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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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इसलिये आपकी वस्तु को जैसे आज्ञा करेंगे, वैसे ही समर्पण कर सकूँगा।दान तो वह दे सकता है, जो स्वतंत्र हो, जिसका किसी वस्तु पर अपनेपन का अधिकार हो। जब सभी चीज स्वामी की है और फिर इसमें नौकर को क्या?’ महाप्रभु उनकी इस बात से बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें सनातन जी का परिचय कराया। परिचय पाते ही तपन मिश्र जी उनसे लिपट गये, सनातन जी ने भी उनकी चरण वन्दना की। फिर प्रभु के पीछे-पीछे सनातन जी भी तपन मिश्र के घर चले।

प्रभु भोजन के आसन पर बैठते ही कहने लगे- ‘सनातन को बुलाओ, उसे भी भोजन कराओ।’ दयालु तपन मिश्र तो भाग्यवान सनातन जी को प्रभु को अधरामृत स्पर्श किया हुआ, महाप्रभु का उच्छिष्ट प्रसाद देना चाहते थे, इसलिये उन्होंने कहा- ‘प्रभो! अभी सनातन जी का कुछ कृत्य शेष है, आप भिक्षा कर लें, वे मेरे साथ करना चाहते हैं।’ महाप्रभु ने फिर कुछ नहीं कहा। उन्होंने भिक्षा कर ली।प्रभु के भिक्षा कर लेने पर तपन मिश्र जी ने प्रभु का उच्छिष्ट महाप्रसाद सनातन जी को दिया। उस महाप्रसाद को पाते ही सनातन जी ऐसा अनुभव करने लगे कि हमारे सभी पाप प्रत्यक्ष रीति से हमारे शरीर से निकल-निकलकर बाहर जा रहे है। प्रसाद पा लेने के अनन्तर सनातन जी को एक प्रकार की अपूर्व ही प्रसन्नता हुई। इतनी प्रसन्नता पहले उन्हें कभी भी प्राप्त नहीं हुई थी।सनातन जी के प्रसाद पा लेने पर तपन मिश्र अपने घर में से नूतन वस्त्र ले आये और उन्हें हठपूर्वक श्री सनातन जी के शरीर पर पहनाने लगे। सनातन जी उनके पैर पकड़कर अत्यन्त ही करुण स्वर में कहने लगे- ‘मिश्र जी! आप मुझसे आग्रह न करें। मैं जब नूतन वस्त्र नहीं पहनूँगा।यदि आप नहीं मानते हैं तो अपना पहना हुआ कोई पुराना एक वस्त्र मुझे दे दीजिये।’ 
मिश्र जी विवश हो गये, अन्त में वे अपने घर में से एक पुरानी धोती निकाल लाये। सनातन जी ने उसे पकड़कर दो टुकड़े कर लिये। एक में से तो साफी और लँगोटी बना ली, एक टुकड़े को शरीर से लपेट लिया। अब वे पूरे वैष्णव बन गये।

वह महाराष्ट्रीय ब्राह्मण भी आ पहुँचा। श्री सनातन जी का परिचय पाकर उसने उनका निमंत्रण किया। इस पर सनातन जी ने कहा- ‘मैं एक के यहाँ अब भोजन न करूँगा, ब्राह्मणों के घरों से मधुकरी माँगकर ही लाया करूँगा, आपके घर से भी ले आऊँगा, आप मुझसे विशेष आग्रह न करें।’
इस पर फिर किसी ने सनातन जी से आग्रह नहीं किया। वे मधुकरी माँगकर उदरपूर्ति करने लगे। महाप्रभु इनके वैराग्य को देखकर मन-ही-मन बहुत सन्तुष्ट हुए। सनातन जी प्रभु के चरणों के ही समीप रहने लगे।सनातन जी के पास बहनोई का दिया हुआ वह सफेद रंग का कम्बल अभी तक था। वह कम्बल बहुत ही बढिया और मुलायम था। उसकी उन बहुत ही चमकीली और रेशम से भी बढ़िया थी।उसका मूल्य था तीन रुपये। उन दिनों तीन रूपये के कम्बल को बहुत बड़े आदमी ही ओढ़ते थे। आजकल वह तीस-चालीस रुपये का होगा। महाप्रभु बार-बार उस कम्बल की ओर देखते।बुद्धिमान सनातन जी समझ गये कि महाप्रभु को मेरे पास का यह कम्बल भाता नहीं है। वे उसी समय गंगा जी के किनारे गये। वहाँ एक साधु ने अपनी फटी-सी गुदड़ी गंगा जी में धोकर सुखाने डाल दी थी। सनातन जी उसके पास पहुँचकर कहने लगे- ‘भाई। तुम मेरा इतना उपकार करो, मेरे इस कम्बल को ले लो और अपनी यह गुदड़ी मुझको दे दो।’

