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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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सम्बन्ध पाँच ही प्रकार से हो सकता है- अशं-अंशी-सम्बन्ध, स्वामी-सेवक-सम्बन्ध, सख्त-सम्बन्ध, पिता-पुत्र का सम्बन्ध और पति-पत्नी का सम्बन्ध।इन्हें ही क्रम से शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और कान्ताभाव कहते हैं। इनमें से भगवान के साथ कोई भी सम्बन्ध स्थापित हो जाने पर फिर वे दूसरे नहीं रहते। अपने ही हो जाते हैं, द्वैत न रहकर अद्वैत बन जाते हैं।
शान्तभाव में ऐश्वर्य की भावना रहने से कुछ अद्वैत का अंश शेष रह जाता है। दास्यभाव में निरन्तर सेवक की भावना रखने से शांत की अपेक्षा कुछ द्वैतभाव कम हो जाता है, शख्य दास की अपेक्षा कुछ कम हो जाता है, किन्तु कुछ द्वैत तो सख्य में भी बना ही रहता है। सखा अपने सखा से यह इच्छा तो रखता ही है कि यह भी हमसे स्नहे करें।सख्य की अपेक्षा वात्सल्य भाव में द्वैत बहुत ही कम हो जाता है क्योंकि असली पिता अपने में और पुत्र में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं समझता। पुत्र पिता का आत्मा ही है किन्तु फिर भी द्वैधी भाव समूल नष्ट नहीं होता।लालन-पालन जन्य कुछ सूक्ष्म द्वैतांश शेष रह ही जाता है। हाँ, कान्ता भाव में द्वैत का नाम नहीं। पत्नी अपने मन को ही पति के मन में नहीं मिला देती है, किन्तु वह हृदय से हृदय को मिलकर उसकी सभी चेष्टाएं, सभी क्रियाएँ केवल पति के ही सुख के निमित्त होती हैं। उसके लिये अपना अस्तित्व रहता ही नहीं।वहाँ न स्वामी-सेवक-भाव है, न अंशांशी-भाव। वहाँ तो अद्वैत-भाव है। पत्नी अपने लिये सुख नहीं चाहती। उसे अपने सुख में प्रसन्नता नहीं होती। उसकी प्रसन्नता तो प्रियतम की प्रसन्नता में है। प्यारा प्रसन्न है, इसलिये उसे भी प्रसन्न रहना चाहिये, क्योंकि प्यारे से पृथक उसका अस्तित्व ही नहीं। तब प्यारे से विरुद्ध उसकी कोई चेष्टा हो ही कैसे सकती है? इसी का नाम मधुर भाव है, यही सर्वश्रेष्ठ भाव है, इसमें भावान्वित हुए पुरुष की सभी क्रियाएँ बंद हो जाती हैं। उसका अपनापन एकदम नष्ट हो जाता है। उसका शरीर यन्त्र की तरह अपने-आप ही थोड़ी -बहुत चेष्टा करता रहता है।ऐसा भाव किसी भाग्यवान पुरुष को ही प्राप्त हो सकता है। लाखों में क्या करोड़ो में कोई एक इस भाग वाले पुरुष होते हैं, फिर उनके दर्शन तो किसी परम सौभाग्याशाली पुरुष को ही प्राप्त हो सकते हैं।आप तो श्रीकृष्ण के निजजन हैं। आपके लिये कौन-सा भाव दुर्लभ है? भगवान ने आपको तो अपना कहकर वरण कर लिया है। जिसे वे अपना कहकर स्वीकार कर लेते हैं वही इस भाव में दीक्षित हो सकता हैयोग- यज्ञ और जप-तप करके ही कोई अपने को इस भाव में दीक्षित होने का अधिकारी समझ बैठे तो यह उसकी अनधिकार चेष्टा ही कही जा सकती है।'
अत्यन्त ही दीन भाव से प्रकाशानन्द जी ने कहा- 'प्रभो! आज मेरा पुनर्जन्म हुआ। मैं अपना परम सौभाग्य समझता हूँ कि भगवान ने मुझे अपनी शरण में ले लिया। अब मेरे पुनर्जन्म का नाम रख दीजिये और मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं कहाँ रहूँ और क्या करूँ?'
