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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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ऐसे स्वाभाविक गुणपूर्ण श्लोक की रचना सभी कवि नहीं कर सकते।'
इतना कहर राय ने 'विदग्धमाधव'- के अन्य भी बहुत-से स्थलों को सुना और सुनकर उनके काव्य की हृदय से भूरि-भूरि प्रशंसा की। 'विदग्धमाधव' को सुन लेने पर राय रामानन्द जी कहने लगे- 'अपने दूसरे नाटक 'ललितमाधव' की माधुरी की बानगी भी इन सभी उपस्थित भक्तों को चखा दीजिये। हाँ, उसका भी पहले मंगलाचरण का श्लोक सुनाइये। यह सुनकर श्री रूपजी फिर उसी लहज के साथ श्लोक पढ़ने लगे-
सुररिपुसुदृशमुरोजकोकान्
मुखकमलानि च खेदयन्नखण्ड:।
चिरमखिलसुहृच्चकोनन्दी
दिशतु मुकुन्दयश:शशी मुदं व:।।[ललितमाधव ना. 1/1]
धन्य है, धन्य है और साधु-साधु की ध्वनि समाप्त होने पर राय महाशय ने कहा- 'श्री भगवान की स्तुति के अनन्तर इष्टस्वरूप श्री गुरुदेव की स्तुति में जो श्लोक हो उसे भी सुनाइये। उसके श्रवण से यहाँ सभी उपस्थित भक्तों को अत्यन्त ही आह्लाद होगा। हाँ सुनाइये। प्रभु की ओर न देखते हुए धीरे-धीरे श्री रूप जी पढ़ने लगे-
निजप्रणयितां सुधामुदयमाप्नुवन् य: क्षितौ
किरत्यलमुरीकृतद्विजकुलाधिराजस्थि।
स लुंचिततमस्ततिर्मम शचीसुतासख्य: शशी
वशीकृतजगन्मना: किमपि शर्म विन्यस्यतु।
जो अवनि पर उदित होकर द्विजराज की स्थिति में रहते हुए निजप्रणयरूपी रसामृत को वितीर्ण कर रहे हैं और अज्ञानरूपी अन्धकार समूह को दूर करते हैं, वे ही सम्पूर्ण जगत के मन को वश में करने वाले 'शचीनन्दन' नाम के चन्द्रमा हमारा कल्याण करें- हमारे लिये मंगल विधान करें। (ललितमाधव ना. 1/2)_
इस श्लोक को सुनते ही प्रभु कुछ बनावटी क्रोध के स्वर में कहने लगे- 'रूप ने और सम्पूर्ण काव्य तो बहुत ही सुन्दर बनाया। इनका एक-एक श्लोक अमूल्य रत्न के समान है, किन्तु जाने क्या समझकर इन्होंने ये दो-एक अतिशयोक्ति पूर्ण श्लोक मणियों में काँच के टुकड़ो के समान मिला दिये हैं?
इस पर भक्तों ने एक स्वर से कहा-' हमें तो यही श्लोक सर्वश्रेष्ठ प्रतीत हुआ है।' बात को यहीं समाप्त करने के लिये राय महाशय ने कहा-' अच्छा, छोड़िये इस प्रसंग को। आगे काव्य की मधुरिमा का पान कीजिये। हाँ, रूप जी! इस नाटक के भी भाव पूर्ण अच्छे-अच्छे स्थल पढ़कर सुनाइये।'
इतना सुनते ही श्री रूपजी नाटक के अन्यान्य स्थलों को बड़े स्वर के साथ सुनाने लगे। सभी रसमर्मज्ञ भक्त उनके भक्तिभाव पूर्ण काव्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। अन्त में प्रभु रूपजी का प्रेम से आलिंगन करके भक्तों को साथ लेकर अपने स्थान पर चले गये।
इस प्रकार भक्तों के साथ रथ यात्रा और चातुर्मास के सभी त्यौहारों तथा पर्वो को पहले की भाँति धूमधाम से मनाकर, क्वार के दशहरे के बाद भक्तों को गौड़ के लिये विदा किया। नित्यानन्द जी से प्रभु ने प्रतिवर्ष पुरी न आने का पुन: आग्रह किया; किन्तु उन्होंने प्रभु-प्रेम के कारण इसे स्वीकार नहीं किया। सभी भक्त गौड़ देश को लौट गये। श्री रूप कुछ दिनों प्रभु के पास और रहे। अन्त में कुछ समय के पश्चात प्रभु ने उन्हें वृन्दावन में ही जाकर निवास करने की आज्ञा दी।प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके वे गौड़ देख होते हुए वृन्दावन जाने के लिये उद्यत हुए। यही इनकी प्रभु से अन्तिम भेंट थी। यहाँ से जाकर ये अन्तिम समय तक श्री वृन्दावन की पवित्र भूमि में ही श्री कृष्ण-कीर्तन करते हुए निवास करते रहे। व्रज की परम पावन भूमि को छोड़कर ये एक रात्रि के लिए भी व्रज से बाहर नहीं गये। प्रभु ने जाते समय इनका प्रेम पूर्वक आलिंगन किया और भक्ति विषयक ग्रन्थों के प्रणयन की आज्ञा प्रदान की।इन्होंने प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके श्री कृष्ण के गुणगान में ही अपना सम्पूर्ण समय बिताया। गौड़ में इनकी कुछ धन-सम्पत्ति थी, उसका परिवार वालों में यथारीति विभाग करने के निमित्त इन्हें गौड़ भी जाना था, इसलिये ये प्रभु से विदा होकर गौड़ देश को गये और वहाँ इन्हें लगभग एक वर्ष धन-सत्पत्ति की व्यवस्था करने के निमित्त ठहरना पड़ा।
नीलांचल में सनातन जी….
