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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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अरे, इस पंचभूत के बने हुए और नौ छिद्रों वाले मल-मूत्र से भरे हुए शरीर में सुख कहाँ, शान्ति कहाँ, सौन्दर्य और आनन्द कहाँ? वह तो उस ब्रह्मानन्द के आनन्द की छायामात्र थी, जो विकृति होने से कुरुपता को प्राप्त हो गयी। छाया को छोड़कर असली आनन्द को खोजो, तुम्हें शान्ति मिलेगी।
रूप! यही हाल कांचन का है पृथ्वी का नाम है वसुन्धरा। वसु कहते हैं रत्नों को। इस पृथ्वी में असंख्यों रत्न भरे पड़े हैं। इस पृथ्वी में सात द्वीप हैं, सात समुद्र हैं, समुद्रों में असंख्यों रत्न भरे पड़े हैं, परन्तु सप्तद्वीप वाली पृथ्वी का आधिपत्य पाकर भी मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती, वह तीनों लोकों का स्वामित्व चाहता है, त्रिलोकेश होने पर चौदह भुवनों के आधिपत्य की इच्छा रखता है।सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्वामित्व लाभ करने पर भी शान्ति नहीं तब दस-बीस गांव या हजार-पांच-सौ गांवों का आधिपत्य या स्वामित्व लाभ करके जो अपने को सुखी बनाना चाहता है, वह कितना भारी मूर्ख है।तुम ध्यान पूर्वक देखो, सोने में और मिट्टी में क्या भेद है, जैसे पृथ्वी में से सफेद मिट्टी, पीली मिट्टी, हरी मिट्टी और काली मिट्टी स्थान भेद से निकलती है वैसे ही सोना-चांदी भी पीली और सफेद मिट्टी ही है। तुमने उसमें श्रेष्ठपना का भाव स्थापित कर रखा है तो वह श्रेष्ठ है। स्वयं ही तुमने उसे श्रेष्ठ बनाया है और फिर स्वयं ही उसकी प्राप्ति के लिये पागल बनकर प्रयास कर रहे हो।छाया का तुमसे अलग-भिन्न अस्तित्व नहीं। छाया तुम्हारे शरीर की ही है, अब तुम भ्रमवश उस छाया को पकड़ने दौड़ो, तो कितना भी प्रयास क्यों न करो, छाया तुम्हारे हाथ कभी भी न आवेगी। भला, पीछे दौड़ने से कहीं छाया पकड़ी जा सकती हैं? छाया का अस्तित्व तो तुमने पृथक मान लिया है, जब तुम छाया को अपनी ही समझकर छोड़कर भागो, तो फिर वह तुम्हारा पीछा करेगी। तुम्हें छोड़कर वह जा ही कहाँ सकती है। मेरी बात को समझे?'
रूप ने धीरे से कहा- 'हाँ, प्रभो! कुछ-कुछ समझा' यही कि वास्तव में सोने में न तो श्रेष्ठत्व है और न मिट्टी में कनिष्ठत्व। श्रेष्ठतव-कनिष्ठत्व हमारे ही हृदय में है। जिसे जब चाहें छोटा मान लें और जब मानना चाहें तब बड़ा मान लें।
प्रभु ने कहा- 'हाँ, ठीक है। अच्छा, इसे यों समझो। जैसे तुम अब तक रूपये को ही श्रेष्ठ मानते थे। उसी की प्राप्ति के लिये तुम हुसैनशाह के दरबार में रहते थें। हुसैनशाह जाति का यवन था, तुम ब्राह्मण थे। वह स्वामिद्रोही कृतध्न था, तुम धर्म पूर्वक जीवन-निर्वाह करने वाले थे। वह मूर्ख था, तुम पण्डित थे। वह प्रमादी था, तुम जागरूक थे। वह अधर्मी था, तुम धर्मात्मा थे। सभी बातों में वह तुमसे हीन था, तुम उससे श्रेष्ठ थे। किन्तु तुम उसके बराबर सम्पत्तिशाली नहीं थे। तब तक तुम धन-सम्पत्ति को ही सर्वश्रेष्ठ सुख का साधन समझते थे।
इसीलिये अपनी कुलीनता, विद्वत्ता, धार्मिकता, जागरूकता आदि सभी को तुच्छ समझकर उस मूर्ख के सामने सदा थर-थर काँपते हुए डरे-से खड़े रहते थे। अब जब तुम्हें पता चल गया कि धन-सम्पत्ति में सच्चा सुख नहीं है, तब जो धन-सम्पत्ति तुमने पसीने की जगह खून बहाकर पैदा की थी, उसे भक्तिमार्ग में प्रवेश करते ही मिट्टी की तरह लुटाकर चले आये क्यों ठीक है न?'
