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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु ने फिर उसी स्वर में कहा- 'इसे मेरे शरीर की इतनी चिन्ता क्यों? यह शरीर ही सब कुछ समझता है। इसे वैष्णवों के माहात्म्य का पता नहीं। सनातन जी के शरीर को यह अन्य साधारण लोगों के शरीर के समान समझता है। इसे पता नहीं, सनातन जी का शरीर चिन्मय है। उसे खुजली और कुष्ठ कहाँ? यह तो उन्होंने मेरे प्रेम की परीक्षा के निमित्त अपने शरीर में उत्पन्न कर ली है कि मैं घृणा करके इनके शरीर को स्पर्श न करूँ। कोई भाग्यवान पुरुष सनातन जी के शरीर को सूँघे तो सही, उसमें से दिव्य सुगन्ध निकलती रहती है। मैं कुछ सनातन जी के ऊपर कृपा करने के निमित्त उनका आलिंगन थोड़े ही करता हूँ, मैं तो उनके शरीर-स्पर्श से अपने देह को पावन बनाता हूँ।'
प्रभु के मुख से अपनी इतनी भारी प्रशंसा सुनकर सनातन जी रोते-रोते कहने लगे- 'प्रभो! मैंने ऐसा कौन-सा घोर अपराध किया है, मेरे किन जन्मों के अनन्त पाप आज आकर उदय हुए हैं, जो आप मुझे यह प्रशंसारूपी हलाहल विष पिला रहे हैं। जगदानन्द जी का आज भाग्य उदय हुआ।आज त्रिलोकी में इनसे बढ़कर भाग्यवान कौन होगा, जिनकी वात्सल्य स्नेह से पुत्र की भाँति प्रभु भर्त्सना कर रहे हैं।हाय ऐसी प्रेममयी भर्त्सना जिनके भाग्य में बदी है, वे महानुभाव धन्य हैं! गुरुजन जिनकी नित्य आलोचना करते रहते हैं, वे परम सौभाग्यशाली पुरुष हैं। हे करुणा के सागर प्रभो! इस अधम को किस अपराध से अपनेपन से पृथक करके आपने यह प्रशंसा रूपी सर्पिणी बलपूर्वक मेरे गले से लपेट दी। नाथ! मैं अब अधिक सहन न कर सकूँगा।
सनातन जी की ऐसी कातर वाणी सुनकर प्रभु कुछ लज्जित-से हो गये और अत्यन्त ही प्रेम के स्वर में जगदानन्द जी की ओर देखकर कहने लगे- 'जगदानन्द ने मरे शरीर के स्नेह से और तुम्हारे आग्रह से ही ऐसी सम्मति दे दी होगी। मैंने अपने क्रोध के आवेश में ऐसी बातें इनके लिये कह दीं होगी। इसका कारण मेरा तुम्हारे ऊपर सहज स्नेह ही है।तुम इस वर्ष यहीं मेरे पास ही रहो, अगले वर्ष वृन्दावन जाना।'
इतना कहकर प्रभु ने सनातन जी का फिर जोरों से आलिंगन किया। बस, फिर क्या था! न जाने वह खुजली और उसकी पीड़ा कहाँ चली गयी! उसी समय उनकी खाज अच्छी हो गयी और दो-चार दिन में उनके घाव अच्छे होकर उनका शरीर सुवर्ण के समान कान्ति वाला बन गया।
रथ यात्रा के समय अद्वैताचार्य, नित्यानन्द आदि सभी गौड़ीय भक्त प्रतिवर्ष की भाँति अपने स्त्री-बच्चों के सहित पुरी में आये। प्रभु ने उन सबसे सनातन जी का परिचय कराया। सनातन जी प्रभु के परम कृपा पात्र इन सभी प्रेमी भक्तों का परिचय पाकर परम प्रसन्न हुए और उन्होंने सभी की चरणवन्दना की।सभी ने सनातन जी की श्रद्धा, दीनता और तितिक्षा की भूरि-भूरि प्रशंसा की। बरसात के चार महीने रहकर सभी भक्त देश के लिये लौट गये, किन्तु सनातन जी वहीं रह गये।वे दूसरे वर्ष प्रभु से विदा होकर और उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके पुरी से सीधे ही काशी होते हुए वृन्दावन पहुँचे। पुरी से चलते समय वे बलभद्र भट्टाचार्य से उस रास्ते के सभी स्थानों के नाम लिख ले गये थे, जिस रास्ते से प्रभु वृन्दावन गये थे, उन सभी स्थानों का दर्शन करते हुए और प्रभु की लीलाओं का स्मरण करते हुए उसी रास्ते से सनातन जी वृन्दावन पहुँचे।तब तक श्री रूप जी वृन्दावन में नहीं पहुचे थे। सनातन जी वहीं वृन्दावन वृक्षों के नीचे अपना समय बिताने लगे। कुछ दिनों के अनन्तर गौड़ देश से श्री रूप जी भी वृन्दावन पहुँच गये और दोनों भाई साथ ही श्री कृष्ण कथा कीर्तन करते हुए कालयापन करने लगे।
श्री रघुनाथदास जी का गृह त्याग….
