310

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
310-
रघुनाथजी को अपने पिता और भाई का क्‍या पता था, इसलिये वे कुछ भी नहीं बता सकते थे।इससे क्रुद्ध होकर चौधरी इन्‍हें भाँति-भाँति की यातनाएँ देने की चेष्‍टा करता, बुद्धिमान और प्रत्‍युत्‍पन्‍नमति रघुनाथदास जी ने सोचा- 'ऐसे काम नहीं चलेगा। किसी न किसी प्रकार इस चौधरी को ही वश में करना चाहिये।'
ऐसा निश्‍चय करके वे मन-ही-मन उपाय सोचने लगे। एक दिन जब चौधरी इन्‍हें बहुत तंग करना चाहता था, तब इन्‍होंने स्‍वाभाविक स्‍नेह दर्शाते हुए अत्‍यन्‍त ही कोमल स्‍वर से कहा- 'चौधरी जी! आप मुझे क्‍यों तंग करते हैं? मेरे ताऊ, पिता और आप तीनों भाई-भाई हैं।मैं अब तक तो आप तीनों को भाई ही समझता हूँ। आप तीनों भाई आपस में चाहे लड़ें या प्रेम से रहें, मुझे बीचे में क्‍यों तंग करते है? आप तो आज लड़ रहे हैं, कल फिर सभी भाई एक हो जायंगे। मैं तो जैसा उनका लड़का वैसा ही आपका लड़का। मैं तो आपको भी अपना बड़ा ताऊ ही समझता हूँ। आप कोई अनपढ़ तो हैं ही नहीं, सभी बातें जानते हैं। मेरे साथ ऐसा बर्ताव आपको शोभा नहीं देता।'

