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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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भक्तवत्सल गौरांग कब सुनने वाले थे। वे जोरों से सनातन जी को आलिंगन करते हुए कहने लगे- 'आज मैं पावन बन गया, जो सनातन जी की देहसे स्पर्श हो गया। सनातन जी के अंगस्पर्श से पापियों को भी श्रीकृष्ण प्रेम की प्राप्ति हो सकती है।'

सनातन जी प्रभु के कृपाभार से दब-से गये। प्रभु ने उन्हें अपने पास ही आसन दिया और उनसे कारावास का सब वृत्तान्त पूछा, सब वृत्तान्त सुनकर प्रभु ने कहा- 'तुम्हारे दोनों भाई मुझे प्रयाग में मिले थे, वे वृन्दावन गये है। तुम कुछ काल यहीं मेरे पास रहो।' 
प्रभु की आज्ञा पाकर सनातन चुपचाप नीचे को सिर किये हुए बैठे रहे। प्रभु उनके ही सम्बन्ध में सोचते रहे।

श्री सनातन का अद्भुत वैराग्य…..

महाप्रभु का सम्पूर्ण जीवन त्यागमय था, त्याग उन्हें सबसे अधिक प्रिय था,संसारी भोगों का जब भी त्याग किया जाये, जितना ही त्याग किया जाये उतना ही अच्छा है, किन्तु त्याग वैराग्य के बिना टिकता नहीं, इसीलिये वे मरकट वैराग्य के विरुद्ध थे। अपने शरणा पन्न भक्तों को वे खूब ठोक-बजाकर देख लेते थे कि इनके जीवन में वैराग्य है कि नहीं।यदि वैराग्य देखते तब तो उसे महान वैराग्य का उपदेश करते और जब उन्हें वैराग्य की कमी प्रतीत होती तो उसे श्रीकृष्ण प्रीत्यर्थ घर में ही रहकर निष्काम भाव से संसारी कर्मों को करते रहने की ही शिक्षा देते। वे जानते थे कि ज्ञानी पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही व्यवहार करते हैं।इसलिये सब किसी को विषयों से एकदम हट जाने का आग्रह नहीं करते और त्याग न करने वाले को वे बुरा भी नहीं बताते, क्योंकि विषयों का त्याग सब नहीं कर सकते, त्याग करने वाले तो कोई बिरले ही होते हैं।

श्रीरूप और सनातन के व्यवहार से ही प्रभु समझ गये कि इन लोगों के जीवन में महान वैराग्य है। सचमुच ये दोनों भाई पहले जितने अधिक भोगी थे पीछे उससे भी अधिक त्यागी बन गये। श्री सनातन जी के लिये तो सुनते हैं कि घर बनाकर या कुटिया में रहना तो अलग रहा।वे एक दिन से अधिक एक पेड़ के नीचे भी वास नहीं करते थे। बारहों महीने जंगल में किसी पेड़ के नीचे पड़े रहना, दूसरे दिन उसे छोड़कर दूसरे वृक्ष के नीचे चले जाना-यही इनका दैनिक व्यापार था।
व्रजवासियों के घरों से रोटियों के छोटे-छोटे टुकड़े मांग लाते। उन्हें यमुना-जल के साथ जिस-किसी भाँति गले से नीचे निगल जाते। जो बचे रहते उन्हें पृथ्वी में गाड़ देते और दूसरे दिन उन्हें जल में मीजकर फिर खा जाते। ओढ़ने को रास्ते में पड़े हुए चिथड़ों की एक गुदड़ी मात्र रखते।पात्रों में उनके पास मिट्टी के एक टोंटनीदार करुवे के सिवा कुछ नहीं रहता। 'कर करुवा गुदरी गले' यही इनका बाना था। इसी प्रकार इन्होंने बीसों वर्ष श्री वृन्दावन की पवित्र भूमि में बिताये।

प्रेमावतार गौरांग इनके इस वैराग्य से बड़े सन्तुष्ट होते थे और वृन्दावन से जो भी आता उसी से इनका समाचार पूछते। सनातन को महान वैराग्य की शिक्षा प्रभु ने काशीधाम में ही दी थी। महाप्रभु ने स्पष्ट नहीं कहा।एक देश का शासन उन्हीं की कुशाग्र बुद्धि से होता था। फिर तिसपर भी इनके ऊपर प्रभु की पूर्ण कृपा थी, फिर वे महाप्रभु के संकेत को क्यों न समझते।

