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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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तब उन्होंने सोचा-चलो, ब्रह्मा जी से ही कुछ पूछ आवें कि हम इस लड़की का विवाह किसके साथ करें।दो-चार राजकुमार अच्छे तो हैं, उनमें से कौन-सा सर्वश्रेष्ठ होगा, इस बात का निर्णय ब्रह्मा जी से ही करा लावें। यह सोचकर वे अपनी लड़की को साथ लेकर ब्रह्मलोक में पहुँचे। उस समय ब्रह्मा जी अनेक देवता, ऋषि और अन्य लोंको के देवों से घिरे हुए- 'हाहा, हूहू' का गान सुन रहे थे।
महाराज रैवत भी प्रणाम करके चुपचाप एक ओर बैठ गये। आधी घड़ी के पश्चात् गायन समाप्त हो गया, तब पितामह ब्रह्मा जी ने हंसते हुए राजा रैवत से पूछा- 'कहो, भाई! कैसे आना हुआ?'
हाथ जोड़े हुए दीन भाव से महाराज ने कहा- 'भगवन! आपके श्रीचरणों के दर्शनों के निमित्त चला आया।सोचा था, इस लड़की के पति के सम्बन्ध में आप से पूछूंगा। आप जिनके लिये आज्ञा करेंगे, उसे ही दे दूंगा।'
मुसकराकर भगवान ब्रह्मादेव जी ने कहा- 'तुम्हीं बताओ, तुम्हें कौन-सा राजकुमार बहुत पसंद है?'
कुछ सोचकर महाराज ने कहा- 'प्रभो! अमुक राजकुमार मुझे सबसे अधिक अच्छा लगता है, फिर आप जिसके लिये आज्ञा करेंगे उसे ही इसे दूँगा।आपकी आज्ञा ही लेने तो आया हूँ।'
इतना सुनते ही भगवान ब्रह्मा जी अपनी सफेद दाढ़ी को हिलाते हुए बड़े ही जोरों से हंसने लगे और बोले- 'राजन! जिस राजकुमार का तुम नाम ले रहे हो, वह कुल तो कब का नष्ट हो गया।अब तो उन वंशों का नाम-निशान भी नहीं रहा। तुम्हारी पुरी को अन्य राजाओं ने अपनी राजधानी बना लिया। अब तो वहाँ कलियुग आ रहा है। तुम इसी समय जाओ, व्रज में भगवान श्रीकृष्ण जी के बड़े भाई शेष जी के अवतार बलराम जी अवतीर्ण हुए हैं, जाकर इस कन्या को उन्हें ही दे दो, वे सब ठीक कर लेंगे।'
भगवान ब्रह्मदेव जी की आज्ञा शिरोधार्य करके और उनके चरणों में प्रणाम करके महाराज पृथ्वी पर आये और रेवती जी को श्री बलराम जी को देकर वे तपस्या करने चले गये। इधर बलराम जी ने अपनी पत्नी को बहुत लम्बी देखकर उसके गले में अपना हल डालकर नीचे खींचकर अपने बराबर बना लिया।'
सनातन जी ने कहा- 'प्रभो! बड़े आश्चर्य की बात है। ब्रह्मा जी भी स्थायी नहीं रहते। इस जगत के एकमात्र स्वामी की भी अन्त में यह गति होती है।'
प्रभु ने कहा- 'जो उत्पन्न हुआ है, उसका अन्त अवश्य होगा, चाहे आज हो या कल। हाँ, मैं तुम्हें यह बता रहा था कि जैसा यह चौदह लोक वाला ब्रह्माण्ड है,
वैसे असंख्य ब्रह्माण्ड इस विश्व में हैं और उनके स्वामी असंख्य ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। जैसे गूलर के पेड़ पर असंख्य गूलर के फल लगे रहते हैं, इसी प्रकार विश्व में अनन्त गूलर के समान ब्रह्माण्ड लटके हुए हैं।ब्रह्माण्ड के समस्त प्राणी गूलर के भीतर के भुनगों के समान हैं। महाविष्णु की नाभिकमल में से ब्रह्मा जी उत्पन्न होते हैं और वे सृष्टि करने लगे जाते हैं। असंख्य ब्रह्मा गंगा जी के प्रवाह की तरह निकल-निकलकर सृष्टि में प्रवृत्त होते हैं।उनके नीचे सांस लेने से ब्रह्माण्डों का नाश होता है, ऊपर सांस लेने से ब्रह्मा जी के सहित ब्रह्माण्ड उत्पन्न हो जाता है इसी व्यापार का नाम संसार चक्र है। कुम्हार के चक्र के समान यह संसार चक्र घूमता रहता है, इसी से लोकों की सृष्टि होती रहती है।'
सनातन जी ने परम वैराग्य के स्वर में कहा- 'प्रभो! इस चक्रसे छुटकारा पाने का उपाय बताइये?'
