304

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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प्रभु का आलिंगन पाते ही वह प्रेम में उन्‍मत्त होकर 'हरि हरि' कहकर नृत्‍य करने लगा उस समय उसकी दशा बड़ी ही विचित्र हो गयी थी।उसके शरीर में सात्त्विक भाव उदय होने लगे। इस प्रकार प्रभु उस बालक को प्रेमदान देकर आगे बढ़े। कई दिनों के पश्‍चात प्रभु पुरी के समीप पहुँच गये। दूर से ही उन्‍हें श्री जगन्‍नाथ जी की पताका दिखायी दी। श्री मन्दिर की पताका दर्शन होती ही प्रभु ने भूमि में लोटकर जगन्‍नाथ जी की फहराती हुई विशाल पताका को प्रणाम किया और वे अठारह नाला पर पहुँचे, अठारह नाला पर पहुँचकर आपने भक्‍तो को खबर देने के निमित्त बलभद्र भट्टाचार्य को भेजा और आप वहीं थोड़ी देर तक बैठकर रास्‍त की थकान मिटाने लगे।

प्रभु का पुरी में भक्तों से पुनर्मिलन….

शिवानन्‍द सेन के साथ उनका कुत्ता भी सब जगह उनके साथ चलता। उन्‍होंने उसे बहुत रोका, किन्‍तु वह किसी प्रकार भी न रुका, तब सेन महाशय उसे भोजन कराते हुए भी साथ ही साथ ले चलते। रास्‍ते में घाट वाले कुत्‍ते को पार उतारने में कई जगह आपत्ति भी करते, किन्‍तु सेन महाशय प्रचुर द्रव्‍य देकर उसे जिस किसी भाँति उसे पार करा ही ले जाते।

एक दिन उन्‍हें घाट वालों से उतराई का हिसाब करते करते बहुत देर हो गयी। उनके नौकर कुत्‍ते को भात देना भूल ही गये। इससे कुत्‍ता क्रद्ध होकर और इन सबका साथ छोड़कर न जाने किधर चला गया। शिवानन्‍द सेन जी ने कुत्‍ते की खोज करायी तो उसका कहीं भी पता नहीं चला, इससे उन्‍हें अपार दु:ख हुआ। दूसरे दिन सभी भक्‍त प्रभु के समीप पहुँचे। भक्‍तों ने देखा कि वही कुत्ता प्रभु के समीप बैठा और प्रभु उसे अपने हाथ से खीर खिला रहे हैं, और हंसते-हंसते उससे कह रहे हैं-

कृष्‍ण कहो, राम कहो, हरि भजो बावरे। 
हरिे के भजन बिनु खाओगे क्‍या पामरे।।

प्रभु की मधुर वाणी को सुनकर कुत्ता प्रेमपूर्वक पूँछ हिलाता हुआ अपनी भाषा में राम, कृष्‍ण, हरि आदि भगवान के सुमधुर नामों का कीर्तन कर रहा था। शिवानन्‍द सेन उस कुत्‍ते को प्रभु के पास बैठ देखकर परम आश्‍चर्य करे लगे। वह कुत्‍ता पहले सभी जगन्‍नाथपुरी में नहीं आया था और न उसने प्रभु का निवास स्‍थान देखा था, फिर यह अकेला ही यहाँ कैसे आ गया? सेन महाशय समझ गये कि यह कोई पूर्व जन्‍म का सिद्ध हैं, किसी कारणवश इसे कुत्‍ते की योनि प्राप्‍त हो गयी है। तभी तो प्रभु इसे इतना अधिक प्‍यार कर रहे हैं, यह सोचकर उन्‍होंने कुत्‍ते को साष्‍टांग प्रणाम किया। कुत्ता पूँछ हिलाता हुआ वहाँ से कही अन्‍यत्र चला गया। इसके अनन्‍तर फिर किसी ने उस कुत्‍ते को नहीं देखा।

