308

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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दूसरे समुद्र के किनारे-किनारे भी यमेश्वर जा सकते हैं। ज्‍येष्‍ठ की प्रखर धूप के कारण समुद्र-किनारे की बालू जल रही थी। यदि उसमें कच्‍चा चना डाल दिया जाय तो क्षणभर में भुनकर खिल जाये। उस बालू में मनुष्‍य की तो बात ही क्‍या, बारह बजे पशु भी जाने में हिचकता हैं, किन्‍तु जब सनातन जी ने सुना कि प्रभु ने मुझे बुलाया है, तब तो ये अपने भाग्‍य की सराहना करते हुए उसी बालुकामय पथ से नंगे पैरों ही प्रभु के समीप पहुँचे।शरीर को सर्दी-गर्मी का सुख-दु:ख व्‍यपता ही है। सनातन जी के पैरों में बड़े-बड़े छाले पड़ गये। प्रभु ने उन्‍हें देखते ही पूछा- 'अरे! तुम इतनी धूप में किधर होकर आये हो?'
सरलता के साथ सनातन जी ने कहा- 'प्रभो! समुद्र तट के रास्‍ते से ही आया हूँ।'
प्रभु ने उनके पैरों के छालों को देखते हुए कहा- 'देखे, नंगे पैरों तप्‍त बालू में आने से तुम्‍हारे पैरों में छाले पड़ गये। तुम सिंहद्वार के रास्‍ते होकर क्‍यों नहीं आये?'
सनातन जी ने दीनता के साथ कहा- प्रभो! सिंहद्वार होकर श्री जगन्‍नाथ जी के सेवक तथा दर्शनार्थी आते-जाते रहते है, उनसे कहीं भूल में स्‍पर्श हो जाय तो मैं ही पाप का भागी बनूँगा। इसी भय से मैं सिंहद्वार होकर नहीं आया।'

प्रभु इनकी ऐसी मर्यादा, दीनता और सरलता को देखकर मन-ही-मन बहुत प्रसन्‍न हुए और उनका जोरों से गाढ़ालिंगन करते हुए कहने लगे- 'सनातन! तुम धन्‍य हो, तुम्‍हीं वैष्‍णवता के सच्‍चे रहस्‍य को समझे हो।यद्यपि तुम्‍हारे लिये स्‍वयं कोई विधि-निषेध नहीं है, फिर भी तुम लोक मर्यादा के निमित्त ऐसा व्‍यवहार करते हो, यह सर्वश्रेष्‍ठ है। मुनष्‍य चाहे कितनी भी उन्‍नति क्‍यों न कर ले फिर भी उसे मर्यादा का उल्‍लंघन न करना चाहिये क्‍योंकि मर्यादा भंग करने से लोकनिन्‍दा होती है और लोकनिन्‍दा से सदा पतन का भय बना रहता है।' 
सनातन के आलिंगन से प्रभु के सुवर्ण के समान सुन्‍दर शरीर में कई जगह पीब लग गया, इससे सनातन जी को अपार दु:ख हुआ, वे सोचने लगे कि क्‍या करूं, प्रभु तो मेरा आलिंगन बिना किये मानते ही नहीं।इसीलिये अब इस भंयकर शरीर को रखकर क्‍या करूंगा। प्रभु के दर्शन तो हो ही गये। रथ यात्रा के दिन जगन्‍नाथ जी के दर्शन और करके उन्‍हीं के रथ के नीचे पिचकर मर जाऊंगा!'

महाप्रभु इनके मनोभाव को समझ गये। वे एक दिन भक्‍तों  के सहित आकर सनातन जी से बातें करने लगे।उन्‍होंने बातों-ही बातों में कहा- 'सनातन! शरीर त्‍याग ने से तुमने क्‍या लाभ सोचा है? मनुष्‍य का अन्तिम पुरुषार्थ प्रभु प्राप्ति है, यदि शरीर त्‍याग ने से प्रभु प्राप्ति हो सके, तो मैं तो हजारों बार शरीर धारण करके उन्‍हें त्‍याग ने को तैयार हूँ।इस प्रकार शरीर त्‍यागना तामसी प्रवृति है। जो संसारी तापों से खिन्‍न होकर किसी कारण से शरीर से ऊबकर प्राण त्‍याग देते हैं, उनकी सदगति नहीं होती। उन्हें फिर कर्मों के भोग के निमित्त आसुरी प्रकृति के शरीर धारण करने होते हैं। शरीर का सदप्रयोग श्रीकृष्‍ण संकीर्तन करने में ही है।यदि आसुरी प्रकृति के शरीर धारण करने होते हैं। शरीर का सदुपयोग श्री कृष्‍ण संकीर्तन करने में ही है। यदि भगवन्‍नामचिन्‍तन और स्‍मरण बना रहता है तो फिर शरीर कैसी भी दशा में रहे, विवेकी पुरुषो को शरीर की कुछ भी परवा न करनी चाहिये।'

