307
श्री श्री चैतन्य चरितावली
307-
तिस पर भी मेरे सम्पूर्ण शरीर में खाज हो रही है।आप मेरा स्पर्श न करें।'
किन्तु प्रभु कब सुनने वाले थे। जल्दी से दौड़कर उन्होंने बलपूर्वक सनातन जी को पकड़ लिया और उनका गाढ़ालिंगन करते हुए वे कहने लगे- 'आज हम कृतार्थ हो गये। सनातन के शरीर की सुन्दर सुगन्ध को सूंघकर हमारे लोक-परलोक दोनों ही सुधर गये।'
सचमुच प्रभु ने सनातन जी के दिव्य शरीर में की खाज मे से एक प्रकार की दिव्य सुगन्धित का अनुभव किया। सनातन जी संकोच के कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो ये। महाप्रभु की अपार अनुकम्पा के भार से दबे हुए वे विवश होकर पृथ्वी की ओर दखने लगे।
महाप्रभु की अहैतु की कृपा के स्मरण से उनका हृदय पिघल रहा था और वह पानी बन-बनकर आँखों के द्वारा निकल कर प्रभु के काषाय रंग वाले वस्त्रों को भिगो रहा था।थोड़ी देर के अनन्तर प्रभु वहीं एक आसन पर बैठ गये। नीचे सिर किये हुए भूमि पर सनातन जी और हरिदास जी बैठ गये। प्रभु ने धीरे-धीरे रूप के आने का और उनके मिलने आदि का सभी वृत्तान्त सुना दिया।इसी प्रसंग में प्रभु ने श्री अनूप के परलोकगमन का समाचार भी सुना दिया। भाई के वैकुण्ठवास का समाचार सुनकर वीतराग महात्मा सनातन जी का भी हृदय उमड़ आया। वे अपने अश्रुओं के प्रवाह को रोक नहीं सके। प्रभु के कमल मुख पर भी विषण्णता के भाव प्रतीत होने लगे।
प्रभु ने धीरे-धीरे भर्राई हुई आवाज से कहा- 'सनातन! तुम्हारे भाई ने सदगति पायी। वे परम भागवत पुरुषों के लोक में परमानन्द-सुख का अनुभव करते होंगे, उनसे बढ़कर सौभाग्यशाली हो ही कौन सकता है, जिन्होंने देहत्याग के पूर्व अपना घरबार त्याग दिया, व्रजमण्डल के सभी तीर्थो की यथाविधि यात्रा की और अन्तिम समय में अपने परम भागवत गुरु स्वरूप जयेष्ठ भ्राता श्री रूपजी की गोद में सिर रखकर भगवती भागीरथी के रम्य तट पर इस नश्वर शरीर को त्याग दिया और वैकुण्ठवासी बन गये, उन महाभाग के निमित्त तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। ऐसी मृत्यु के लिये तो इन्द्रादि देवता भी तरसते हैं।'
रूंधे हुए कण्ठ से आंसू पोंछते हुए श्री सनातनजी ने कहा- 'प्रभो! मैं उन महाभाग के शरीर के लिये रुदन नहीं कर रहा हूँ। वे तो नित्य हैं, शाश्वत धाम में जाकर अपने इष्टदेव श्री सीता-राम जी के चरणाश्रित बन गये होंगे, किन्तु मुझे इसी बात का सोच हो रहा है कि अन्तिम समय मैं उनके दर्शन नहीं कर सका। मैं अभागा उनके निधन काल के दर्शनों से वंचित ही रहा।'
प्रभु ने करूण स्वर में कहा-' रूप कहते थे, उनकी निष्ठा अलौकिक थी, अन्तिम समय में उन्होंने श्री सीताराम जी का ध्यान और स्मरण करते हुए प्रसन्नता पूर्वक ही शरीर त्याग किया।'
