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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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ऐसे असंख्यों ब्रह्मा उत्पन्न हुए और नष्ट हुए, उनका कोई नाक भी नहीं जानता, तब यह क्षुद्र प्राणी अपनी कीर्ति को अमर बनाने के लिये बाग-बगीचा और कूप-मन्दिर बनाकर ही अपने नाम को अक्षुण्ण रखना चाहता है, वह कितना भारी मूर्ख है।भाई! कीर्ति तो पतिव्रता है, वह पुंश्चली स्त्री नहीं है। उसने तो एक ही पुरुष श्री हरि को वरण कर लिया है, इसलिये तुम उसकी आशा को छोड़ दो, छोड़ दो, छोड़ दो। तुम्हें कीर्ति नही मिल सकती, नहीं मिल सकती, नहीं मिल सकती। कीर्ति के पति वे ही श्रीहरि हैं, इसलिये उन्हीं की कीर्ति को कथन करने में कल्याण है।यदि तुम्हें कीर्ति बढ़ानी ही है, तो श्री हरि की कीर्ति बढ़ाओ। तुम इस कीर्ति को धारण करो कि हम कीर्तिपति के कीर्तनिया सेवक हैं। हाँ, हरि के कीर्तनिया होने से कीर्ति तुम्हें प्यार करने लगेगी, क्योंकि अपने पति की प्रशंसा सुनकर सभी को सुख होता है और प्रशंसा करने वाले के प्रति स्वाभाविक ही अनुराग हो जाता है।
श्रीरूप ने हाथ जोड़े हुए दीन भाव से कहा- 'हाँ, प्रभो! श्री चरणों के अनुग्रह से मैं इतना तो समझा कि भक्ति मार्ग की ओर बढ़ने वाले साधक को कामिनी-कांचन और कीर्ति के स्वरूप-पद, प्रतिष्ठा, पैसा, पुत्र, परिवार और यावत प्रेय पदार्थ हैं, उनका परित्याग करके तब इस पथ की ओर अग्रसर होना चाहिये। अब मैं कुछ साधन-तत्त्व समझना चाहता हूँ।'
प्रभु ने कहा- रूप! जीव का स्वरूप शास्त्रों में ऐसा बताया है कि बाल के अग्रभाग को लो, उसके सौ टुकड़े करो। उन सौ में से एक को लो, फिर उसके सौ टुकड़े करे। उससे भी सूक्ष्म जीव का स्वरूप है। अर्थात जीव अति सूक्ष्म है।
जीव 'इस चराचर विश्व में' समान रूप से व्याप्त है, एक तिल रखने योग्य भी ब्रह्माण्ड में जगह नहीं है, जहाँ जीव न हो। अब जीव के दो भेद हैं- एक जड़, दूसरा चेतन अथवा स्थावर-जंगम। पत्थर, लकड़ी आदि स्थावर हैं और हलचल या क्रिया करने वाले जंगम कहाते है। स्थावर से जंगम श्रेष्ठ माने गये हैं।जंगमों में हाथी, घोड़ा आदि समझदार जानवर श्रेष्ठ हैं, उसमें भी मुनष्य श्रेष्ठ है, मनुष्यों में ब्राह्मण और ब्राह्मणों में भी विद्वान, विद्वानों में भी परिष्कृत बुद्धि वाला श्रेष्ठ है और उनमें भी सत-आचरणों को अपने जीवन में परिणत करने वाला कर्ता श्रेष्ठ है और उन कर्ताओं में से भी वह श्रेष्ठ है जिसे ब्रह्मज्ञान हो गया हो।ब्रह्मज्ञानियों में भी जो मुक्त हो गया हो वह श्रेष्ठ है और मुक्तों में भी सर्वश्रेष्ठ श्रीकृष्ण भक्त है। जिसके हृदय में सच्ची कृष्ण भक्ति है उससे बढ़कर श्रेष्ठ कोई हो ही नहीं सकता। श्रेष्ठ पाने की यही पराकाष्ठा है।' जैसे कि श्रीमद्भागवत में कहा है-
मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः।
सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने।
अर्थात-
राजा परीक्षित शुकदेव जी से प्रश्न करते हुए कह रहे है- 'हे महामुने! मुक्त हुए सिद्धों में भी नारायण का भक्त दुर्लभ है और उन करोड़ों भक्तों में भी शान्त हृदय का भक्त तो अत्यन्त ही दुर्लभ है।'