प्रभु की बात सुनकर नीचा सिर किये हुए सनातन जी ने कहा- 'प्रभो! इस बेकार और अपवित्र शरीर को रखवाकर आप इससे क्‍या कराना चाहते हैं? इससे तो अब दूसरों को दु:ख के सिवा किसी प्रकार का लाभ नहीं पहुँचता।'
प्रभु ने कहा- 'तुम्‍हें हानि-लाभ से क्‍या?
तुम तो अपने शरीर को मुझे सौंप चुके। दान की हुई वस्‍तु को लौटाकर कोई उसका मनमाना उपयोग कर सकता है? तुम्‍हारे जाने मैं इसका कुछ भी उपयोग करूँ, तुम्‍हें इसे नष्‍ट करने का अधिकार नहीं है। इससे मुझे बड़े -बड़े काम कराने हैं।'
सनातन जी ने धीरे से कहा- 'प्रभो! आपकी आज्ञा का उल्‍लंघन करने की शक्ति ही किसमें है? जैसी आप आज्ञा करेंगे, वही मैं करूँगा।’
इस प्रकार सनातन जी को समझा-बुझाकर प्रभु भक्तों के सहित स्‍थान के लिये चले गये।सनातन जी ने आत्‍मघात का विचार तो परित्‍याग कर दिया, किन्‍तु प्रभु के आलिंगन करने के कारण उन्‍हें सदा सकोंच बना रहता। वे सदा प्रभु से बचे ही र‍हते किन्‍तु प्रभु उन्‍हें खोजकर आलिंगन करते। इससे वे सदा व्‍यथित-से बने रहते। एक दिन उन्‍होंने अपनी मनोव्‍यथा पुरी में ही प्रभु के समीप निवास करने वाले जगदानन्‍द पण्डित से कही।
जगदानन्‍द जी ने कहा- 'आपका पुरी में ही रहना ठीक नहीं है। आषाढ़ में रथ यात्रा के दर्शन करके यहाँ से सीधे वृन्‍दावन चले जाइये। आपके लिये प्रभु ने वही देश दिया है, उस प्रभुदत्त देश में जाकर भगवन्‍नाम-जप करते हुए समय व्‍यतीत कीजिये।'
सनातन जी ने प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहा- 'पण्डित जी! आपने यह बड़ी ही उत्‍तम सम्‍मति दी। आषाढ़ के पश्‍चात मैं यहाँ से अवश्‍य ही चला जाऊँगा।' 
ऐसा निश्‍चय करके वे रथ यात्रा की प्रतीक्षा करने लगे। एक दिन बातों-ही-बातों में उन्‍होंने प्रभु से कहा- 'प्रभो! मुझे पण्डित जगदानन्‍द जी ने बड़ी सुन्‍दर सम्‍मति दी है। रथ यात्रा करके मैं वृन्‍दावन चला जाऊँगा और वहीं रहूँगा।’

प्रभु जगदानन्‍द के ऐसे भाव को समझ कर उनके ऊपर प्रेम का क्रोध प्रकट करते हुए कहने लगे- जगदानन्‍द अपने को अब बड़ा भारी पण्डित समझने लगा, जो सनातन जी को भी शिक्षा देने लगा। हमें शिक्षा दे तो ठीक भी है, सनातन जी तो अभी इसे सैकड़ों वर्षों तक पढ़ा सकते हैं। मूर्ख कहीं का, कल का छोकरा होकर इतने बड़े लोगों को सम्‍मति देने चला है।'
इस बात को सुनकर जगदानन्‍द जी तो सन्‍न पड़ गये, काटो तो शरीर में रक्‍त नहीं। वे डबडबायी आँखों से पृथ्‍वी की ओर देखने लगे। तब सनातन जी ने अत्‍यन्‍त ही विनम्र भाव से प्रभु के पैर पकड़े हुए कहा- 'प्रभो! जगदानन्‍द जी ने तो मेरे हितकी ही बात कही है। आप मुझ पतित को स्‍पर्श करते हैं, इस बात से किसे दु:ख न होगा? मैं स्‍वयं संकुचित बना रहता हूँ।
क्रमशः

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