303

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
303-
बहुत-से लोग प्रभु के दर्शनों के लिये आने-जाने लगे। बहुत-से वेदान्‍ती पण्डित प्रभु को शास्‍त्रार्थ के लिये ललकारते।
प्रभु नम्रता पूर्वक कह देते- 'मैं शास्‍त्रार्थ क्‍या जानूँ? जिन्‍हें, शास्‍त्रों के वाक्‍यों के ही बाल की खाल निकालनी हो वे निकालते रहें, मैंने तो सभी शास्‍त्रों का सार यही समझा है कि सब समय, सर्वत्र, सदा भगवान नारायण का ही ध्‍यान करना चाहिये। जो आस्तिक पुरुष मेरी इस बात का खण्‍डन करें, वह मेरे सामने आवें।
प्रभु के इस उत्‍तर को सुनकर सभी चुप हो जाते और अपना सा मुख लेकर लौट जाते। बहुत भीड़-भाड़ और लोगों के गमनागमन से प्रभु का चित्त ऊब सा गया। प्रभु को बहुत बातें करना प्रिय नहीं था। वे श्रीकृष्‍ण कथा के अतिरिक्त एक शब्‍द सुनना भी नहीं चाहते थे।संसारी लोगों के सम्‍पर्क से सांसारिक बातें छिड़ ही जाती हैं, यह बात प्रभु को पसंद नहीं थी। इसीलिये उन्‍होंने ही पुरी जाने का निश्‍चत कर लिया। प्रभु के निश्‍चय को समझकर दीन भाव से हाथ जोड़े हुए श्री सनातन जी ने पूछा- 'प्रभो! मेरे लिये क्‍या आज्ञा होती है?'

प्रभु ने कहा- 'तुम भी अपने भाई के ही पथ का अनुसरण करो। वृन्‍दावन में रहकर तुम दोनों भाई व्रजमण्‍डल के लुप्‍त तीर्थो का फिर से उद्धार करो और भगवान की अप्रकट लीलाओं का भक्ति ग्रन्‍थों द्वारा प्रचार करो। तुम दोनों ही भाई वैराग्‍यवान हो, पण्डित हो, रसमर्मज्ञ हो, कवि हृदय के हो, तुम्‍हारे द्वारा जिन ग्रन्‍थों का प्रणयन होगा उनसे लोगों का बहुत अधिक कल्‍याण होगा। व्रजमण्‍डल में आये हुए गौड़ीय भक्‍तों की देख-रेख का कार्य भी मैं तुम्‍हीं लोगों को सौंपता हूँ।'
हाथ जोड़े हुए विवशता के स्‍वर में सनातन जी ने कहा- 'प्रभो! हम अधम भला इस इतने बड़े कार्य के योग्‍य कैसे हो सकते हैं? किन्‍तु हमें इससे क्‍या? हम तो यन्‍त्र है, यन्‍त्री जिस प्रकार घुमायेगा, घूमेंगे, जो करावेगा, करेंगे। हमारा इसमें अपना पुरुषार्थ तो कुछ काम देगा ही नहीं।'
प्रभु ने कहा- 'तुम इस कार्य में प्रवृत्त तो हो, श्रीहरि स्‍वत: ही तम्‍हारे हृदय में शक्ति का संचार करेंगे। तम्‍हारे हृदय में स्‍वत: ही श्री कृष्‍ण लीलाओं की स्‍फुरणा होने लगेगी।’
इस प्रकार सनातन को समझा-बुझाकर प्रभु ने उन्‍हें वृन्दावन जाने के लिये राजी कर लिया।दूसरे दिन प्रात: काल ही प्रभु ने गंगा स्‍नान करके पुरी की ओर प्रस्‍थान कर दिया। तपन मिश्र, चन्‍द्रशेखर, रघुनाथ, परमानन्‍द कीर्तनिया, महाराष्‍ट्रीय ब्राह्मण तथा सनातन आदि प्रभु के अन्‍तरंग भक्‍त उनके पीछे-पीछे चले। प्रभु ने सभी को समझा-बुझाकर लौटा दिया, वे सभी को प्रेमपूर्वक आलिंगन करके बलभद्र भट्टाचार्य के सहित आगे बढ़े।भक्तगण मूर्च्छित होकर पृथ्‍वी पर गिर पड़े। श्री सनातन जी को प्रभु वियोग से अपार दु:ख हुआ। चन्‍द्रशेखर वैद्य उन्‍हें जैसे-तैसे उठाकर अपने घर लाये। दूसरे दिन वे भी सबसे विदा लेकर राजपथ से वृन्‍दावन की ओर चले।
इधर श्री रूपजी ने सुबुद्धिराय जी के साथ सभी वनों की यात्रा की। वे एक महीने तक व्रज में भ्रमण करते रहे। फिर उन्‍हें अपने भाई सनातन की चिन्‍ता हुई, इसलिये उनकी खोज में वे अपने छोटे भाई अनूप के सहित सारों होकर गंगा जी के किनारे-किनारे प्रयाग होते हुए काशी आये। काशी जी में आकर उन्‍हें सनातन जी का और प्रभु का सभी समाचार मिला।श्री सनातन जी मथुरा में जाकर अपने दोनों भाइयों की खोज करने लगे। सहसा इनकी सुबुद्धिराय जी से भेट हो गयी। उनसे पता चाल कि रूप और अनूप तो काशी होते हुए आपकी ही खोज में गौड़ देश को गये हैं।रूपजी गंगाजी के किनारे किनारे आये थे और सनातन जी सड़क-सड़क गये थे, इसीलिये रास्‍तें में इन दोनों भाइयों की भेट नहीं हुई। सनातन जी अब परम वैरागी संन्‍यासी की भाँति 'मथुरा माहात्‍म्‍य' पुस्‍तक के अनुसार व्रजमण्‍डल के सभी वनों और कुंजो में घूम-घूमकर लुप्‍त तीर्थो का पता लगाने लगे। वे घर-घर से टुकड़े मांगकर खाते थे और रात्रि में किसी पेड़ के नीचे पड़ रहते थे। इसी प्रकार ये अपने जीवन को बिताने लगे। इधर महाप्रभु भक्तों से विदा होकर झाड़ी खण्ड के रास्ते से पुरी की ओर चलने लगे। रास्ते मे‌ भिक्षा का प्रबन्ध उसी प्रकार बलभद्र भट्टाचार्य करते। कभी-कभी तो केवल साग और वन के कच्चे-पक्के फलों के ही ऊपर निर्वाह करना पड़ता। प्रभु रास्ते मे-

