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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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शान्त, सख्य आदि के उपासक ही जब दुर्लभ हैं, तब कान्ता भाव के उपासकों के लिये तो कहना ही क्या? यह मैंने तुमसे भक्ति का तत्त्व बहुत ही संक्षेप में कहा है।तुम बुद्धिमान हो, कवि हृदय के हो, सरस हो, भगवत-कृपा के अधिकारी हो, अतः इन भावों को विस्तार के साथ वर्णन करके भक्तों के सम्मुख रखना। अब मैं कल वाराणसी जाने के लिये सोच रहा हूँ।'
प्रभु के चरणों में प्रणाम करते हुए गद्गद कण्ठ से श्री रूप ने कहा- 'प्रभो! मैं कृतकृत्य हुआ, मुझे विश्वब्रह्माण्ड के आधिपत्य से भी जितनी प्रसन्नता न होती उतनी आज प्राप्त हुई है। अब मेरे लिये क्या आज्ञा होती है? श्री चरणों के सन्निकट निवास करने की मेरी बड़ी उत्कट इच्छा है, जैसे आज्ञा हो?'
प्रभु ने कहा- 'रूप! तुम समर्थ हो, तुम्हें मेरी संगति की अब विशेष आवश्यकता नहीं। इस समय तुम सीधे श्री वृन्दावन जाओं और वहाँ के सभी तीर्थों की यात्रा करके जहाँ तक बन पड़े लुप्त तीर्थों के प्रकट करने की कोशिश करो। कालान्तर में गौड़ होकर मुझसे पुरी में आकर भेंट करना।'
इतना कहकर दूसरे दिन प्रभु तो नाव पर चढ़कर उस पार को चले गये और रूप, अनूप, माथुरिया ब्राह्मण तथा कृष्णदास को प्रभु वहीं से विदा कर दिये।महाप्रभु के चरणों का चिन्तन करते हुए अपने भाई के सहित श्री रूप मथुरा पहुँचे, वहाँ उन्हें गौड़ के भूतपूर्व महाराजा सुबुद्धिराय मिल गये। वे लकड़ी बेच-बेचकर एक पैसे के चनों में निर्वाह करते, शेष पैसों से बंगाली साधुओं की सेवा करते।
बंगाल में स्नान से पूर्व तेल लगाने की प्रथा है। तेल के बिना वहाँ स्नान ही ठीक नहीं समझा जाता। सुबुद्धिराय उन पैसों से तेल खरीदकर साधुओं को देते तथा उन्हें दही-चिउरा भी खिलाते।
सहसा विश्रान्त घाट पर उनकी श्री रूप और अनूप-इन दोनों भाईयों से भेंट हो गयी। सुबुद्धिराय ने इन दोनों भाइयों का जैसा वे कर सकते थे, स्वागत-सत्कार किया और फिर इनके साथ वे व्रज के बाहर वन तथा उपवनों में भी पैदल-पैदल यात्रा करने के लिये गये। विधि का विधान तो देखिये, कल तक जो एक महाराजा थे और एक महामन्त्री, वे दोनों ही आज भिखारी के वेष में घर-घर से टुकड़े माँगते हुए साधु वेष में फिर रहे हैं।
जिनके आश्रय से हजारों पण्डित और विद्वानों का निर्वाह होता था, वे ही आज एक टुकड़ा रोटी के लिये एक कंजूस गृहस्थी के द्वार पर खड़े-खड़े प्रतीक्षा करते हैं कि सम्भव है अब कोई घर से निकल कर टुकड़ा डाले। विधाता! सचमुच भाग्य का खेल बड़ा ही विलक्षण है। इसी विधि की विडम्बना को दुर्लक्ष्य करके किसी कवि ने कैसा सुन्दर मार्मिक वचन कहा है-
जातः सूर्यकुले पिता दशरथः क्षोणीभुजामग्रणीः
सीता सत्यपरायणा प्रणयिनी यस्यानुजो लक्ष्मणः।
दोर्दण्डेन समो न चास्ति भुवने प्रत्यक्षविष्णुः स्वयं
रामो येन विडम्बितोऽपि विधिना चान्ये जने का कथा।