वैद्य चन्द्रशेखर महाप्रभु और श्री सनातन जी के परस्पर मिलन को देखकर चकित हो गये। महाप्रभु इन मुसलमान साधु से इतने प्रेम से क्यों मिल रहे हैं, सगे भाई की तरह घुल-घुलकर बातें क्यों कर रहे हैं, वैद्य महोदय इन्हीं विचारों में निमग्न थे। वे बीच-बीच में महाप्रभु की दृष्टि बचाकर श्री सनातन की ओर देख लेते थे और नीचे को मुख करके कुछ सोचने लगते।प्रभु वैद्य के मनोगत भाव को ताड़ गये। इसलिये श्री सनातन का परिचय देते हुए कहने लगे- ‘चन्द्रशेखर! तुम इन्हें जानते नहीं हो, ये गौड़ देश के बादशाह के प्रधानमंत्री हैं।महान पण्डित हैं, अद्वितीय भगवद्भक्त हैं, पद, प्रतिष्ठा, धन, सम्पत्ति, कुटुम्ब, परिवार, सभी पर लात मार करके भगवद्भजन करने के लिये निकल पड़े हैं, इनके दो भाई भी इसी प्रकार घर-बार छोड़कर वृन्दावन वास करने गये हैं, वे मुझे प्रयाग में मिले थे। आज इनकी पदधूलि से तुम्हारा घर सचमुच तीर्थ बन गया।’

सनातन जी प्रभु के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर लज्जा के कारण पृथ्वी में गड़े-से जा रहे थे, उनके मुख से एक भी शब्द नहीं निकला। वे नीची दृष्टि किये हुए अपने नख से पृथ्वी को कुरेद रहे थे, मानो वे देख रहे थे कि यदि इसमें कोई बिल मिल जाये तो मैं सीता जी की तरह अन्दर समा जाऊं।श्री सनातन जी का परिचय पाते ही चन्द्रशेखर जी ने भूमि पर लोटकर उन्हें प्रणाम किया। सनातन जी ने रोते-रोते उनके चरण पकड़ लिये और फूट-फूटकर रोने लगे। एक-दूसरे के चरणों में अपना माथा रगड़ने लगे, एक-दूसरे का आलिंगन करके अपने प्रेम के आवेश को कम करना चाहते थे, किन्तु वह वेग इतना अधिक था कि प्रेमांलिगन, चरणस्पर्श तथा अश्रुविमोचन से शान्त ही नहीं होता था।
महाप्रभु इन दोनों के प्रेम को देखकर मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे। 
कुछ काल के अनन्तर प्रभु ने कहा- ‘चन्द्रशेखर! तुम सनातन को गंगाजी पर ले जाओ। इनकी दाढ़ी-मूंछ सभी मुड़वा दो। क्षौर कराके इनका स्वरूप विशुद्ध वैष्णवों का-सा बना दो।’ 
चन्द्रशेखर ने प्रभु की आज्ञा पालन की। वे गंगाजी पर जाकर श्री सनातन जी का क्षौर करा लाये।सनातन जी के पास उस भूटिया कम्बल के सिवा और कोई नूतन वस्त्र नहीं था। चन्द्रशेखर ने उन्हें नूतन वस्त्र देने चाहे, किन्तु उन्होंने नूतन वस्त्र पहनना स्वीकार नहीं किया। बहुत आग्रह करने पर भी वे राजी नहीं हुए, इस बात से प्रभु को परम प्रसन्नता हुई।

इतने में ही तपन मिश्र जी प्रभु को भिक्षा कराने के निमित्त लिवाने आ गये। प्रभु ने हँसते हुए कहा- 'मिश्र महाशय! अब मेरा परिवार बढ़ रहा है, आज हम दो हो गये। दोनों को भिक्षा करानी होगी।’

कुछ लज्जा के स्वर में विनम्रभाव से नीची दृष्टि किये हुए तपन मिश्र ने कहा- ‘प्रभो! सम्पूर्ण वसुधा ही आपका कुटुम्ब है। मैं तो आपका वेतन-भोगी नौकर हूँ। नौकर राजा की ही वस्तुओं को लाकर स्वामी के सम्मुख समर्पण करता है।
क्रमशः

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