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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इस कारण अपने को प्रसिद्ध पण्डित और प्रतिष्ठित समझने वाले दण्डी संन्यासी प्रकाशानन्द जी प्रभु के निवास स्थान से प्रकाशानन्द जी का मठ कोई बहुत दूर नहीं था। उनका मठ भी बिन्दुमाधव के समीप ही था और प्रभु भी उधर ही तपन मिश्र के यहाँ ठहरे हुए थे।प्रभु ने स्वयं उनके पास जाने की आवश्यकता नहीं समझी, क्योंकि महाप्रभु बड़े ही संकोची थे। बड़ों के सामने बोलने में उन्हें बहुत संकोच होता था। इसलिये उन्होंने सोचा उनके पास जायंगे तो कुछ-न-कुछ वाद-विवाद छिड़ ही जायगा। इसलिये वे भी उनके पास नहीं गये और दस-बारह दिन ठहरकर श्री वृन्दावन को चले गये।
वृन्दावन से लौटकर प्रभु दो महीनों तक काशी में रहे। इस प्रवास में प्रभु बहुत ही साधारण संन्यासी की तरह रहते थे। वे न तो कहीं बाहर भिक्षा के लिये जाते थे और न संन्यासियों के दर्शनों को जाते। केवल चन्द्रशेखर के घर से गंगा स्नान को और विश्वनाथ जी के दर्शनों को जाते और तपन मिश्र के घर भिक्षा करके वहीं भगवन्नाम-संकीर्तन ओर जप करते रहते।इसलिये उनके दो-चार अन्तरंग भक्तों को छोड़कर प्रभु की महिमा किसी पर प्रकट नहीं हुई ! प्रकाशानन्द जी मन-ही-मन सोचते- 'सचमुच यह कोई अजीब ही संन्यासी हैं। हमारे साथ इतना परिचय होने पर भी यह हमारे मठ में नहीं आता है और न संन्यासियों की सभा में सम्मिलित होता है।अवश्य ही कोई विलक्षण पुरुष है। जो महाराष्ट्रीय ब्राह्मण प्रभु के चरणों में अत्यधिक अनुराग रखते थे, उनका घर श्री प्रकाशानन्द जी के मठ के समीप ही था।वे प्राय: उनके पास जाया-आया करते और उनका यथाशिक्त द्रव्यादि से सेवा-सुश्रूषा भी किया करते। जब-जब महाप्रभु का प्रसंग छिड़ता तब-तब प्रकाशानन्द जी प्रभु के ऊपर कटाक्ष करते और उनके निन्दा सूचक शब्दों का प्रयोग भी कर बैठते।वैसे उनका हृदय सरस था। कवि-प्रकृति के थे। भावुक थे। मिलनसार थे, प्रणय के ऐकान्तिक उपासक थे किन्तु अभी तक उनकी भावुकता को अद्वैत वेदान्त की प्रखर युक्तियों ने प्रच्छन्न कर रखा था।अभी तक उनकी सरसता और प्रणयोत्सुकता प्रस्फटित नहीं हुई थी। प्राय: देखा गया है कि ऐसे भारी विद्वानों की भावुकता किसी परम भावुक महापुरुष के संसर्ग से ही एकदम विकसित हो जाती है।
ईसा के प्रधान शिष्य सेण्ट पाल पहले शुष्क और नास्तिक थे, जब उन्होंने ईसा को शूल पर हंसते हुये चढ़ते देखा तब उनकी भावुकता एकदम फूट पड़ी और वे ही पीछे से ईसाई धर्म के सर्वश्रेष्ठ प्रचारक हुए। स्वामी विवेकानन्द पहले नास्तिक प्रकृति के घोर कुतर्की थे, परमहंस रामकृष्णदेव के हाथ फेरते ही न जाने उनकी नास्तिकता कहाँ भाग गयी और अन्त में वे ही भगवान रामकृष्णदेव के मिशन को विश्वव्यापी बनाने वाले प्रधान पुरुष हुए।इसी प्रकार स्वामी प्रकाशानन्द जी की भी ललित वृत्तियाँ श्री चैतन्य-चरणों के दर्शन से ही विकसित हुईं। अन्त में उन्होंने श्रीचैतन्य के गुणगान में इतनी सुन्दर कविता लिखी जिससे कठोर-से-कठोर भी हृदय द्रवीभूत हो सकता है। इनके बनाये हुए श्री चैतन्यचन्द्रामृत काव्य की जितनी भी प्रशंसा की जाय उतनी ही कम है। अस्तु।
