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श्री श्री श्री चैतन्य चरितावली
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जो ज्ञान अभिमान में अच्युत का आश्रय त्याग देते हैं उनका अवश्य ही अध: पतन हो जाता है। आपने तो अपने जीवन से भक्ति का माहात्म्य प्रकट किया है। भगवन! आपके चरणों में मेरा कोटि-कोट प्रणाम है। मैं तो आपको बहुत ही श्रेष्ठ समझता हूँ।'
इस प्रकार बहुत देर तक बातें होती रहीं। महाराष्ट्रीय सज्जन स्वामी जी से विदा लेकर अपने घर चले गये। दूसरे दिन इस सुखद संवाद को सुनाने के लिये प्रभु के पास आ रहे थे कि उन्हें रास्तें में ही गंगा स्नान करके लौटते हुए प्रभु मिल गये। जल्दी में उन्होंने प्रणाम करके कहा- 'प्रभो! 'प्रभो! महान आश्चर्य की बात! आपकी माया अपार है।प्रभो! ओहो! जो आपकी इतनी भारी निन्दा किया करते थे; वे वेदान्त-शिरोमणि श्री मत्प्रकाशानन्द अब बालकों की भाँति रो रहे हैं। अब उन्हें वेदान्त चिन्तन, शास्त्रों का पठन-पाठन कुछ भी नहीं भाता है, अब वे निरन्तर श्री चैतन्यचरणों का ही चिन्तन करते हैं।'
इस संवाद को सुनते ही प्रभु उछलने लगे और परम प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहने लगे- 'भगवान बड़े दयालु हैं, उन्होंने पूज्यपाद प्रकाशानन्द जी के ऊपर कृपा कर दी। उन्हें प्रेमदान देकर अपना लिया। अहा! उन महापुरुष के चरणों की धूलिको मैं अपने मस्तक पर चढ़ाकर अपने जीवन को कृतार्थ करूँगा।
इतना कहते-कहते प्रभु बिन्दुमाधव जी के मन्दिर में दर्शन करने गये। भगवान की मनोहर मूर्ति के दर्शनों से प्रभु भावावेश में आकर नृत्य करने लगे। श्री सनातन, चन्द्रशेखर वैद्य, तपन मिश्र आदि भक्त भी प्रभु के साथ ताली बजा-बजाकर नाचने और-
हरिहरये नम: कृष्णयादवाय नम:।
गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन।
इस पद को बड़े ही स्वर के साथ गाने लगे। महाप्रभु ब्रह्मज्ञान शून्य होकर नृत्य कर रहे थे। बहुत-से दर्शनार्थी प्रभु का नृत्य देखनेके लिये एकत्रित हो गये। संकीर्तन की सुमधुर ध्वनि सुनकर शिष्यों के सहित श्री स्वामी प्रकाशानन्द जी भी वहाँ आ उपस्थित हुए और वे भी प्रभु के स्वर में स्वर मिलाकर-
हरिहरये नम: कृष्णयादवाय नम:।
गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन।
इस पद गायन करने लगे। थोड़ी देर के अनन्तर प्रभु ने संकीर्तन बंद कर दिया। उन्हें अब कुछ बाह्य ज्ञान हुआ। सामने सशिष्य प्रकाशानन्द जी को देखकर प्रभु ने उनके चरणों में भक्तिभाव से प्रणाम किया। इस पर प्रकाशानन्द जी प्रभु के पैरों में पड़ गये। अपने पैरों को जोर से खींचते हुए प्रभु दीनभाव से कहने लगे- 'भगवन! यह आप कैसा अनर्थ कर रहे हैं।गुरुजन होकर आप मेरे ऊपर पाप क्यों चढ़ा रहे हैं? मैं तो आपके शिष्यों के शिष्यों तक के बराबर नहीं हूँ, यद्यपि आपकी दृष्टि में सभी ब्रह्मस्वरूप हैं, फिर भी लोकमर्यादा के हिसाब से आपको ऐसा न करना चाहिेये। आप तो मेरे परम वन्दनीय हैं।'
धीरे-धीरे प्रकाशानन्द जी ने कहा- 'प्रभो! मैं अपने पूर्वकृत पापों का प्रायश्चित कर रहा हूँ। मैंने आपकी लोंगों के सामने बहुत निन्दा की थी। 'प्रभु ने कानों पर हाथ रखते हुए कहा- 'श्री हरि श्री हरि! आप कैसी बातें कर रहे हैं? गुरुजन अपने शिष्य तथा सेवकों की कभी बुराई कर ही नहीं सकते। वे तो सदा उनके कल्याण की ही बातें सोचा करते हैं। आप भला मेरी कभी बुराई कर सकते हैं?