साधु ने आश्चर्य चकित होकर कम्बल की ओर देखते हुए कहा- ‘महाराज! आप मुझ गरीब से हंसी क्यो करते हैं? मेरी गुदड़ी फट गयी है, कहीं से दूसरी खोजूँगा।’
सनातन जी ने बड़े ही स्नहे से कहा- ‘भाई! तुम हंसी मत समझो, मैं सच-सच कहता हूँ, यदि इस कम्बल के बदले में तुम अपनी गुदड़ी दे दो तो मेरे ऊपर तुम्हारा बड़ा ही उपकार हो।’
साधु ने कहा- ‘आप इस इतने कीमती कम्बल को फटी गुदड़ी के बदले में क्यों देना चाहते हैं।
सनातन जी ने कहा- ‘इसमें एक रहस्य है, तुम मुझे दे दो, मुझे ऐसी ही गुदड़ी की जरूरत है।’ 
साधु ने प्रसन्नतापूर्वक गुदड़ी दे दी। उसे प्रसन्नतापूर्वक ओढ़े हुए सनातन जी चन्द्रशेखर के घर पहुँचे।सनातन जी पर कम्बल न देखकर प्रभु समझ तो गये कि ये कम्बल को फेंककर कहीं से फटी गुदड़ी ले आये हैं, किन्तु फिर भी अनजान की भाँति पूछने लगे- 'सनातन! तुम्हारा वह कम्बल नहीं दीखता, उसे कहाँ रख दिया?’
कुछ लज्जित भाव से सनातन जी ने कहा- ‘प्रभो! जब आपकी असीम कृपा है, तब विषयरूपी वह कम्बल बच ही कैसे सकता है? वह तो आपकी कृपा के वेग में मेरे पूर्वकृत पापों के सहित बह गया।’
महाप्रभु बड़े सन्तुष्ट हुए और धीरे-धीरे कहने लगे- ‘सनातन जो सद्वैद्य होता है, वह रोगी के अच्छा होने पर भी कुछ दिन और औषधि देता है, थोड़ा भी रोग शरीर में रह जायेगा तो फिर धीरे-धीरे वह बढ़ने लगेगा। इसलिये बुद्धिमान वैद्य रोग के अंश को भी रहने नहीं देता।तुमने सब कुछ त्यागा, तिस पर भी सुन्दर कम्बल की क्षुद्र-सी वासना बनी ही रही। भिक्षा के टुकड़े माँगकर खाना और फिर तीन रूपये का भूटिया कम्बल ओढ़ना- यह शोभा नहीं देता।’

महाप्रभु की अपार अनुकम्पा को स्मरण करके सनातन जी गद्गद हो उठे, उनका गला भर आया, वे प्रभु के पैर पकड़ कर रुदन करने लगे। प्रभु ने उन्हें उठाकर छाती से चिपटा लिया। सभी उपस्थित भक्त श्री सनातन जी के अद्भुत वैराग्य की और महाप्रभु की अपार भक्त वत्सलता की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।

श्री सनातन को शास्त्रीय शिक्षा….

महाप्रभु की असीम कृपा प्राप्त हो जाने पर श्री सनातन जी को कुछ शास्त्रीय प्रश्न पूछने की जिज्ञासा हुई। उन्होंने दोनों हाथों की अंजलि बांधे हुए कहा-'प्रभो! मैं साधनविहीन, परमार्थ-पथ से अनभिज्ञ और संसारी विषयी लोगों का संसर्ग करने वाला परमार्थ सम्बन्धी प्रश्न करना भी नहीं जानता। 
अतः जिस प्रकार आपने ही दया करके विषयों में आसक्त हुए हम पशुओं को घर जाकर सोते-से जगा दिया, उसी प्रकार अब हमारे इस पशुपने को मिटा कर मनुष्यता प्रदान कीजिये, हमारे योग्य जो शिक्षा उचित समझें वही मुझे दीजिये। हम कौन हैं?
क्रमशः

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