उस महाराष्ट्रीय सज्जन ने एक दिन बातों-ही बातों में स्वामी जी से कहा- 'स्वामिन! उन बंगाली वैद्य के यहाँ जो संन्यासी ठहरे हुए हैं, उनके चेहरें में कितना भारी आकर्षण हैं। जो एक बार उन्हें देख लेता है, वही उनका बन जाता है। उनकी बाणी में अपार करुणा है। भगवद्गुण-गान करते-करते वे मूर्च्छित हो जाते हैं। एक दम तन्मय होकर श्रीकृष्ण-कथा कहते हैं।'
प्रकाशानन्द जी ने कहा- 'अरे, क्या हम उन्हें जानते नहीं? खूब जानते हैं। वे कोई आकर्षण-मन्त्र जानते हैं, इसी से तो उन्होंने सार्वभौम-जैसे विद्वान को बहका लिया किन्तु यहाँ उनकी दाल नहीं गलने की। इस विश्वनाथ जी की पुरी में उनकी भक्ति को कोई दो कौड़ी में भी न पूछेगा। यहाँ स्त्रियों की तरह नाचने वाले न मिलेंगे। बंगालियों की तरह यहाँ भावुक और भोले-भाले अनपढ़ आदमी नहीं हैं। यहाँ के भंगी-चमार तक ब्रह्मज्ञान बातें जानते हैं।’
इस बात के सुनने से उन महाराष्ट्रीय सज्जन को बड़ा दु:ख हुआ। वे सोचने लगे- 'इतने भारी विद्वान और त्यागी पुरुषों के हृदय में भी द्वेष की अग्नि इतनी प्रबल होती है। इतने ज्ञानी होने पर भी लोग दूसरों की प्रशंसा नहीं सुन सकते। सचमुच प्रतिष्ठा की इच्छा बड़ी ही प्रबल होती है। महान पण्डित-से पण्डित भी अपनी प्रतिष्ठा-स्थापन करने के निमित्त दूसरों की निन्दा करने में संकोच नहीं करते। लोकैषणा कितनी प्रबल है !'
दूसरे दिन दु:खी चित्त से उस भावुक सज्जन ने प्रभु से सभी बातें कहीं और वह करुण स्वर में कहने लगा- 'प्रभो! स्वामी जी कहते थे यहाँ उनकी भक्ति कों कोई दो कौड़ी में भी न पूछेगा।'
प्रभु ने कहा-' हमें दो कौड़ियों से करना ही क्या? मुफ्त तो कोई लेगा? हम तो वैसे ही लुटा देंगे! इस पर भी कोई न लेगा तो फेंककर चले जायँगे। कभी तो कोई उठा ही लेगा।'
प्रभु के ऐसे सरल और विद्वेष से रहित उत्तर को सुनकर महाराष्ट्रीय सज्जन की श्रद्धा प्रभु के चरणों में और भी अधिक बढ़ गयी और वे सोचने लगे कि जब इनकी एक-एक बात का मेरे ऊपर इतना प्रभाव पड़ता हैं, तब यदि प्रकाशानन्द जी से इनका साक्षात्कार हो जाय तब तो उनका उद्धार ही हो जाय।वे मूर्ख नहीं हैं, हठी हैं, सूखी तबीयत के नहीं हैं। प्रभु से बातें करते ही वे पानी-पानी हो जायँगे और सभी निन्दा करना भूलकर इनके सेवक बन जायँगे, किन्तु भेंट हो तो कैसे हो? वे यहाँ आवेंगे नहीं, प्रभु वहाँ जाने को राजी न होंगे।
वे सज्जन इसी चिन्ता में पड़ गये। अपने मनोगत भाव उन्होंने तपन मिश्र, चन्द्रशेखर तथा और भी दो-चार प्रभु के भक्तों के सामने प्रकट किये।तपन मिश्र ने कहा- एक युक्ति हो सकती है। कोई सभी संन्यासियों का निमन्त्रण करे और प्रभु से भी वहाँ चलने का बहुत आग्रह करे, तो प्रभु अपने प्रिय भक्त के आग्रह की कभी अवहेलना न करेंगे, अवश्य ही चले जायंगे।’
यह सुनकर उस महाराष्ट्रीय सज्जन ने जल्दी से कहा- 'इसके लिये मैं स्वयं तैयार हूँ। यह कौन-सी बड़ी बात है। किन्तु आप प्रभु को ले चलने का जिम्मा लें।'
क्रमशः
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