धीरे से रूप जी ने कहा- 'हाँ प्रभो! वे रूपये मुझे भार-से मालूम पड़ते थे, एक दिन में ही जैसे-तैसे मैंने उन्हें लुटा-पुटाकर किसी तरह अपना पिण्ड छुड़ाया।'
प्रभु ने उसी स्वर में श्री रूपजी के हाथ को अपने हाथ में लेकर कहा- 'अच्छा, तो अब तुम ही सोचो रूपये में बड़प्पन है? हुसैनशाह से तुम डरते नहीं थे। इस बात से डरते थे कि कहीं हमारी रूपयों की प्राप्ति में विध्न न हो जाये। अब जब तुम्हें धन-सम्पत्ति की तुच्छता का बोध हो गया तो एक हुसैनशाह क्या लाख हुसैनशाह आ जायँ तो भी तुम उनसे नहीं डरोगे क्योंकि जिस कारण से डर होता था, वह कारण तो नष्ट हो गया। जिस प्रकार विष की बेल को उखाड़ देने पर फिर उस पर लगने वाले दुःखदायी फलों से लोगों के मरण का भय नहीं होता, उसी प्रकार हृदय में से धन-सम्पत्ति की श्रेष्ठता निकाल देने पर फिर किसी के सामने दीन होना या गिड़गिड़ाना नहीं पड़ता। जब तक हम लोगों को गुणों के कारण बड़ा न मानकर धन होने के कारण बड़ा आदमी मानते हैं और इसी कारण धनिकों का आदर करते हैं, तब तक समझो कि धन को ही सुख-साधन समझने की आसुरी वृत्ति हमारे हृदय में विद्यमान है।जिसकी दृष्टि में धन का कोई विशेष महत्त्व नहीं, जो धन को भी पृथ्वी का एक विकार समझता है वह किसी के सामने क्यों गिड़गिड़ाने लगा? उसकी दृष्टि में धनी-गरीब सभी समान हैं? धन की तृष्णा ही गरीब-अमीर का भेदभाव पैदा कर देती है। जब हृदय में किसी से कुछ लेने की इच्छा ही नहीं, तब जैसे ही धनी वैसा ही गरीब।
'मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः'
यही दशा कीर्ति की है। कीर्ति भी धन की तरह अनित्य और तुच्छ ही है। वास्तव में तो इसे धन का ही एक अंग समझना चाहिये। धन और कीर्ति प्रयत्न करने से थोड़े ही मिलते हैं, ये तो पूर्वजन्मों के कर्मों के अनुसार प्राप्त होते हैं। जडभरत की तरह असंख्यों ज्ञानी पागलों की तरह जीवन बिताकर मुक्त हो गये होंगे।उनका नाम कोई नहीं जानता। जड़भरत के भाग्य में ही अवधूतप ने का आदर्श उपस्थित करने वाली कीर्ति बदी थी। बहुत-से धनिक एकदम मूर्ख होते हैं, अच्छे-अच्छे विद्वान धन के लिये प्रयत्न करते रहते हैं, उन्हें उतना धन प्राप्त ही नहीं होता तभी तो कहा है-
'भाग्यं फलति सर्वत्र न विद्या न च पौरूषम्।'
अर्थात- सर्वत्र भाग्य ही फलीभूत होता है। विद्या और पुरुषार्थ से ही सब कुछ नहीं हो जाता, जब धन तथा कीर्ति हमें भाग्य के ही अनुसार प्राप्त होगी, तब कीर्ति के लिये प्रयत्न करना मूर्खता है। कीर्ति की इच्छा करके हम वासनाजन्य एक नये पाप की और सृष्टि करते हैं, इसलिये जो कीर्ति के लिये प्रयत्न करते हैं,वे मूर्ख हैं। जिन्होंने चौदह भुवन वाले अनेक ब्रह्माण्डों का आधिपत्य किया है।
क्रमशः
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