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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रकाशानन्द जी ने कुछ रुक-रूककर कहा –‘एक बात पूछना चाहता हूँ, तुम बुरा न मानो तो पूछूं।
प्रभु ने दीनता के स्वर में कहा – ‘आप कैसी बात कर रहे हैं, आप तो मेरे हितकी ही बात पूछेंगे। आप तो गुरुजन हैं, सदा कल्याण ही चाहेंगे।’
प्रकाशानन्द जी ने कहा- ‘हाँ, मैं यह पूछना चाहता हूँ कि संन्यासी का मुख्य धर्म है कि वह भिक्षा पर निर्वाह करता हुआ सदा वेदान्तचिन्तन करता रहे। युक्ति से, शास्त्र प्रमाण से, आप्त पुरुषों के वाक्यों द्वारा इस सत्य से प्रतीत होने वाले जगत की सदा निस्सारता ही को सोचता रहे। तुम वेदान्ता का चिन्तन छोड़कर यह हरि नामस्मरण क्यों कर रहे हो?
प्रभु ने नम्रता के साथ कहा- ‘भगवन! मेरे गुरुदेव ने मुझे ऐसा ही उपदेश दिया है। उन्होंने मुझे वेदान्त शास्त्र का अनधिकारी समझकर इसी मन्त्र का उपदेश दिया और आज्ञा की कि इसी का जप किया करो। उन्होंने कहा था- कलियुग में और कोई सुगम साधन ही नहीं-
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा।
इसीलिये मैं दिन-रात्रि इसी का जप करने लगा। निरन्तर के जप से या इसी का ध्यान रहने से मेरे दिमाग में कुछ गर्मी-सी चढ़ गयी। मैं पागल-सा हो गया, घर-बार कुछ भी अच्छा नहीं लगने लगा। आँखों में से आप–से-आप अश्रु बहने लगे। तब तो मैं घबड़ाया और मैंने गुरु महाराज से पूछा- ‘भगवन! आपने मुझे यह कैसा मन्त्र दे दिया। इससे तो मैं पागल हो गया।तब उन गुरु महाराज ने श्रीमदभागवत के कुछ श्लोक सुनाकर मुझसे कहा- ‘यह स्थिति बुरी नहीं हैं। यह शुभ लक्षण है। तुम इसी प्रकार जप करते जाओ। ‘अतएव ‘भगवन! मैं उसी दिन से इसी का सदा जप करता रहता हूँ। नित्य जपने से समझ लीजिये या अभ्यास समझ लीजिये, इस नाम में ऐसी आसक्ति-सी हो गयी है कि मैं छोड़ने की कोशिश भी करूँ तो भी यह नहीं छूटता।’
प्रभु की बात सुनकर बात को टालते हुए प्रकाशानन्द जी कहने लगे– ‘हरि नामस्मरण बड़ा उत्तम है। कलिसन्तर उपनिषद में भगवन्नाम की बड़ी महिमा लिखी है, किन्तु तुम ब्रह्मसूत्रो से उदासीन से क्यों हो? वेदान्त दर्शन को क्यों नहीं मानते?'
नम्रता के साथ प्रभु ने कहा- ‘भगवन! ऐसा कौन वेदों को मानने वाला आस्तिक पुरुष होगा जो भगवान व्यास देव जी के ब्रह्म सूत्रो को न मानता हो? ‘
प्रकाशानन्द जी ने कहा- ‘वेदान्तसूत्रों में निर्विशेष ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है। अहंग्रह-उपासना द्वारा निर्विशेष ब्रह्म का चिन्तन न करके नाच-गान में रत रहना तो वेदान्त सूत्रों के न मानने के बराबर हैं।’
प्रभु ने कहा- ‘मैं इस बातको नहीं मानता कि ब्रह्मसूत्रो में भगवान व्यास ने केवल निर्विशेष ब्रह्म का ही प्रतिपादन किया है। मेरा मत तो ऐसा है कि इसमें सविशेष गुण विशिष्ट ब्रह्म का ही वर्णन प्रधानता के साथ किया गया होगा।’
कुछ चौंककर और चारों ओर संन्यासियों की ओर देखकर प्रकाशानन्द जी कहने लगे- ‘यह तुम कैसी अशास्त्रीय-सी बात कह रहे हो? ब्रह्मसूत्र के प्रत्येक सूत्र में निर्विशेष निर्गुण ब्रह्म का ही प्रतिपादित किया गया है। भगवान शंकराचार्य ने विस्तार के सहित अपने भाष्य में इसका वर्णन किया है। क्या तुमने शारीरक भाष्य नहीं पढ़ा हैं या शंकराचार्य को ही नहीं मानते हो?
