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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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तब तक वेदवाक्यों से उत्पन्न हुई भी उसकी बुद्धि उसे प्रभु के पादपद्मों के समीप पहुँचाने में एक दम असमर्थ होती है। अर्थात बिना भगवद्भक्तों की चरण धूलि मस्तक पर धारण किये कोई भी पुरुष श्रीकृष्ण पादपद्मों के स्पर्श करने के निमित्त आगे नहीं बढ़ सकता।तत्त्वदर्शी ज्ञानियों की जब तक श्रद्धा के साथ, भक्ति के साथ प्रेम पूर्वक सेवा नहीं की जाती, उनके चरणों में जब तक स्वाभाविक स्नेह नहीं होता, तब तक वह भगवत-कथा श्रवण करने का भी अधिकारी नहीं होता। भगवान ने अर्जुन को उपदेश करते हुए गीता में स्वयं ही लिखा है-
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।
अर्थात 'हे अर्जुन! तू दण्डवत-प्रणाम-सेवा और निष्कपट भाव से किये हुए प्रश्न द्वारा उस ज्ञान को जान। (विनीतभाव से पूछने पर) वे तत्त्वदर्शी महात्मागण तुझे उस ज्ञान का उपदेश करेंगे।' उपदेश का वही अधिकारी है, जिसके हृदय में देवता, द्विज, गुरुजन और भगवत-भक्तों के प्रति श्रद्धा के भाव हैं।जो इनमें श्रद्धा के भाव नहीं रखता, वह परमार्थ की ओर अग्रसर ही नहीं हो सकता। फिर प्रभु कृपा का अधिकारी तो बन ही कैसे सकता है? सनातन! बहुत बातों में क्या रखा है, मैं तुझे सारातिसार बताता हूँ। प्राणिमात्र का परम पुरुषार्थ श्रीकृष्ण-प्रेम की प्राप्ति करना ही है।परम अराध्य वे ही श्री नन्दनन्दन वृन्दावनचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र जी हैं। अपने सभी पुरुषार्थों का आश्रय छोड़कर अनन्य भाव से व्रजांगनाओं की भाँति संसारी सम्बन्धों से मुख मोड़कर पतिभाव से उनकी आराधना करना यही उपासना की उत्तम-से-उत्तम प्रणाली है और पठनीय शास्त्रों में श्रीमद्भागवत ही सर्वोपरि शास्त्र है क्योकि इसे भगवान व्यासदेव ने सभी पुराणों के अनन्तर जिस प्रकार दही को मथकर उसमें से सारभूत मक्खन को निकाल लेते हैं, उसी प्रकार सर्वशास्त्रों को मथकर उनका सार निकाला है। बस, यही कल्याण का मार्ग है। इसे तुम मेरे मत का सार समझो। इससे अधिक कोई किसी बात का आग्रह करे तो उसे तुम अन्यथा समझना।मेरे इस ज्ञान को हृदय में धारण करो। साधु-महात्मा, संत तथा भगवद्भक्तों के चरणों में दृढ़ अनुराग रखो। वे कैसे भी हों उनकी निन्दा कभी मत करो। सबको ईश्वर-बुद्धि से नम्र होकर प्रणाम करो। तुम्हारा कल्याण होगा, मैं तुम्हें हृदय से आशीर्वाद देता हूँ।मेरे इस अमल-विमल शास्त्र सम्मत ज्ञान का तुम विस्तार के साथ भक्ति के ग्रन्थों में वर्णन करना। मंगलमय भगवान तुम्हारा मंगल करेंगे!'
इतना कहकर महाप्रभु चुप हो गये।
महाप्रभु के चुप हो जाने पर सनातन जी ने भक्तिभाव के सहित महाप्रभु के चरणों में प्रणाम किया और महाप्रभु ने उनके शरीर पर हाथ फेरते हुए उन्हें आशीर्वाद दिया। इस प्रकार दो महीनों तक महाप्रभु के समीप काशी में रहकर सनातन भाँति-भाँति के शास्त्रीय प्रश्न पूछते रहे और प्रभु उन्हें प्रेम पूर्वक सभी गुप्त तत्त्व समझाते रहें।इन दो महीनों में ही सनातन जी ने प्रभु से बहुत-सी भक्तिमार्ग की गूढ़ता तिगूढ़ बातें समझ लीं, जिनका विस्तार के साथ उन्होंने अपने अनेकों ग्रन्थों में वर्णन किया है।
स्वामी प्रकाशानन्द जी मन से भक्त बने…..