संसार में प्रयत्न करने पर चाहे सब कुछ प्राप्त हो सके, किन्तु श्रीकृष्ण भक्ति का प्राप्त होना अत्यन्त ही दुर्लभ है। बस, भक्ति प्राप्ति का एक ही उपाय है। सब जगह, सब अवस्थाओं में और सर्वकाल में श्री हरि के ही नामों का संकीर्तन करता रहे।श्रवण, कीर्तन ही प्रभु प्रेम प्राप्ति का मुख्य उपाय है और सब उपाय तथा आश्रयों का परित्याग करके श्री हरि की ही शरण लेनी चाहिये।
सर्वधर्मों का परित्याग करके केवल उन्हीं का चिन्तन-स्मरण करते रहना चाहिये। मैं तुम्हें भगवत-कृपा और अहैतु की भक्ति की एक मोटी-सी पहचान बताता हूँ, उसी से तुम समझ जाओगे कि भगवान की भक्ति कैसे करनी चाहिये जैसा कि श्रीमद्भागवत में भगवान कपिलदेव ने स्वयं बताया है-
मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये।
मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गंगाम्भसोऽम्बुधौ।
प्राणि मात्र की हृदयरूपी गुहा में रहने वाले मुझे सर्वान्तर्यामी ईश्वर के भक्त वत्सलता आदि गुणों के श्रवण मात्र से ही बिना किसी रोक-टोक के जिस प्रकार गंगा जी का प्रवाह समुद्र की ही ओर बहता रहता है, उसी प्रकार उनके मन की गति मेरी ओर बहती रहे, तो समझना चाहिये कि उसे ऐकान्ति की या अहैतु की भक्ति प्राप्त हो चुकी है।उसके प्राप्त होने पर फिर श्रीकृष्ण दूर नहीं रहते। वे तो आकर भक्त से लिपट जाते हैं। यही तो उनकी भक्त वत्सलता है।
आरम्भ में साधन-भक्ति होती है, साधन-भक्ति से रति-भक्ति होती है और रति-भक्ति से शुद्धा भक्ति या प्रेमरूपा भक्ति होती है। रति-भक्ति के पांच भेद-भक्ति शास्त्रों में बताये गये हैं। उनके नाम (1) शान्तरति, (2) दास्यरति, (3) सख्यरति, (4) वात्सल्यरति और (5) मधुररति-इस प्रकार हैं।
शान्त रस के उपासकों में उदाहरण स्वरूप शुकदेव और जनक जी के नाम लिये जा सकते हैं। दास्य रस के उपासक अनेक भक्त हैं, व्रज के ग्वाल-बाल तथा अर्जुनादि सख्यरति के उदाहरण हैं, नन्द, यशोदा, देवकी और वसुदेवादि को वात्सल्यरति के उपासक समझिये।मधुर रस की उपासना में व्रज की गोपियाँ ही सर्वश्रेष्ठ समझी जाती हैं, वैसे रुक्मिणी आदि हजारों रानियाँ तथा लक्ष्मी आदि इसकी उदाहरण स्वरूपा हैं। शान्त रस में अपने को छोटा मानने की भावना है। दास्य में अपने को छोटा समझकर विविध प्रकार से अपने सेव्य की सेवा-चाकरी करने की इच्छा होती है।
सख्यरति का उपासक अपने को छोटा भी मानता है, सेवा भी करता है, किन्तु उपास्य के सम्मुख निस्संकोच भाव से बर्ताव करता है। वह शान्त और दास्य के उपासकों की भाँति डरता-सा नहीं रहता।वात्सल्य रूप से उपासना करने वाले मन-मन में अपने प्रिय को ही श्रेष्ठ समझते हैं। ऊपर से व्यक्त नहीं करते। सेवा भी वे करते हैं और निस्संकोच भी रहते हैं, यही इस रस में विशेषता है। कान्ता भावस में ये पांचों ही बातें हैं। सेव्य को मन से बड़ा भी मानते हैं।सेवा करने की भी उत्कट इच्छा रहती है, उसके सामने किसी प्रकार का संकोच भी नहीं होता। प्रगाढ़ ममता भी होती है और अपने शरीर तथा शरीर की सम्पूर्ण क्रियाओं और चेष्टाओं को प्यारे के ही लिये समर्पित कर दिया जाता है।
इसलिये यह कान्ता भाव ही सर्वश्रेष्ठ है। इस उपासना के उपासक करोड़ों में क्या असंख्यों में कोई एक होते हैं।
क्रमशः
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