महाप्रभु सभी भक्‍तों से मिले। भक्‍तों की पत्नियों ने प्रभु को दूर से ही प्रणाम किया। प्रभु स्त्रियों की ओर न तो कभी देखते थे, न उनका स्‍पर्श करते थे और न स्त्रियों के सम्‍बन्‍ध की बातें ही सुनते थे। स्त्रियों का प्रसंग छिड़ते ही प्रभु अत्‍यन्‍त ही संकुचित हो जाते और प्रसंग को जल्‍दी-से-जल्‍दी समाप्‍त कर देते।नवद्वीप में प्रभु के घर के समीप परमेश्‍वर नाम का एक भक्त रहता था। वह लड्डू बेचकर अपने परिवार का निर्वाह करता था। बाल्‍याकाल से ही वह प्रभु के प्रति अत्‍यन्‍त ही स्‍नेह रखता था।जब महाप्रभु बहुत ही छोटे थे, तभी परमेश्‍वर उन्‍हें गोद में बिठाकर उनसे 'हरि' 'हरि' बुलवाया करता था और खाने के लिये रोज लडडू देता था। प्रभु भी उससे बहुत स्‍नेह करते थे।अब वह बूढ़ा हो गया था, अब के वह भी अपनी पत्‍नी, पुत्र और पुत्रवधू के सहित प्रभु के दर्शनों को आया था। प्रभु के पास भीतर स्त्रियाँ नहीं जाती थीं, वे दूर से ही प्रभु का दर्शन करती थीं। भक्त परमेश्‍वर को इस बात का क्‍या पता था।उसने अपने कांपते हुए हाथों से भूमि में लोटकर प्रभु को प्रणाम किया और प्रेम के साथ कहने लगा- 'प्रभो! अपने परमेश्‍वर को तो भूल ही गये होंगे। मुझे अब शायद न पहचान सकेंगे।'
प्रभु ने उसका आलिंगन करते हुए अत्यन्त ही स्नेह से कहा- 'परमेश्‍वर! भला, तुम्हें मैं कभी भूल सकता हूँ? तुम्हारे लड्डू तो अभी तक मेरे गले में ही अटके हुए हैं, वे नीचे भी नही उतरे! तुम मुझे पुत्र की तरह प्यार करते थे।'

परमेश्वर ने बड़े ही उल्‍लास के साथ कहा- 'प्रभो! आपका पुत्र, पुत्रवधू तथा घर से सभी आपके दर्शनों के लिये आये हैं। वे सभी आपके दर्शनों को उत्‍सुक हैं।' 
यह कहकर भक्त ने सभी से प्रभु के पाद-स्‍पर्श कराये। भक्‍त वत्‍सल प्रभु संकोच के कारण कुछ भी न कह सके।
वे लज्जित भाव से नीचा सिर किये हुए चुपचाप बैठे रहे। परमेश्‍वर के चले जाने पर भक्‍तों ने उसे समझाया कि प्रभु के समीप सपरिवार नहीं जाया जाता।बेचारा सरल भक्‍त इस बात को क्‍या समझे। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया। तब भक्‍तों ने उसे समझा दिया। इस प्रकार सभी भक्‍त प्रभु के समीप रहकर पूर्व की भाँति सत्‍संग सुख का अनुभव करने लगे। भक्‍तों की पत्नियाँ बारी-बारी से रोज प्रभु का निमन्‍त्रण करतीं और उन्‍हें अपने निवास स्‍थान पर बुलाकर भिक्षा करातीं।

इधर प्रभु के दर्शनों की लालसा से श्री रूपजी अपने भाई अनूप सहित गौड़ देश होते हुए पुरी को आने लगे। रास्‍ते में अनूप जी को ज्‍वर आ गया, दैव की गति, ज्‍वर-ही-ज्‍वर में वे इस नश्‍वर शरीर को परित्‍याग करके परलोकवासी बन गये।श्री रूप ने अत्‍यन्‍त ही दु:ख के साथ अपने कनिष्‍ठ भाई का शरीर गंगा जी के पावन प्रवाह में कर दिया और वे संसार की अनित्‍यता का विचार करते हुए पुर में आये। श्री वृन्‍दावन में ही उन्‍होंने श्रीकृष्‍ण लीला विषयक एक नाटक लिखना आरम्‍भ कर दिया था।
रास्‍ते में वे नाटक के विषय को सोचते जाते थे और रात्रि को जहाँ ठहरते थे, वहीं उस सोचे हुए विषय को लिख लेते थे। उनकी इच्‍छा थी कि एक ही नाटक को दो भागों में विभक्‍त करेंगे, पूर्व भाग में तो श्रीकृष्‍ण की वृन्‍दावन-लीलाओं का सम्मिलित रूप से ही लिख रहे थे।
रास्‍ते में चलते-चलते जब वे उड़िया देश में 'सत्‍यभामापुर' नामक ग्राम में आये, तो वहाँ स्‍वप्‍न में श्री सत्‍यभामा जी ने प्रत्‍यक्ष होकर इन्‍हें आदेश दिया।
क्रमशः

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