राम राघव राम राघव राम राघव रक्ष माम्।
कृष्‍ण केशव कृष्‍ण केशव कृष्‍ण केशव पाहि माम्।

इस पद का बड़े ही स्‍तर के सहित उच्‍चारण करते जाते थे। रास्‍ते में चलते-चलते प्रभु को बड़े जोरों की प्‍यास लगी। सामने से उन्‍हें आता हुआ एक ग्‍वाले का लड़का दीखा। उसके सिर पर एक मटकी थी। प्रभु ने उससे पूछा -'क्‍यों भाई ! इसमें क्‍या है?'
उस बच्‍चे ने बड़ी नम्रता के साथ कहा- 'स्‍वामी जी! इसमें मट्ठा है, मैं अपने पिता को देने के लिये जाता हूँ।' 
प्रभु ने कहा -'मुझे बड़ी प्‍यास लग रही है। क्‍या तुम मुझे यह मट्ठा पिला सकते हो?'
लड़के ने कहा-' महाराज! मैं पिला तो देता, किन्‍तु मेरे पिता मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।'
प्रभु ने कहा- 'अच्‍छी बात है, तो तुम उन्‍हीं के पास इसे ले जाओ।’
इतना कहकर प्रभु आगे चलने लगे। थोड़ी देर में उस लड़के ने कुछ सोचकर कहा- 'स्‍वामी जी! लौट आइये, आप इस मट्ठे को पी लीजिये।'
प्रभु ने कहा- 'तुम्‍हारे पिता नाराज होंगे, तब तुम क्‍या कहोगे?'
उसने कहा -' महाराज! उनके लिये तो मैं और भी ला सकता हूँ। देर हो जायगी तो थोड़े नाराज हो जायंगे, किन्‍तु आपको न जाने आगे कहाँ पानी मिलगा? धूप तेज पड़ रही है। आप प्‍यासे जायँगे, इससे मेरा दिल धड़क रहा है। चाहे कुछ भी क्‍यों न हो, मैं आपको प्‍यासा न जाने दूंगा।'
प्रभु ने कहा-' नहीं भाई! तुम्‍हारे पिता तुमसे नारज हों, यह ठीक नहीं है। मुझे तो कहीं-न-कहीं आगे जल मिल ही जायगा।'
प्रभु की इस बात को सुनकर उस बच्‍चे ने आकर प्रभु के पैर पकड़ लिये और रोते-रोते उनसे मट्ठा पीने की प्रार्थना करने लगा। दयालु प्रभु, उसके आग्रह को टाल न सके और उसके कहने से उस मिट्टी के बड़े बर्तन के सम्‍पूर्ण मट्ठे को पी गये। मट्ठे को पीकर प्रभु ने जोरों से उस लड़के को आलिंगन किया।
क्रमशः

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