरी माया बड़ी कठिन है।
इस प्रकार श्री चैतन्य के समकालीन ही होकर गोकुल में रहकर भगवान वल्लभाचार्य ने बालकृष्ण भगवान की पूजा-पद्धति का प्रचार किया। इनके बालकृष्ण भगवान के प्रति बड़े ही अलौकिक व्यवहार होते हैं। इनकी मूर्तियाँ बहुत ही छोटी होती हैं और दिन में अनेकों बार भोग लगता है। जिस प्रकार उजाड़ वृन्दावन को नगर बनाने का श्रेय गौर-भक्तों को प्राप्त है उसी प्रकार उजाड़ हुई गोकुल-भूमि को फिर से बसाने का श्रेय गोकुलिया गोसाँइयों को है।महाप्रभु वल्लभाचार्य ने अरैल में रहकर कई ग्रन्थ बनाये थे। जिन दिनों महाप्रभु गौरांग देव रूप-अनूप आदि के सहित प्रयाग में ठहरे हुए थे तब भगवान वल्लभाचार्य अरैल में ही विराजमान थे। महाप्रभु के भक्ति-भाव की प्रशंसा सुनकर वे उनसे मिलने स्वयं आये थे।
महाप्रभु गौरांगदेव अपने सुमधुर संकीर्तन और उद्दण्ड नृत्य से प्रयागवासी नर-नारियों को पावन और प्रसन्न बनाते हुए कुछ काल तक त्रिवेणीतट के समीप ही रहे। वहाँ जब अधिक भीड़-भाड़ होने लगी, तब आप एकान्त में रहने की इच्छा से दारागंज के समीप दशाश्वमेध घाट के पास आकर रहने लगे।
प्रभु की प्रसिद्धि प्रयाग के प्रायः सभी प्रतिष्ठित पण्डितों और धनीमानी सज्जनों के कानों तक पहुँच गयी थी, अतः बहुत-से लोग प्रभु के दर्शन और संकीर्तन देखने की इच्छा से उनके समीप आने लगे।
भगवान वल्लभाचार्य ने भी महाप्रभु की प्रशंसा सुनी कि एक गौड़ देशीय युवक संन्यासी अपने भक्तिभावमय संकीर्तन और नृत्य से दर्शकों के मन को चुम्बक की तरह अपनी ओर खींच लेते हैं, तब उनकी भी प्रभु-दर्शनों की इच्छा हुई। ऐसे कृष्ण-भक्त महापुरुष के दर्शनों के लिये आये। आते ही उन्होंने संन्यासी समझकर महाप्रभु के चरणों में प्रणाम किया और एक ओर चुपचाप बैठ गये।
महाप्रभु ने भी इनकी ख्याति पहले से ही सुन रखी थी। जब उन्हें पता चला कि ये ही आचार्यशिरोमणि श्रीमद्वल्लभ भट्ट हैं, तब तो वे इनसे लिपट गये और प्रेमालिंगन करते हुए इनके पाण्डित्य तथा प्रभाव की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।तब महाप्रभु ने अपने पास में बैठे हुए रूप और अनूप-इन दोनों भाइयों का आचार्य से परिचय कराया। इन दोनों भाइयों का परिचय पाते ही आचार्य इन्हें आलिंगन करने के लिये इनकी ओर बढ़े। आचार्य को अपनी ओर आते देखकर ये दोनों भाई अत्यन्त ही संकोच के साथ पीछे हटते हुए दीनता के साथ कहने लगे- 'भगवन! आप हमें स्पर्श न कीजिये, हम ब्राह्मण-कुल में उत्पन्न होने पर भी यवनों के संसर्ग से यवन-प्रायः बन गये हैं। हमारे सभी आचार-व्यवहार अब तक यवनों के-से ही रहे हैं। आप आचार्य हैं, कुलीन ब्राह्मण हैं, पण्डित हैं, लोकपूज्य हैं, हम आपके स्पर्श करने योग्य नहीं हैं- इतना कहते-कहते ये दोनों भाई दूर से ही लेटकर आचार्य-चरणों में प्रणाम करने लगे।
आचार्य इनकी इतनी भारी शालीनता, नम्रता और दीनता को देखकर आश्चर्यचकित हो गये और उसी समय श्रीमद्भागवत के 'अहो तब श्वपतोअतो गरीयान' इस श्लोक को गायन करते हुए जल्दी से उनकी ओर दौड़े और उनका प्रेम पूर्वक आलिंगन करते हुए उनके भक्तिभाव की प्रशंसा करने लगे। इसके अनन्तर आचार्य ने महाप्रभु से अपने घर पधारकर भिक्षा करने की प्रार्थना की।प्रभु ने अपने सभी साथियों के सहित आचार्य का निमंत्रण स्वीकार किया और वे अपने सभी भक्तों को साथ लेकर आचार्य के वासस्थान अरैल के लिये चले। यमुना जी को पार करके अरैल के लिये जाना होता है, इसलिये श्री मद्वल्लभाचार्य जी ने उसी समय एक सुन्दर-सी नौका मंगायी और उस पर प्रभु के सभी भक्तों के सहित प्रभु को बिठाकर आप एक ओर बैठ गये। श्री यमुना के मेघवर्ण के श्याम रंग वाले सुन्दर सलिल को देखते ही भावावेश में आकर नौका पर ही प्रभु नृत्य करने लगे।
नौका डगमग-करने लगी। सभी भक्त भयभीत हो उठे, किन्तु महाप्रभु अपने भाव को संवरण करने में समर्थ न हो सके, वे नृत्य करते-करते प्रेम में उन्मत्त होकर एकदम बीच यमुना जी की तीक्ष्ण धारा में कूद पड़े। नाव में चारों ओर से हाहाकार मच गया।
महाप्रभु का सुवर्ण के समान कान्तियुक्त शरीर यमुना जी के नीले रंग के जल में उछलता और डूबता बड़ा ही भला मालूम होने लगा। महाप्रभु यमुना जी के प्रवाह में बहने लगे। उसी समय मल्लाह जल में कूद पड़े और प्रभु को जिस किसी भाँति पकड़कर नाव पर चढ़ाया। सभी उस पार अरैल पहुँचे।
क्रमश:
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