'सर्वश्रेष्ठ सूर्यकुल में जिनका जन्म हुआ, महाराजाओं के भी पूजनीय चक्रवर्ती दशरथ जी जिनके पिता थे, सत्य में निष्ठा रखने वाली त्रैलोक्य में अद्वितीय रूपलावण्य युक्त पतिपरायणा सीता जी जिनकी पत्नी थीं, युद्ध में यमराज के समान साहस करने वाले शूरवीर और पराक्रमी लक्ष्मण जी जिनके छोटे भाई थे, जिनके समान त्रिलोकी में कोई धनुर्धारी शूर नहीं था, ऐसे रामचन्द्र जी स्वयं साक्षात विष्णु के अवतार थे।उन श्री रामचन्द्र जी की भी जिस विधि ने वंचना की, जिन्हें भी चौदह वर्ष विपत्तियों को झेलते हुए कुश-कण्टकाकीर्ण वनों में फिरना पड़ा, तो फिर अन्य लोगों की तो बात ही क्या है?' हे देव! तुम्हारे चरणों में हमारा नमस्कार है। वस्तुतः भगवान श्री रामचन्द्र जी के सम्बन्ध में यह कथन कवि विनोद ही है।
हे देव! तुम्हारे चरणों में हमारा नमस्कार है। वस्तुतः भगवान श्री रामचन्द्र जी के सम्बन्ध में यह कथन कवि विनोद ही है।
इधर महाप्रभु अपने भक्तों से विदा होकर गंगा जी के किनारे-किनारे श्री वाराणसी क्षेण में पहुँचे। नगर के बाहर ही उन्हें चन्द्रशेखर जी मिल गये। प्रभु को देखते ही उन्होंने भूमि पर लोटकर प्रभु को प्रणाम किया।
महाप्रभु ने उनका आलिंगन करते हुए प्रेम पूर्वक पूछा-'चन्द्रशेखर! तुम यहाँ कहां? तुम्हें कैसे पता चला कि मैं आज आऊंगा?' चन्द्रशेखर जी ने कहा-'प्रभो! कल रात्रि में मैंने स्वप्न देखा था कि आप आज काशी जी में आ गये हैं। इसीलिये खोज में आया था।यहाँ आते ही सहसा श्री चरणों के दर्शन हो गये। अब मेरी कुटिया को अपनी चरण-रजसे कृतार्थ कीजिये।'
वैद्य चन्द्रशेखर के आग्रह से प्रभु उनके घर गये। समाचार पाते ही तपन मिश्र, उनके पुत्र रघुनाथ, वह मरहठा ब्राह्मण तथा और भी बहुत-से भक्त प्रभु के दर्शनों के लिये आ गये। तपन मिश्र ने दोनों हाथों की अंजलि बांधकर प्रभु से प्रार्थना की कि 'प्रभु जब तक काशी में निवास करे तब तक मेरे ही घर भिक्षा करें।प्रभु ने मिश्र जी की विनती स्वीकार कर ली और आप चन्द्रशेखर वैद्य के घर पर ही रहने लगे। रहते यहाँ थे और भिक्षा करने तपन मिश्र के यहाँ चले जाते थे। इस प्रकार महाप्रभु लगभग दो मास तक काशी जी में ठहरे।
श्री सनातन की कारागृह से मुक्ति और काशी में प्रभु-दर्शन……
श्रीरूप तो प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके प्रयाग से वृन्दावन को चले गये। उन के भाई श्रीसनातन श्री रूप से अवस्था में बड़े थे, किन्तु उनसे पहले ही श्री रूप को प्रभु को समीप रहकर भक्तिमार्ग का उपदेश प्राप्त हुआ था। भक्ति मार्ग में अवस्था से बड़प्पन न होकर गुरु-कृपा से ही बड़ेपन का विचार किया जाता है।महाप्रभु की कृपा के पात्र प्रथम श्री रूप ही हुए थे, अतः सनातन जी इन्हें अपने से श्रेष्ठ और गुरु समझते थे। सब वैष्णवो में भी ऐसी ही मान्यता थी। इसीलिये वैष्णव समाज में श्री सनातन-रूप न कहे जाकर श्रीसनातन-रुप न कहे जाते हैं। अवस्था में छोटे होने पर भी प्रथम गुरु-कृपा होने के कारण श्री रूप का ही नाम पहले लिया जाता है।
कारावास की काली कोठरी में पड़े हुए श्री सनातनजी श्री चैतन्य की मनमोहिनी मूर्ति का ही सदा ध्यान करते रहते। उन्हें अन्न-जल कुछ भी नहीं भाता था। नेत्रों में नींद का नाम तक नहीं। दिन-रात्रि 'गौराचाँद' 'गौराचाँद' रटते-रटते ही इनके आठों प्रहर बीतते।रात्रि बीत जाती, दिन आ जाता।
क्रमशः
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