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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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वे सौ वर्ष भी हमारे नहीं, ब्रह्मा जी के अपने सौ वर्ष।'
सनातन- 'प्रभो! मैं ब्रह्मा जी के वर्ष का परिणाम जानना चाहता हूँ। ब्रह्मा जी का एक वर्ष हमारे वर्षों से कितने दिन का होता है?'
प्रभु ने कहा- 'अच्छा तुम हिसाब लगाओ। जो किसी प्रकार भी न दीखे और जिसके किसी तरह भी विभाग न हो सकें, उसे 'परम अणु' कहते हैं। दो परमाणुओं को एक अणु होता है, तीन अणुओं का एक 'त्रिसरेणु' होता है। हां, 'त्रिसरेणु' दीखता है। झरोखे में से सूर्य के प्रकाश के साथ जो छोटे-छोटे कण उड़ते से दीखते हैं, वे ही त्रसरेणु हैं।
वह इतना हल्का होता है कि उसका पृथ्वी पर गिरना असम्भव है, वह आकाश में ही घूमा करता है और सूर्य के प्रकाश के साथ झरोखे में से दीखता है। जितनी देर में तीन 'त्रसरेणु' को उल्लंघन करके सूर्य आगे बढ़े उस कालको 'त्रुटि' कहते हैं।
ऐसी-ऐसी तीन सौ त्रुटियों का एक 'बोध' होता है तीन बोध का एक 'लव' और तीन लवका एक 'निमेष' माना जाता है। तीन निमेष का एक क्षण और पांच क्षण के काल को 'काष्ठा' कहते हैं। पंद्रह काष्ठा का एक 'लघु' और पंद्रह लघु की एक 'घड़ी' होती है।दो घड़ी कर एक मुहूर्त और छः या सात (दिन के घटने-बढ़ने के कारण) घड़ी होने पर मनुष्यों का एक 'पहर' होता है। चार पहर का 'दिन' और चार पहर की 'रात्रि' होती है, इसलिये आठ पहर की एक दिन-रात्रि मानी गयी है। ऐसे सात दिन-रात्रि का एक 'सप्ताह' और पंद्रह दिनों का एक पक्ष होता है।शुक्ल और कृष्ण-भेद से 'पक्ष' दो हैं। दो पक्ष का एक 'मास' होता है। दो मास की एक 'ऋतु' और तीन ऋतुओं का एक 'अयन' होता है। उत्तरायण और दक्षिणायन के भेद से अयन दो हैं, इसलिये दो अयनों का मनुष्यों का एक वर्ष होता है।
उत्तरायण को 'देवताओं का दिन' और दक्षिणायन को 'देवताओं की रात्रि' समझनी चाहिये। अर्थात जिसे हम वर्ष कहते हैं, वह 'देवताओं का एक दिन' ही होता है। देवताओं के तीन सौ साठ दिनों का एक देव वर्ष होता है, जिसे 'दिव्य वर्ष' कहते हैं।देवताओं के वर्षों से चार हजार वर्ष का सत्ययुग, तीन हजार वर्ष का त्रेता, दो हजार वर्ष का द्वापर और एक हजार वर्ष का कलियुग होता है। एक युग बीतने के पश्चात् फौरन ही दूसरा युग नहीं लग जाता, इसलिये उसके आगे-पीछे के समय को सन्धि और सन्ध्यांश कहते हैं।
दिव्य वर्षों से सत्ययुग का आठ सौ वर्ष, त्रेता का छः सौ वर्ष, द्वापर का चार सौ वर्ष और कलियुग का दो सौ वर्ष सन्धि-सन्ध्यांश काल माना गया है। चार युगों को मिलाकर 'चौकड़ी' कहते हैं।देवताओं के बारह हजार वर्षों (अर्थात मनुष्यों के तैंतालीस लाख बीस हजार वर्ष)- की एक 'चौकड़ी' होती है। ऐसी चौकड़ी जब 71 बीत जाती है, तब एक 'मन्वन्तर' होता है। एक मन्वन्तर के समाप्त होते ही पिछले इन्द्र, मनु, सप्तर्षि आदि बदल जाते हैं और नये बनाये जाते हैं।