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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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वे चैतन्‍य प्रेम में पागल बने अपने सैकड़ों भक्‍तों को साथ लिये इधर-उधर घूम रहे थे। उनके उद्दण्‍ड नृत्‍य को देखकर लोग आश्‍चर्यचकित हो जाते, चारों ओर उनके यश और कीर्ति की धूम मच गयी। हजारों, लाखों मनुष्‍य नित्‍यानन्‍द प्रभु के दर्शनों के लिये आने लगे।उन दिनों गौड़ देश में 'निताई' के नाम की धूम थी। अच्‍छे-अच्‍छे सेठ-साहूकार और भूम्‍यधिपति इनके चरणों में आकर लोटते और ये उनके मस्‍तकों पर निर्भय होकर अपना चरण रखते, वे कृतकृत्‍य होकर लौट जाते। लाखों रूपये भेंट में आने लगे।नित्‍यानन्‍द जी खूब उदारतापूर्वक उन्‍हें भक्‍तों में बांटने लगे और सत्‍कर्मों में द्रव्‍य को व्‍यय करने लगे। पानीहाटी संकीर्तन का प्रधान केन्‍द्र बना हुआ था। वहाँ के राघव पण्डित महाप्रभु तथा नित्‍यानन्‍द जी के अनन्‍य भक्‍त थे। नित्‍यानन्‍द जी उन्‍हीं के यहाँ अधिक ठहरते थे। रघुनाथ जी जब नित्‍यानन्‍द जी का समाचार सुना तो वे पिता की अनुमति लेकर बीसों सेवकों के साथ पानीहाटी में उनके दर्शनों के लिये चल पड़े। उन्‍होंने दूर से ही गंगा जी के किनारे बहुत-से भक्‍तों से घिरे हुए देवराज इन्‍द्र के समान देदीप्‍यमान उच्‍चासन पर बैठे हुए नित्‍यानन्‍द जी को देखा। उन्‍हें देखते ही इन्‍होंने भूमि पर लोटकर साष्‍टांग प्रणाम किया। किसी भक्‍त ने कहा- श्रीपाद! हिरण्‍य मजूमदार के कुँवर शाह रघुनाथदास जी आये हैं, वे प्रणाम कर रहे हैं।'
'खिलखिलाते हुए नित्यानन्द जी ने कहा- 'अहा! रघु आया है? आज यह चोर जेल में से कैसे निकल भागा? इसे यहाँ आने की आज्ञा कैसे मिल गयी? फिर रघुनाथदास जी की ओर देखकर कहने लगे- 'रघु! आ, यहाँ आकर मेरे पास बैठ।'
हाथ जोड़े हुए अत्‍यन्‍त ही विनीत भाव से डरते-से सिकुड़े हुए रघुनाथदास जी सभी भक्‍तों के पीछे जूतियों में बैठ गये। नित्‍यानन्‍द जी ने अब रघुनाथदास जी पर अपनी कृपा की। महापुरुष धनिकों को यदि किसी काम के करने की आज्ञा दें, तो उसे उनकी परम कृपा ही समझनी चाहिये क्‍योंकि धन अनित्‍य पदार्थ है और फिर यह एक के पास सदा स्‍थायी भी नहीं रहता।महापुरुष ऐसी अस्थिर वस्‍तु को अपनी अमोघ आज्ञा प्रदान कर स्थिर और सार्थक बना देते हैं। धन का सर्वश्रेष्‍ठ उपयोग ही यह है कि उसका व्‍यय महापुरुषों की इच्‍छा से हो, किन्‍तु सुयोग सभी के भाग्‍य में नहीं होता। किसी भाग्‍यशाली को ऐसा अमूल्‍य और दुर्लभ अवसर प्राप्‍त हो सकता है।नित्‍यानन्‍द जी के कहने से रघुनाथदास जी ने दो-चार हजार रूपये ही खर्च किये होंगे, किन्‍तु इतने ही खर्च से उनका वह काम अमर हो गया और आज भी प्रतिवर्ष पानीहाटी में 'चूराउत्‍सव उनके इस काम की स्‍मृति दिला रहा है। लाखों मनुष्‍य उन दिनों रघुनाथदास जी के चिउरों का स्‍मरण करके उनकी उदारता और त्‍यागवृत्ति को स्‍मरण करके गद्गद कण्‍ठ से अश्रु बहाते हुए प्रेम में विभोर होकर नृत्‍य करते हैं।महामहिम रघुनाथदास जी सौभाग्‍यशाली थे, तभी तो नित्‍यानन्‍द जी ने कहा- 'रघु! आज तो तुम बुरे फंसे, अब यहाँ से सहज में ही नहीं निकल सकते। मेरे सभी साथी भक्‍तों को आज दही-चिउरा खिलाना होगा।’