प्रभु ने प्रेमपूर्वक कहा- 'प्रबोधानन्द जी! आपको बोध तो पहले से ही था, अब प्रभु की परम कृपा होने से आपको प्रकर्ष बोध हुआ है। इसलिये आज से प्रकाशानन्द जी के स्थान में आपका नाम प्रबोधानन्द जी हुआ रहने का एक ही ठाम है, 'श्री वृन्दावन धाम, 'और करने का एक ही काम है' श्री वृन्दावन विहारी का अहर्निश नाम-संकीर्तन। 'श्रीकृष्ण-कृष्ण रटिये और श्री वृन्दावन में बसिये। इसी में परम कल्याण है! प्राणि मात्र के उद्धार का यही सर्वश्रेष्ठ उपाय है।'
प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके श्री प्रकाशानन्द जी उसी समय प्रभु की चरणधूलि मस्तक पर मठ, मन्दिर, शिष्य, सम्पत्ति सभी को छोड़कर श्री वृन्दावन के लिये चल दिये और वहाँ पहुँचकर कालियदमन घाट के समीप रहने लगे। अन्तिम जीवन इन्होंने अत्यन्त ही मधुर भाव से व्यतीत किया। ये पागलों की तरह ऊपर हाथ उठा-उठाकर नृत्य किया करते थे। ये हृदय से अपने को श्रीकृष्ण की सहचरी गोपी समझते।इनका मधुर भाव का गुप्त नाम था 'गुणचूड़ा सखी'। कालियदमन के समीप ये एक कुटिया में रहकर अहर्निश कृष्ण कीर्तन किया करते थे। प्रकाण्ड पण्डित होने के साथ ये संस्कृत के अच्छे कवि भी थे। इनकी कविता बड़ी ही सुन्दर, सुललित तथा भाव पूर्ण होती थी। इन्होंने वृन्दावन की पवित्र भूमि में ही अपने इस पांच भौतिक शरीर का त्याग किया। कालियदमन के समीप अभी तक इनकी समाधि बनी है।
इनके बनाये हुए 'श्री चैतन्यचन्द्रामृत', 'श्री वृन्दावनरसामृत', श्री वृन्दावनशतक' और 'श्री राधरससुधानिधि'- ये चार ग्रन्थ पाये जाते हैं, जिनमें हजारों श्लोक हैं। 'श्री चैतन्यचन्द्रामृत' बड़ा ही मधुर काव्य है। उसके बहुत-से छन्द तो इतने भावूपर्ण हैं कि पढ़ते-पढ़ते चित्त नाचने लगता है। इनके एक-एक पद से महाप्रभु के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा प्रकट होती है।इनकी चैतन्य चरणों में बड़ी ही अनोखी और अहैतु की भक्ति थी। श्रीकृष्ण और श्रीकृष्ण चैतन्य के गुणगान करने में ही इन्होंने अपनी कमनीय कविता का सदुपयोग किया है। स्थानाभाव से यहाँ हम इनकी सुन्दर कविताओं को उदधृत नहीं कर सकते। ' चैतन्यचन्द्रामृत' में एक स्थल पर श्री चैतन्य चरणें से अपनी प्रगाढ़ प्रीति प्रदर्शित करते हुए ये कहते हैं-
निष्ठां प्राप्ता व्यवह्रतिततिर्लौंकिकी वैदिकी वा
या वा लज्जा प्रहसनसमुदगाननाटयोत्सवेषु।
ये वाभूवन्नहह सहजप्राणदेहार्थधर्मा
गौरश्चौर: सकलमहरत् कोऽपि में तीव्रवीर्य:।
'अत्यन्त ही बलवान किसी गौरवर्ण के चोर ने आकर हमारी लौकिकी और वैदिकी व्यवहार निष्ठा को (संकीर्तन करते समय) जोर-जोर से हंसने, आने तथा नृत्योत्सव में होने वाली लज्जा को और प्राण तथा देह के कारण-स्वरूप जो स्वाभाविक धर्म हैं, उन सभी को जबरदस्ती छीन लिया।
अर्थात उस गौरांग चोर ने हमें इन सभी वस्तुओं से रहित बना दिया।' अहा, धन्य है, ऐसे लुटे हुए यात्री को और लूटने वाले चोर को। हम लूटने वाले चोर के और लुटने वाले महाभाग यात्री के चरणों में बार-बार प्रणाम करते हैं।
श्री सनातन वृन्दावन को और प्रभु पुरी को…..
लगभग दो मास काशी जी में निवास करके महाप्रभु ने दो प्रधान कार्य किये। एक तो सनातन जी को शास्त्रीय शिक्षा दी और दूसरे श्री पाद प्रकाशानन्द जी प्रेमदान दिया। प्रकाशानन्द जी-जैसे प्रकाण्ड पण्डित के भाव परिवर्तन के कारण प्रभु की ख्याति सम्पूर्ण काशी नगरी में फैल गयी।
क्रमशः
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