ऐसे चौदह मन्वन्तर बीत जाते हैं, तब 'ब्रह्मा जी का एक दिन' होता है और इतनी ही बड़ी उनकी रात्रि। उनके एक दिन में चौदह इन्द्र और चौदह मनु बदल जाते हैं। ब्रह्मा जी के एक दिन को 'कल्प' कहते हैं।दिन में वे सृष्टि का काम करते रहते हैं, रात्रि में सब सृष्टि का संहार करके उसे अपने में लीन करके सो जाते हैं, दिन होते ही फिर काम में लग जाते हैं।जिस प्रकार दुकानदार दिन में तो बाहर भाँति-भाँति की वस्तुएँ फैलाकर बैठता है और रात्रि में सबको समेट करके दुकान में बंद कर देता है, प्रातःकाल फिर ज्यों-का-त्यों पसारा फैला देता है, इसी प्रकार ब्रह्मा जी रोज व्यापार करते रहते हैं। ब्रह्मा जी के तीन सौ साठ दिनों का 'ब्रह्मवर्ष' होता है।ऐसे वर्षों से एक ब्रह्मा की आयु सौ वर्ष की होती है। कल्प में तो तीन ही लोकों का नाश होता है। ब्रह्मा जी की आयु के बाद इस चौदह भुवन वाले ब्रह्माण्ड का ही नाश हो जाता है, उसे 'महाप्रलय' कहते हैं। तब ब्रह्मा जी ब्रह्मलोक के मुक्त पुरुषों के साथ भगवान के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं, फिर नये ब्रह्मा होते हैं।'
प्रभु के मुख से ब्रह्मा जी की आयु सुनकर परम विस्मित हुए सनातन जी ने पूछा- 'प्रभो! यह तो महान आश्चर्य की बात है। इसे सुनकर तो बड़ा भारी वैराग्य होता है। इस हिसाब से तो हमारी आयु कुछ भी नहीं, जिसे हम सौ वर्ष की परमायु मानते हैं, वह ब्रह्मा जी के एक क्षण क्या 'लव' के भी करोड़ वें अंश के बराबर नहीं। इसी पर यह मूर्ख प्राणी इतना गर्व करता है।'
प्रभु ने उत्तेजित भाव से उल्लास के साथ उत्तर दिया। उस समय सनातन को बताते-बताते उनका चेहरा चमक रहा था, आँखों से प्रसन्नता की किरणें जोरों से निकल-निकलकर सनातन जी के शरीर में प्रवेश कर रही थीं।
प्रभु ने कहा- 'सनातन! यह प्राणी जब समझता नहीं, तभी तो माया में फँसकर अपनी क्षुद्र परिधि को ही सब कुछ समझता है। कूप का मेंढक समुद्र का क्या अनुमान लगा सकता है? उसके लिये तो कुएँ से बढ़कर दूसरा कोई समुद्र ही नहीं। तुम प्रत्यक्ष देखते हो।
जिसे तुम अपना एक दिन कहते हो, उसी में लाखों ऐसे जीव हैं जो अनेक बार मर जाते हैं और अनेकों बार नया जन्म धारण कर लेते हैं। तुम्हारा एक दिन ही हुआ, उनके अनेक जन्म बीत गये। देवता और ब्रह्मा जी के सामने हमारी आयु तो भुनगों के समान है। इस विषयों में सभी पुराणों में बड़ा ही सुन्दर विस्तार के साथ वर्णन किया गया है। पुराणों में इसी के समझाने के लिये एक अत्यन्त ही मनोहर कथा आती है।
सत्ययुग में रैवत नाम के एक बड़े ही पराक्रमी और सर्वशक्तिमान राजा थे।
ब्रह्मा जी के वरदान से वे सभी लोकों में जा आ सकते थे। सत्ययुग के मनुष्य आज कल से चौगुने लम्बे होते हैं। उनके एक रेवती नाम की कन्या थी, वह साधारण लड़कियों की अपेक्षा कुछ अधिक लम्बी थी। बहुत खोजने पर भी महाराज को उसके योग्य कोई वर नहीं मिला।
क्रमशः
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