इस प्रकार बहुत देर तक दोनों महापुरुषों के बीच बातें होती रहीं। अन्त में दोनों ही एक-दूसरें से विदा हुए।सांयकाल के समय एकान्त में श्री प्रकाशानन्द जी महाप्रभु के पास स्वयं आये। आते ही उन्होंने प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया और एक साधारण शिष्य की भाँति नम्रता से एक ओर बैठ गये। प्रभु ने इनका जोरों से आलिंगन किया और खीचकर आपने समीप बैठ लिया।तब प्रकाशानन्द जी ने दोनो हाथों की अंजलि बांधे हुए बड़ी ही नम्रता के साथ कहा- 'प्रभो! मैंने अब तक अपना अमूल्य समय अभिमान और आत्मश्लाघा में ही बिता दिया। परमार्थपथ से मैं अब तक एक दम अनभिज्ञ ही रहा, इसलिये अब मुझे क्या करना चाहिये, मेरा मुख्य कर्तव्य क्या है, सो बता दीजिये।'
प्रभु ने कहा- 'भगवन! आप साधारण जीव नहीं हैं। आप तो जीवन्मुक्त हैं। आप जो भी कुछ करना चाहते हैं और आप जो भी कुछ करेंगे उसका एक मात्र उद्देश्य लोक संग्रह और लोक शिक्षण ही होगा।इसलिये भगवन! मैं तो यही समझता हूँ कि प्राणि मात्र का परम पुरुषार्थ श्रीकृष्ण प्रेम की उपलब्धि करना ही है। प्रभु के पादपद्मों में प्रीति हो- यही सब साधनों का अन्तिम फल है और सभी कार्य इसी एक उद्देश्य की पूर्ति के निमित्त करने चाहिये।'
प्रकाशानन्द जी ने पूछा- 'प्रभो ! प्रभु पादपद्मों में प्रेम कैसे हो?'
प्रभु ने कहा- 'सजातीय और विजातीय दो पदार्थ हैं। जीव भगवान का अंश है, यदि दसे सजातीय भगवान की ओर लगायेंगे तो आनन्द की उपलब्धि होगी और विजातीय संसारी कामों में फंसाये रखेंगे तो यह सदा दु:खी ही बना रहेगा। इसलिये अनन्य भाव से उन्हीं प्रभु की शरण जाने में कल्याण है, यही प्रेम प्राप्ति का सर्वोत्तम उपाय है।'
प्रकाशानन्द जी ने कहा- 'प्रभो! शास्त्रों का सिद्धान्त हैं, द्वितीयाद वै भयं भवति' अर्थात दूसरे से तो सदा भय ही होता है, इसका क्या अभिप्राय है? जब तक सेव्य-सेवक-भाव है, तब तक द्वैत है और द्वैत भय का कारण है, फिर किस भाव से शरण में जाऊँ?'
प्रभु ने कहा- 'भगवन! आप ध्यान पूर्वक इस बात पर विचार करें। वास्तव में यह बात ठीक है कि द्वैत में सदा भय ही होता है। बिना अद्वैतभावना के शान्ति नहीं, किन्तु आप सोचिये- आंश में और अंशी में, सेव्य में और सेवक में, सखा और सखा में, पिता में और पुत्र में तथा पतिे में और पत्नी में क्या द्वैधीभाव रहता है? जहाँ द्वैत है वहाँ प्रेम कहाँ? प्रेम तो एक होने पर ही होता है। जिसे हम अपना कहकर स्वीकार कर चुके है। दूसरा रह ही नहीं जाता। व्यवहार में भी देखा जाता है, जब कोई गुप्त बात कहनी होती है, तो कहने वाला पास में बैठे हुए आदमियों की ओर शंकित दृष्टि देखता है। तब सुनने वाला कहता है- 'तुम निश्चिन्त होकर कहो, यहाँ कोई 'दूसरा' नहीं हैं। अर्थात सभी अपने हैं।' इसलिये अपनापन स्थापित हो जाने पर फिर भय का क्या काम? फिर तो दिन दूना आनन्द ही बढ़ता जाता है।
क्रमशः
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