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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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इन उत्तरों को सुनकर प्रभु प्रेम में उन्मत्त होकर ऊपर को उछलने लगे और उछलते-उछलते उपाध्याय का आलिंगन करते हुए आप श्री माधवेन्द्रपुरी महाराज के इस श्लोक को पढ़ने लगे-

श्याममेव परं रूपं पुरी मधुपुरी वरा।
वयः कैशोरकं ध्येयमाद्य एव परो रसः।
अर्थात-
रूपों में श्याम रूप ही सर्वश्रेष्ठ रूप हैं, पुरियों में मधुपुरी ही सर्वश्रेष्ठ पुरी है, ध्येयों में श्रीकृष्ण की किशोरावस्था ही सर्वोत्तम ध्येय है और रसों में श्रृंगाररस ही सर्वोत्कृष्ट रस है।

इस प्रकार प्रभु और उपाध्याय के प्रश्नोंत्तरों को सुनकर उपस्थित सभी पुरुषों को बड़ी भारी प्रसन्नता हुई। सायंकाल का समय सन्निकट आ पहुँचा। प्रभु ने आचार्य से लौटने की आज्ञा मांगी। इस पर ग्रामवासी अन्य ब्राह्मण भी प्रभु के निमंत्रण का आग्रह करने लगे। तब आचार्य ने कहा- 'भाई! इन्हें यहाँ रखना मैं उचित नहीं समझता। ये प्रेम में विभोर होकर यमुना जी में कूद पड़ते हैं। यहाँ से यमुना जी के सदा दर्शन होते रहते हैं, इसलिये मैं जहाँ से इन्हें लाया हूँ, वहीं पहुँचा आऊँगा, तब फिर जिसकी इच्छा हो, इन्हें वह ले आवे।'
आचार्य की बात सुनकर सभी चुप हो गये। आचार्य ने अपनी स्त्री, बच्चे तथा परिवार के सभी आदमियों के सहित प्रभु की अभ्यर्चना की और उन्हें नाव पर बिठाकर दशाश्वमेध घाट पर पहुँचा आये।

 रूप की विदाई और प्रभु का काशी-आगमन….

प्रयाग में अपने भाई अनूप के सहित श्रीरूप दस दिनों तक प्रभु के चरण-कमलों के समीप रहे। ये विद्वान थे, भावुक थे, मेधावी थे, आस्तिक थे और थे प्रेमावतार चैतन्यदेव के परम कृपापात्र। फिर भला, इनका कल्याण होने में सन्देह ही क्या था। ये तो पहले से ही कल्याणस्वरूप थे, एक बार जिनके ऊपर गुरुचरणों की कृपा हो चुकी हो, वह फिर इस नश्वर जगत के क्षणिक और अनित्य भोगों में सुखानुभव कर ही कैसे सकता है? हंस हो जाने पर फिर वह कौए के भोजन का स्पर्श क्यों करेगा? गुरु कृपा से क्या नहीं हो सकता? यदि सदगुरु की एक बार भी कृपा हो जाये तो फिर चाहे वह पुरुष कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो उसका संसार-बन्धन बात-की-बात में छिन्न-भिन्न हो जायेगा और वह बन्धन मुक्त होकर गुरु की परम कृपा का अधिकारी बन जायेगा। सदगुरु ही ईश्वर हैं, ब्रह्म के साकार स्वरूप का ही नाम गुरु है। हाड़-मांस का पुतला गुरु हो ही नहीं सकता। सर्वशक्तिमान का पद अल्पज्ञ जीव को प्राप्त हो ही कैसे सकता है? श्री रूप की दृष्टि में चैतन्यदेव हाड़-मांस के शरीरधारी जीव नहीं थे। वे तो उनके लिये प्रेम के साकार स्वरूप थे, सविशेष ब्रह्म थे। उन्होंने महाप्रभु को अवतारी सिद्ध करने की चेष्टा करते कि श्रीचैतन्य अवतार या अवतारी हैं।

लोग कुछ भी समझें, उनके लिये तो श्री चैतन्य ही श्रीकृष्ण  हैं। वास्तव में यह बात सत्य ही है। जहाँ भेदबुद्धि है वहीं इस बात का आग्रह किया जाता है कि ये ऐसे नहीं ऐसे हैं। श्री रूप की दृष्टि में भेद-भाव नहीं था तभी तो वे 'भक्तिरसामृतसिन्धु' के मंगलाचरण में लिखते हैं-