सप्तग्राम के भूम्यधिकारी श्री गोवर्धनदास मजूमदार के पुत्र श्री रघुनाथदास जी शान्तिपुर में अद्वैताचार्य जी के घर पर ठहरे हुए प्रभु के, उन्होंने दर्शन किये थे और प्रभु ने उन्हें मर्कट वैराग्य त्याग कर घर में ही रहते हुए भगवत-भजन करने का उपदेश दिया था और उनके गृहत्याग के अत्यन्त आग्रह करने पर प्रभु ने कह दिया था- 'अच्छा देखा जायगा। अब तो तुम घर चले आओ, हम शीघ्र ही वृन्दावन को जायँगे, यहाँ से लौटकर जब हम आ जायँ, तब जैसा उचित हो वैसा करना।'
अब जब रघुनाथ जी ने सुना की प्रभु व्रजमण्डल की यात्रा करके पुरी लौट आये हैं, तब तो वे चैतन्य चरणों के दर्शनों के लिये अत्यन्त ही लालायित हो उठे। उनका मन-मधुप प्रभु के पादप का मकरन्द पान करने के निमित्त पागल-सा हो गया।वे गौरांग का चिन्तन करते हुए ही समय को व्यतीत लगे। ऊपर से तो सभी संसारी कामों को करते रहते, किन्तु भीतर उनके हृदय में चैतन्य विरहजनित अग्नि जलती रहती। वे उसी समय सब कुछ छोड़-छाड़कर चैतन्य चरणों का आश्रय ग्रहण कर लेते, किन्तु उस समय उनके परिवार में एक विचित्र घटना हो गयी।सप्तग्राम का ठेका पहले एक मुसलमान भूम्यधिकारी पर था। वही उस मण्डल का चौधरी था, उस पर से ही इन्हें इस इलाके का अधिकार प्राप्त हुआ था। वह प्रतिवर्ष आमदनी का चतुर्थांश अपने पास रखकर तीन अंश बादशाह के दरबार में जमा करता था।उस मण्डल की समस्त आमदनी बीस लाख रूपये सालना की थी। हिसाब से इन मजूमदार भाइयों को पंद्रह लाख राजदरबार में जमा करने चाहिये और पांच लाख अपने पास रखने चाहिये, किन्तु ये अपने बुद्धि कौशल से बारह ही लाख जमा करते और आठ लाख स्वयं रख लेते।चिरकाल से ठेका इन्हीं पर रहने से इन्हें भूम्यधिकारी होने का स्थायी अधिकार प्राप्त हो जाना चाहिये था, क्योंकि बारह वर्ष में ठेका स्थायी हो जाता है, इस बात से उस पुराने चौधरी को चिढ़ हुई। उसने राजदरबार में अपना अधिकार दिखाते हुए इन दोनों भाइयों पर अभियोग चलाया और राजमन्त्री को अपनी ओर मिला लिया।इसीलिये इन्हें पकड़ने के लिये राजकर्मचारी आये। अपनी गिरफ्तारी समाचार सुनकर हिरण्यदास और गोवर्धनदास दोनों भाई घर छोड़कर भाग गये। घर पर अकेले रघुनाथदास जी ही रह गये, चौधरी ने इन्हें ही गिरफ्तार करा लिया और कारावास में भेज दिया।यहाँ इन्हें इस बात के लिये रोज डराया और धमकाया जाता था कि ये अपने ताऊ (पिता के बड़े भाई) और पिता का पता बता दें।
क्रमशः
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