श्री वृन्दावन लौटे हुए श्री सनातन को महाप्रभु श्री गौरांग देव ने श्री जगन्नाथ जी के रथ के चक्र के नीचे दबकर मरने के विचार से हटाकर और कठिन परीक्षा करके शुद्ध बना दिया। श्री रूप तो सम्पत्ति की व्यवस्था करने के निमित्त गौड़ देश में ठहरे हुए हैं, इनके भाई श्री सनातन जी ने 'मथुरामाहात्म्य' हस्तगत करके उसी के अनुसार व्रजमण्डल के समस्त तीर्थो की यात्रा की। यात्रा के अनन्तर उन्हें अपने भाई से भेंट करने तथा प्रभु के दर्शनों की इच्छा हुई।अपने भाइयों का समाचार जानने के लिये वे व्रज से नीलांचल की ओर चल पड़े। गौड़ तो उन्हें जाना ही नहीं था, क्योंकि ये जेलर को इस बात का वचन दे आये थे। अत: प्रयाग से काशी होते हुए झाड़ी खण्ड के विकट रास्ते से ये जंगल के कण्टकाकीर्ण भयंकर पंथ के ही पथिक बने।रास्ते में जंगल की झाड़ियों की विषैली वायु लगने से इनके सम्पूर्ण अंग में भंयकर खुजली हो गयी। खुजली पक भी गयी और उससे पीब बहने लगा। जैसे तैसे ये पुरी में पहुँचे। पुरी में ये कहाँ ठहरें? पहले कभी आये नहीं थे। इतना उन्होंने सुन रखा था कि प्रभु कहीं मन्दिर के ही समीप में रहते हैं, किन्तु यवनों के संसर्गी होने के कारण ये अपने को मन्दिर के समीप जाने का अधिकारी ही नहीं समझते थे, इसलिये ये महात्मा हरिदास जी का स्थान पूछते-पूछते वहाँ पहुँचे।
हरिदास जी इन्हें देखते ही खिल उठे इनकी यथो योग्य अभ्यर्चना की। सनातन प्रभु के दर्शनों के लिये बड़े उत्सुक हो रहे थे किन्तु मन्दिर के समीप न जाने के लिये विवश थे, तब हरिदास जी ने इन्हें धैर्य बंधाते हुए कहा- 'आप घबड़ाइये नहीं, प्रभु यहाँ नित्य प्रति आते हैं, वे अभी आते ही होंगे।'
इतने में ही दोनों ने श्री हरि के मधुर नामो का संकीर्तन करते हुए प्रभु को दूर से आते हुए देखा। प्रभु को देखते ही एक ओर हटकर श्री सनातन जी भूमि पर लोटकर साष्टांग प्रणाम करने लगे। हरिदास जी ने कहा- 'प्रभो! सनातन साष्टांग कर रहे हैं।'
'सनातन यहाँ कहाँ।'
इतना कहते हुए प्रभु जल्दी से सनातन का आलिंगन करने के लिये दौडे़। प्रभु को अपनी ओर आते देखकर सनातन जी जल्दी से उठकर एक ओर दौडे़ और कातर स्वर से कहते जाते थे- 'प्रभो मैं नीच एक तो वैसे ही अधम, नीच और यवन-संसर्गी था।
क्रमशः
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