प्रभु ने कहा- 'श्री कृष्ण इस चक्र से एकदम पृथक हैं। उन्हें संसार की सृष्टि, स्थिति और प्रलय से कुछ काम नहीं। इसे तो ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि करते रहते हैं। वे तो नित्य ही गोपियों के साथ आनन्द में रासक्रीड़ा करते रहते हैं।
वे वृन्दावन को छोड़कर एक पग भी इधर-उधर नहीं जाते इसलिये सर्वात्मना और सर्वभाव से उन्हीं की शरण जाने से इस चक्र से मुक्ति हो सकती है।'
सनातन- 'प्रभो! मैं उपाय जानना चाहता हूँ।'
प्रभु ने कहा- 'सनातन! मैंने कह तो दिया। वे तप से, जप से, योग-यज्ञ से तथा पाठ-पूजा से प्रसन्न नहीं होते, उनकी प्रसन्नता का एकमात्र साधन अनन्य होकर उनकी भक्ति करना ही है। बिना प्रेमा भक्ति के कोई उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता।जिसे वे अपना कहकर वरण कर लेते हैं, उसे अपनी गोपी वा सखी बनाकर अपनी लीला में सम्मिलित कर लेते हैं, सखी बने बिना उनकी क्रीड़ा का दूसरा कोई अनुभव कर ही नहीं सकता। सखी कोई स्वयं थोड़े ही बन सकता है।जो अपने पुरुषार्थ से उनकी क्रीड़ा में सम्मिलित होने का अभिमान करते हैं, वे उन तक कभी नहीं पहुँच सकते। जब अनन्य होकर, दीन होकर, निराश्रय होकर सभी प्रकार के पुरुषार्थों का परित्याग करके केवल मात्र उन्हीं का आश्रय ग्रहण किया जाय तब कहीं उस ओर पैर बढ़ाने का अधिकार प्राप्त हो सकता है।'
सनातन- 'प्रभो! अनन्यता कैसे प्राप्त हो, भक्ति का अंकुर कैसे हृदय में उत्पन्न हो?'
प्रभु ने कहा- 'सनातन! अनन्यता प्राप्त करने का सर्वोत्तम एक ही उपाय है, जैसे कि परमहंसशिरोमणि जड़भरत जी ने राजा रहूगण से कहा है-
रहूगणैतत्तपसा न याति
न चेज्यया निर्वपणाद् गृहाद्वा।
न च्छन्दसा नैव जलाग्निसूर्यैं-
र्विना महत्पादरजोऽभिषेकम्।।
भगवान जड़भरत कहते हैं- 'राजन् रहूगण! महात्माओं की चरणरज में लोटे बिना भगवत-कृपा की प्राप्ति तप से, यज्ञ से, दान से, घर-द्वार छोड़ देने से, वेदों के पढ़ने से, जल, अग्नि या सूर्य के सेवन करने से नहीं हो सकती।' उसकी प्राप्ति का एक ही साधन है, श्रद्धापूर्वक परम समर्थ भगवद्भक्त साधु पुरुषों की चरणधूलि में लोटा जाय। उसे मस्तक पर धारण किया जाय यही एकमात्र उपाय है। साधु-सेवा के बिना जो भगवत्कृपा का अनुभव करना चाहता है, वह मानो बिना नौका या जहाज के ही अपार सागर को हाथों से तैरकर उस पार जाना चाहता है। इसी बात को लक्ष्य करके भक्तराज प्रह्लाद जी ने अपने पिता हिरण्यकशिपु से कहा है-
नैषां मतिस्तावदुरुक्रमांघ्रिं
स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः
महीयसां पादरजोऽभिषेकं
निष्किंचनानां न वृणीत यावत्।।
हे तात! जिनके हृदय से विषयों का विकार एक दम दूर हो गया है, ऐसे परम पूजनीय भगवद्भक्तों की चरणरज से जब तक मनुष्य भलीभाँति सिर से पैर तक स्नान नहीं करता।
क्रमशः
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