श्री पाद प्रकाशानन्द जी की जन्म भूमि तैलंग देश में थी। दक्षिण देश की यात्रा के समय श्री रंग क्षेत्र के समीप बलगण्डी नामक ग्राम में महाप्रभु नें वेंकट भटृ के यहाँ चातुर्मास व्यतीत किया था। वेंकट भट्ट श्री वैष्णव सम्प्रदाय के वैष्णव थे।
उनके भक्ति-भाव से प्रसन्न होकर प्रभु ने उनके घर चार मास निवास किया। उन्हीं के पुत्र श्री गोपाल भट्ट प्रभु की बड़ी भारी सेवा की थी और पिता के परलोकगमन के अनन्तर ये प्रभु के आज्ञानुसार घर-बार छोड़कर वृन्दावन वास करने चले गये थे और वहीं अन्त तक श्री राधारमण जी की सेवा-पूजा में लगे रहे।श्री गोपाल भट्ट जी के पिता तीन भाई थे। सबसे बडे तो इनके पिता श्री वेंकट भट्ट, मध्यम त्रिमल्ल भट्ट और छोटे ये ही श्री पाद प्रकाशानन्द जी महाराज थे। संन्यास के पूर्व इनका घर का नाम क्या था, इसका पता अभी तक नहीं चला। ये संन्यासी हो जाने पर भी अपने भतीजे गोपाल भट्ट से अत्यधिक स्नेह रखते थे। ये जानते थे कि गोपाल एक होनहार युवक है, कालान्तर में यह जगत्प्रसिद्ध पण्डित़ बन सकेगा, किन्तु जब उन्होंने सुनाओ कि एक बंगाली युवक साधु के संसर्ग से गोपाल शास्त्रों का पठन-पाठन छोड़कर 'कृष्ण-कृष्ण' रटने लगा हैं, तब उन्हें कुछ मानसिक दु:ख भी हुआ ओर उनकी इच्छा उस युवक संन्यासी से शस्त्रार्थ करने की हुई? प्रेम का आकर्षण कई प्रकार से होता है। कभी तो किसी की प्रशंसा सुनकर मन-ही-मन डाह होता है और उसके प्रति मन में एक स्वाभाविक-सा स्नेह उत्पन्न हो जाता है। जिसके गुणों से हम डाह करते हैं उसी के प्रति हृदय में अपने-आप ही प्रेम उत्पन्न हो रहा है, इससे घबड़ाकर हम उस व्यक्ति की खुल्लमखुल्ला निंदा करने लगते हैं।इसमें हम अपनी स्वाभाविक वृत्ति को दबाना चाहते है, किंतु ऐसा करने से वह और भी अधिक उभरती हैं। द्वेषाभाव से ही सही, चित्त उससे मिलने के लिए के सदा व्याकुल-सा बना रहा है और उसका प्रसंग और उसका प्रसंग आने पर रागवश उसके लिये दो-चार कड़वे शब्द अपने-आप ही मुंह से निकल पडते हैं।
प्रकाशानन्द जी का प्रभु के प्रति ऐसा ही अनुराग हो गया था। जब उन्होंने सुना कि जिस संन्सासी ने हमारे भ्रातृपुत्र गोपाल को बहकाया है, उसी ने सार्वभौम भट्टाचार्य-जैसे परम विद्वान पण्डित को अपने वश में कर रखा है और वे उसे अवतार समझते हैं, इससे उनकी जिज्ञासा और बढ़ गयी। उसी जिज्ञासा के फलस्वरूप उन्होंने प्रभु के पास व्यंग्यपूर्ण पत्र भेजे थे।अब जब उन्होंने सुना कि वही युवक संन्सासी यहाँ काशी मे आया है, तब तो वे किसी प्रकार प्रभु से भेंट करने की बात सोचने लगे। किन्तु भेंट हो कैसे? प्रकाशानन्द जी काशी के प्रतिष्ठित पण्डित और सम्माननीय संन्यासी थे। ये वहाँ के मठधारी संन्यासियों में सर्वश्रेष्ठ संन्यासी समझे जाते थे। ये किसी अनजान संन्यासी के पास मिलने कैसे जाते? वयोवृद्ध, विद्यावृद्ध, प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित होते तो वे सम्भवतया चले भी जाते, परन्तु महाप्रभु युवक थे, उनकी दृष्टि में वे भारी पण्डित भी नहीं थें, प्रसिद्धि भी उनकी इधर नहीं थीं, उन्होंने हेय सम्प्रदाय के भारती संन्यासी से दीक्षा ली थी।
क्रमशः
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