प्रभु ने कहा- मैनें श्री सार्वभौम भट्टाचार्य से शारीर के भाष्य सुना है ओर अपनी तुच्छ बुद्धि के अनुसार कुछ समझा भी है। भला जगदगुरु शंकराचार्य को कौन नहीं मानेगा? वे ही तो दस नामी शंकर सम्प्रदाय के आदि आचार्य और जगन्मान्य गुरु हैं। उनके श्री चरणों में मैं पूर्ण श्रद्धा रखता हूँ।
प्रकाशानन्द जी ने कहा- ‘ये तो न मानना ही हुआ जो उनके भाष्य के विरुद्ध बातें कहते हो। व्यास भगवान के असली भावों को तो शंकर भगवान ने ही समझा हैं, उन्होंने सम्पूर्ण भाष्य में उसी एक निर्गुण निर्विशेष उपाधि रहित अखण्ड सत्ता का वर्णन किया है।जब जगत वास्तव में कुछ है ही नहीं और जीव-ब्रह्म में जब कुछ भेद ही नहीं तब स्तुति कैसी? विनय और प्रार्थना किसकी? सब नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्मस्वरूप ही तो हैं। ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, जो कुछ भास रहा है, स्वप्न के पदार्थो के समान सब मिथ्या हैं।’
प्रभु ने कहा- ‘भगवान व्यास तो ब्रह्म सूत्रों का भाष्य स्वयं ही किया है और उस भाष्य करने पर ही उन्हें शान्ति प्राप्त हुई और तभी से उन्होंने और कुछ लिखना ही छोड़ दिया है। श्रीमदभागवत ही ब्रह्म सूत्रों का निर्विवाद भाष्य है। यह भगवान व्यास देव की अन्तिम कृति है, इसमें जो कुछ कहा गया है वही सबसे अधिक मान्य है।
[सर्ववेदान्तसांर हि श्रीभागवतमिष्यते। तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रति: क्वचित्।।(श्रीमद्भा.12।13।15)] आप तो सर्वशास्त्रवेत्ता हैं, ठीक-ठीक बताइये श्रीमद्भागवत में निर्विशेष ब्रह्म की प्रधानता हैं या साक्षात श्रीकृष्णचन्द्र को सविशेष पूर्णब्रह्म परमात्मा बताया गया है?
प्रकाशानन्द जी ने कहा- ‘हाँ, यह तो सत्य है कि श्रीमदभागवत को भगवान व्यास देव ने सभी शास्त्रों का सार लेकर बनाया है। श्री नारद जी के उपदेश से उन्होंने भगवान की लीलाओं का वर्णन करने से परम शान्ति भी प्राप्त की है और आत्माराम मुनियों तक के लिये उन्होंने ग्रन्थ के आदि में भगवत-भक्ति करते रहने का संकेत कर के उसका कारण बताया है-
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमें।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणों हरि:।।[श्रीमद्भा. 1/7/10]
अर्थात 'भगवान गुणों में दिव्यता ही ऐसी है कि कैसे भी अज्ञान रहित आत्माराम मुनि क्यों न हों, वे भी भगवान की अहैतु की भक्ति करते ही है।
इस बात को मैं मानता हूँ, किन्तु भगवान शंकराचार्य जी ने जो एक दम सविशेष ब्रह्म को गौण बताकर और परम साध्य निर्विशेष ब्रह्म को ही माना है यह क्यों? यही मेरी शंका है।'
प्रभु ने कहा- 'भगवान शंकराचार्य श्रीमद्भागवत को भी यथाविधि जानते थे, भागवत के प्रति उनकी परम श्रद्धा थी। इस बात को भी जानते थे कि श्रीमद्भागवत व्यास देव जी द्वारा प्रकट हुआ और उसके प्रतिपाद्य सविशेष सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण ही हैं।
फिर भी उन्होंने निर्विशेष ब्रहा को ही अपने भाष्य में प्रधानता देते हुए उसे ही चरम लक्ष्य माना है! यह उनकी महानता ही है। महान पुरुषों के सिवा ऐसा साहस कोई दूसरा नहीं कर सकता। उन्होंने लोक कल्याण के ही निमित्त ऐसा किया है।
क्रमशः
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