गुलाब के समान खिले हुए मुख से स्‍नेह और सरलता के ऐसे शब्‍द सुनकर चौधरी का कठोर हृदय भी पसीज गया। उसने अपनी मोटी-मोटी भुजाओं से रघुनाथदास जी को छाती से लगाया और आँखों में आंसू भरकर गद्गद कण्‍ठ से कहने लगा- 'बेटा ! सचमुच धन के लोभ से मैंने बड़ा पाप किया।तुम तो मरे सगे पुत्र के समान हो, आज से तुम मेरे पुत्र हुए। मैं अभी राजमन्‍त्री से कहकर तुम्‍हें छुड़वाये देता हूँ। तुम्‍हारे ताऊ और पिता जहाँ भी हों उन्‍हें खबर कर देना कि अब डर करने का कोई काम नहीं है। वे खुशी से अपने घर आकर रहें।’
यह कहकर उन्होंने राजमन्‍त्री से रघुनाथ दास जी को मुक्‍त करा दिया। वे अपने घर आकर रहने लगे।अब तो उन्‍हें इस संसार का यथार्थ रूप मालूम पड़ गया। अब तक वे समझते थे कि इस संसार में सम्‍भवतया थोड़ा बहुत सुख भी हो, किन्‍तु इस घटना से उन्‍हें पता चल गया कि संसार दु:ख और कलह का घर है। कहीं तो दीनता के दु:ख से दु:खी होकर लोग मर रहे हैं। कामपीड़ित हुए कामीजन कामिनियों के पीछे कुत्तों की भाँति घूम रहे हैं। कहीं कोई भाई से लड़ रहा है, तो किसी जगह पिता-पुत्र से कलह हो रहा है। कहीं किसी को दस-बीस गांवों की ज़मींदारी मिल गयी है या कोई अच्‍छी राजनौकरी या राजपदवी प्राप्‍त हो गयी है तो वह उसी के मद में चूर हुआ लोगों को तुच्‍छ समझ रहा है।किसी की कविता की कलाकोविदों ने प्रशंसा कर दी है, तो वह अपने को ही उशना और वेदव्यास समझता है। कोई विद्या के मद में, कोई धन के मद में, कोई सम्‍पत्ति, अधिकार और प्रतिष्‍ठा के मद में चूर है। किसी का पुत्र मूर्ख है तो वह उसी की चिन्‍ता में सदा दु:खी बना रहता है। इसके विपरीत किसी का सर्वगुण सम्‍पन्‍न पुत्र है, तो उसे थोड़ा भी रोग होने से पिता का हृदय धड़कने लग जाता है, यदि कहीं वह मर गया तो फिर प्राणान्‍त के ही समान दु:ख होता है। ऐसे संसार में सुख कहाँ, शान्ति कहाँ, आनन्‍द तथा उल्‍लास कहाँ? यहाँ तो चारों ओर घोर विषण्‍णता, भयंकर दु:ख और भाँति-भाँति की चिन्‍ताओं का साम्राज्‍य है।सच्‍चा सुख तो शरीरधारी श्री गुरु के चरणों में ही है। उन्‍हीं के चरणों में जाकर परमशान्ति प्राप्‍त हो सकती है। जो प्रतिष्‍ठा नहीं चाहते, नेतृत्‍व नहीं चाहते, मान, सम्‍मान, बड़ाई और गुरुपने की जिनकी कामना नहीं है, जो इस संसार में नामी पुरुष बनने की वासना को एकदम छोड़ चुके हैं, उनके लिये गुरु चरणों के अतिरिक्‍त कोई दूसरा सुखकर, शान्तिकर, आनन्‍दकर तथा शीतलता प्रदान करने वाला स्‍थान नहीं है।इसलिये अब मैं संसारी भोगों से पूर्ण इस घर में नहीं रहूँगा। अब मैं श्रीचैतन्‍य चरणों का ही आश्रय ग्रहण करूँगा, उन्‍हीं की शान्तिदायिनी सुखमयी क्रोड में बालक की भाँति क्रीड़ा करूंगा। उनके अरुण रंगवाले सुन्‍दर तलुओं को अपनी जिह्वा से चाटूँगा और उसी अमृतोपम माधुरी से मेरी तृप्ति हो सकेगी।चैतन्‍यचरणाम्‍बुजों की पावन पराग के सिवा सुख का कोई भी दूसरा साधन नहीं। यह सोचकर वे कई बार पुरी की ओर भगे भी, किन्‍तु धनी पिता ने अपने सुचतुर कर्मचारियों द्वारा इन्‍हें फिर से पकड़वा मंगवाया और सदा इनकी देख-रेख रखने के निमित्त दस-पांच पहरेदार इनके ऊपर बिठा दिये।अब ये बन्‍दी की तरह पहरों के भीतर रहने लगे। लोगों की आँख बचाकर ये क्षण भर को भी कहीं अकेले नहीं जा सकते।इससे इनकी विरह-व्‍यथा और भी अधिक बढ़ गयी। ये 'हा गौर! हा प्राणवल्‍लभ! 'कह-कहकर जोरों से रुदन करने लगते। कभी-कभी जोरों से रुदन करते हुए कहने लगते- 'हे हृदयरमण! इस वेदनापूर्ण सागर से कब उबारोगे? कब अपने चरणों की शरण दोगे? कब इस अधम को अपनाओगे? कब इसे अपने पास बुलाओगे ? किस समय अपनी मधुमयी अमृतवाणी से भक्ति-तत्त्व के सुधासिक्त वचनों इस हृदय की दहकती हुई ज्‍वाला को बुझाओगे। हे मेरे जीवनसर्वस्‍व! हे मेरी बिना डाँड़की नौका के पतवार! मेरी जीर्ण-शीर्ण तरीके कैवर्तक प्रभो! मुझे इस अन्‍धकूप से बाँह पकड़कर बाहर निकालो।' 
इनके ऐसे बे-सिर-पैर के प्रलाप को सुनकर प्रेममयी माता को इनके लिये अपार दु:ख होने लगा।उन्‍होंने अपने पति, इनके पिता गोवर्धनदास मजूमदार से कहा- 'हमारे कुल का एकमात्र सहारा एक रघु पागल हो गया है। इसे बांधकर रखिये, ऐसा न हो यह कहीं भाग जाय।'

पिता ने मार्मिक स्‍वर में आह भरते हुए कहा- 'रघु को दूसरे प्रकार का पागलपन है। वह संसारी बन्‍धन को छिन्‍न-भिन्‍न करना चाहता है। रस्‍सी से बाँधने से यह नहीं रुकने का। जिसे कुबेर के समान अतुल सम्‍पत्ति, राजा के समान अपार सुख, अप्‍सरा के समान सुन्‍दर स्‍त्री और भाग्‍यहीनों को कभी प्राप्‍त न होने वाला अतुलनीय ऐश्‍वर्य ही जब घर में बांध ने को समर्थ नहीं है।उसे बेचारी रस्‍सी कितने दिनों बांधकर रख सकती है?' 
माता अपने पति के उत्तर से और पुत्र के पागलपन से अत्‍यन्‍त ही दु:खी हुई।पिता भलीभाँति रघुनाथ पर दृष्टि रखने लगे।
उन्‍हीं दिनों श्रीपाद नित्‍यानन्‍द जी ग्रामों में घूम-घूमकर संकीर्तन की धूम मचा रहे थे।
क्रमशः

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