सनातन जी ने पश्चात्ताप के स्वर में कहा- प्रभो! मैं उनकी निष्ठा आपके सम्मुख क्या बताऊँ। कहने को तो वे हमारे छोटे भाई थे, किन्तु निष्ठा में वे हम दोनों से बढ़कर थे। उनकी-जैसी निष्ठा मैनें आज तक किसी में भी नहीं देखी। हमारी तो निष्ठा ही क्या, उनके सामने हमारी निष्ठा तो नहीं के ही समान है।वे सदा हमारे साथ रहते और तीनों ही मिलकर श्रीमद्भागवत की कथा सुना करते। उनके इष्टदेव श्री सीता-राम जी थे। हम दोनों ने एक दिन परीक्षा से निमित्त उनसे कहा- 'अनूप! तुम स्वयं समझदार हो, श्री रामचन्द्र जी की लीलाओं की अपेक्षा श्री कृष्णचन्द्र जी की लीलाओं में अधिक माधुर्य है, इसलिये तुम श्री कृष्ण को ही अपना उपास्यदेव क्यों नहीं बना लेते।इससे तीनों ही भाई श्री कृष्णोपासक होकर साथ-ही-साथ उपसना-भजन और कीर्तन किया करेंगे।'
वे हम दोनों का अत्यधिक आदर करते थे; हमारी बात को उन्होंने कभी नहीं टाला। हमारे ऐसे कथन को उन्होंने स्वीकार कर लिया और कहा- 'आप दोनों भाई ही मेरे गुरु, माता-पिता तथा शिक्षक हैं।आप जैसा कहेंगे वैसा ही करुँगा। कल मुझे कृष्णमन्त्र की ही दीक्षा दे देना।’
इतना कहकर वे सोने चले गये। हमने देखा, वे रात्रि भर हाय-हाय करते रहे, एक क्षण को भी नहीं सोये। प्रात: काल उन्होंने आकर हमसे कहा- 'भाइयो! मैं क्या करूँ, यह सिर तो मैं श्री सीताराम जी के में चढ़ा चुका।रात्रि को मैंने बहुत चेष्टा की कि उस चढ़ाये हुए सिर को फिर से लौटा लूँ, किन्तु मेरी हिम्मत नही पड़ी। मैं इस शरीर को प्रसन्नता पूर्वक त्याग सकता हूँ, किन्तु मुझसे श्री सीताराम जी की उपासना न छोड़ी जायगी।
उनकी ऐसी एकान्तिक निष्ठा को देखकर हमें परम आश्चर्य हुआ और अपनी निष्ठा को बार-बार धिक्कार ने लगे। सो, प्रभो! वे मेरे भाई सचमुच ही अनूप थे, उनकी उपमा किसी से दी ही नहीं जा सकती।'
प्रभु ने कहा- 'यथार्थ निष्ठा तो इसी का नाम है। ठीक इसी प्रकार मैंने श्री रामोपासक मुरारी गुप्त से भी यही बात कही थी और उन्होंने भी यही उत्तर दिया था। सेव्य- सेवक का भाव इसी प्रकार ऐकान्तिक और दृढ़ होना चाहिये, जो किसी प्रकार के भी प्रलोभन आने पर हिल न सके। तभी प्रभु प्रेम की प्राप्ति हो सकती है।'
इस प्रकार प्रभु बहुत देर तक श्री सनातन जी से बातें करते रहे। अन्त में उन्हें वहीं हरिदास जी के ही समीप रहने का आदेश देकर आप अपने स्थान के लिये चले गये और गोविन्द के हाथों दोनों के ही लिये श्री जगन्नाथ जी का महाप्रसाद भिजवाया। इस प्रकार सनातन जी पुरी में ही हरिदास जी के समीप रहने लगे। प्रभु नियमित रूप से इन दोनों को देखने के लिये आया करते थे।
श्री सनातन जी लगभग चैत्रमास में पुरी पधारे थे। वे भीतर मन्दिर में दर्शनों के लिये न जाकर दूर से ही मन्दिर की पताका को प्रणाम कर लेते थे। शरीर का भोग अच्छे-अच्छे महापुरुषों को भी भोगना पड़ता है।सनातन जी की भंयकर खाज अभी अच्छी नहीं हुई। खुजाते-खुजाते उनके सम्पूर्ण शरीर में बड़-बड़े घाव हो गये और उनमें से निरन्तर पीब बहता रहता था। ज्येष्ठ का महीना था। प्रभु पुरी से चार-पांच मील की दूरी पर यमेश्वर टोटा में गये हुए थे। बाहर बजे उन्होंने सनातन को भी भिक्षा के लिये वहीं बुलाया। यमेश्वर जाने के लिये दो मार्ग थे- एक तो सिंहद्वार होकर सीधे सड़क-सड़क जाना होता है।
क्रमशः
Comments
Post a Comment