बंगाल तथा बिहार में चिउरा को सर्वश्रेष्‍ठ भोजन समझते हैं। पता नहीं, वहाँ के लोगों को उनमें क्‍या स्‍वाद आता है? चिउरा कच्‍चे धानों को कूटकर बनाये जाते हैं और उन्‍हें दही में भिगोकर खाते हैं। बहुत-से लोग दूध में भी चिउरा खाते हैं। दही-चिउरा ही सर्वश्रेष्‍ठ भोजन है। इसके दो भेद हैं- दही-चिउरा और 'चिउरा-दही'। जिसमें चिउरा के साथ यथेष्‍ट दही-चीनी दी जाय उसे तो 'दही-चिउरा' कहते हैं और जहाँ दही-चीनी का संकोच हो और चिउरा अधिक होने के कारण पानी में भिगोकर दही-चीनी में मिलाये जायँ वहाँ उन्‍हें 'चिउरा-दही' कहते हैं। बहुत-से लोग तो पहले चिउरों को दूध में भिगो लेते हैं, फिर उन्‍हें दही-चीनी से खाते हैं। अजीब स्‍वाद है। भिन्‍न-भिन्‍न प्रान्‍तों के भिन्‍न-भिन्‍न पदार्थों के साथ स्‍वाद भी भिन्‍न-भिन्‍न हैं। एक बात और, चिउरों में छूत-छात नहीं। जो ब्राह्मण किसी के हाथ की बनी पूड़ी तो क्‍या फलाहारी मिठाई तक नहीं खाते वे भी 'दही-चिउरा, अथवा' चिउरा-दही' को मजे में खा लेते हैं।नित्यानन्द जी की आज्ञा पाते ही रघुनाथदास जी ने फौरन आदमियों को इधर-उधर भेजा। बोरियों में भरकर मनों बढि़या चिउरा आने लगे। इधर-उधर से दूध-दही के सैकड़ों घड़ों को सिर पर रखे हुए सेवक आ पहुँचे। जो भी सुनता वही चिउरा-उत्‍सव देखने के लिये दौड़ा आता। इस प्रकार थोड़ी ही देर में वहाँ एक बड़ा भारी मेला-सा लग गया। चारों ओर मनुष्‍यों के सिर-ही-सिर दीखते थे। सामने सैकड़ों घड़ों में दूध-दही भरा हुआ रखा था। हजारों बड़े-बड़े मिट्टी के कुल्‍हड़ दही-चिउरा खाने के लिये रखे थे। दूध और दही के अलग-अलग चिउरा भिगोये गये। दही में कपूर, केसर आदि सुगन्धित द्रव्‍य मिलाये गये; केला, सन्‍देश, नारिकेल आदि भी बहुत-से मंगाये गये। जो भी वहाँ आया सभी को दो-दो कुल्‍हड़ दिये गये।

नित्यानंद ने महाप्रभु का आह्वान किया किया। नित्यानंद जी ऐसा प्रतीत हुआ, मानो प्रत्यक्ष श्रीचैतन्य चिउरा-उत्सव देखने के लिए आये हैं। उन्होंने उनके के लिए अलग पात्रों में चिउरा परोसे और 'हरि-हरि' ध्वनि के साथ सभी को प्रसाद पाने की आज्ञा दी। पचासों आदमी परोस रहे थे। जिसे जहाँ जगह मिली, वह वहीं बैठकर प्रसाद पाने लगा, सभी को उस दिन के चिउरों में एक प्रकार के दिव्य स्वाद का अनुभव हुआ, सभी ने खूब तृप्त हो कर प्रसाद पाया।शाम तक जो भी आता रहा, उसे ही प्रसाद देते रहे। रघुनाथदास जी को नित्यानंद जी का उच्छिष्ट प्रसाद मिला। उस दिन राघव पण्डित के यहाँ नित्यानंद जी का भोजन बना था। उसे सभी भक्तों ने मिलकर शाम को पाया। रघुनाथदास उस दिन वहीं राघव पण्डित के घर रहे।
दूसरे दिन उन्होंने नित्यानंदजी के चरणों मे प्रणाम करके उनसे आज्ञा माँगी। नित्यानन्द जी ने 'चैतन्यचरणप्राप्ति' का आशीर्वाद दिया। इस आशीर्वाद को पाकर रघुनाथदास जी को परम प्रसन्नता हुई। उन्होंने राघव पण्डित को बुलाया और भक्तों  को कुछ भेंट करने की इच्छा प्रकट की। राघव पण्डित ने उन्हें सहर्ष सम्मति दे दी।तब रघुनाथ जी ने नित्यानंद जी के भण्डारी को बुलाकर सौ रुपये और सात तौला सोना नित्यानन्द जी के लिए दे दिया।
क्रमशः

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