हृदि यस्य प्रेरणया प्रवर्तितोऽहं वराकरूपोऽपि।
तस्य हरेः पदकमलं वन्दे चैतन्यदेवस्य।
अर्थात-
जिन्होंने सामान्य कंगालरूप मुझ रूप के हृदय में भक्तिग्रंथ लिखने की प्रेरणा की उन्हीं श्रीहरिरूप श्रीचैतन्य-चरण-कमलों की मैं वन्दना करता हूँ।

इन दस दिनों में ही प्रयाग में रहकर मेधावी श्रीरूप ने प्रभु से भक्ति के अत्यन्त गूढ़ रहस्य को समझ लिया और उसी का आपने अपने अनेकों ग्रन्थों में वर्णन किया है। महाप्रभु इनके हृदय की सच्ची लगन को जानते थे, इसलिये इन्हें वैराग्य का उपदेश करते हुए कहने लगे- 'रूप! देखो, यह संसार विषय भोगों में कैसा पागल बना हुआ है। पद, प्रतिष्ठा, पैसा, पुत्र, परिवार तथा प्रेम-पदार्थों की प्राप्ति की चिन्ता में ही यह अमूल्य जीवन बरबाद हो जाता है। कामिनी, कांचन और कीर्ति इन तीन रस्सियों ने ही जीव को कसकर बांध रखा है। इनके कारण यह तनिक भी इधर-उधर हिल-डुल नहीं सकता।भगवान की प्राप्ति का मार्ग इन तीनों से दूसरी ही ओर है। इन तीनों का मन से जब पुरुष त्याग कर देता है, तब तो वह उस मार्ग की ओर जाने का अधिकारी होता है। जिन्हें इन तीनों में सुख का अनुभव होता है, उन्हें भक्ति कहाँ? प्रभु-प्रेम कैसा? वे तो प्रभु के बारे में बातें करने के क्या-एक शब्द कहने के भी अधिकारी नहीं हैं।जो स्वयं बँधा पड़ा है, उसका बिना देखे मार्ग का वर्णन करना केवल विनोद ही है। बिना चाखे कोई अमृत का स्वाद बता सकता है? चाखने पर भी लोग ठीक कहने में समर्थ नहीं होते, तब सुनकर कोई कह ही क्या सकता है?
रूप! तुम सोचो तो सही, जिस स्त्री के पीछे संसार पागल हो रहा है, वह वास्तव में है क्या? इन्हीं पंचभूतों की एक पुतली है। किसी सुन्दर-से-सुन्दर स्त्री को एकान्त में ऐसी हालत में देखो जब उसे संग्रहणी का रोग हो गया हो और उसके पास सेवा करने के लिये कोई भी मनुष्य न हो, तुम देखोगे, उसके सम्पूर्ण शरीर से दुर्गन्ध उठ रही होगी।वस्त्रों को छूने की तबीयत न चाहेगी। उसकी नासिका में से गाढ़ा-गाढ़ा मल निकल रहा होगा। निरन्तर शौच जाने से उसका गुलाब के समान मुख पिचककर पीला पड़ गया होगा। आँखें भीतर धँस गयी होंगी। स्तन और बुरे हो गये होंगे। आँखों के दोनों ओर मल भर रहा होंगे। पेट सिकुड़कर पीठ में लग गया होगा। मूत्र और पुरीष से उसकी जांघें सन गयी होगी, जिनकी ओर देखने से ही फुरहुरी आ जाती होगी।नख पीले पड़ गये होंगे। मुख में से बदबू उठ रही होगी और वाणी में गहरी वेदना और करुणा आ गयी होगी। आज से चार दिन पहले उसका पति उसे सर्वस्व समझकर उसके आलिंगन में महान-से-महान सुख का अनुभव करता होगा, वही ऐसी दशा में उसका आलिंगन करना तो दूर रहा, पास भी नहीं बैठ सकता।
जो रूप इतना विकृत हो सकता है, जिसका सौन्दर्य पेट में भरे हुए दुर्गन्धयुक्त मल के ही निकल जाने से ही क्षणभर में नष्ट हो सकता है उसमें सुख की खोज करना और उसी को जीवन का परम सुख समझकर उसकी प्राप्ति के लिये पागल होना कैसी भारी मूर्खता है?
क्रमशः

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