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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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रघुनाथ जी बड़े ही संकोची थे, वे प्रभु के सामने कभी भी अपने मुँह से कोई बात नहीं निकालते थे। उनकी ओर कभी आँखें उठाकर देखते नहीं थे, जो कुछ कहलाना होता, उसे या तो स्वरूप गोस्वामी द्वारा कहलाते या गोविन्द के द्वारा। स्वयं वे सम्मुख होकर कोई बात नहीं पूछते थे।
एक दिन महाप्रभु स्वरूप गोस्वामी के साथ कथा-वार्ता कर रहे थे, उसी समय रघुनाथदास जी ने आकर प्रभु के चरणों में प्रणाम किया और फिर स्वरूप गोस्वामी की वन्दना करके चुपचाप पीछे को एक ओर बैठ गये।
प्रभु ने हंसते हुए कहा- 'तुम्हारा यह रघु तो बड़ा ही संकोची है, हमसे बोलता ही नहीं। हमें पता भी नहीं क्या करता रहता है। तुमसे तो सब बातें कहता होगा, तुम्हीं इसकी बातें बताओ।’
एक घुटने को खड़ा करके उससे अपने दायें कपोल को सटाकर नीची दृष्टि किये हुए रघुनाथ जी चुपचाप बैठे थे। अपने ही सम्बन्ध का प्रसंग छिड़ने पर वे और भी अधिक संकुचित से बन गये।संकोच के कारण वे अपने अंगों में समा जाना चाहते थे। स्वरूप गोस्वामी ने धीरे-धीरे कहा- 'रघु बड़ा पुरुषार्थ करता है। आपसे बातें कहने में इसे संकोच होता है। कल मुझसे कहता था। (फिर रघुनाथदास जी की ओर देखकर उन्हीं से कहने लगे) हाँ भाई! तुम जो मुझसे कल प्रभु से कहने के लिये कहते थे, उसे अब तुम्हीं प्रभु से पूछो।'
प्रभु ने पुचकारते हुए कहा- 'हां भाई, कहो क्या बात पूछना चाहते थे?'
रघुनाथ जी कुछ विवशता के भाव से सिर को थोड़ा और नीचा करके चुपचाप ही बैठे रहे, उन्होंने कुछ भी नहीं कहा। तब प्रभु ने स्वरूप गोस्वामी जी से कहा- 'अच्छा, तुम्हीं बताओं क्या पूछना चाहता था?
स्वरूप जी ने कुछ रुक-रूककर कहा- 'कहता था कि मेरा घर-बार क्यों छुड़ाया है? मेरा कर्तव्य क्या है? मुझे क्या करना चाहिये- इन बातों को प्रभु से पूछो।'
यह सुनकर प्रभु हंसने लगे और रघुनाथ जी को लक्ष्य करके कहने लगे- 'तुम्हारे गुरु तो ये ही स्वरूप जी हैं। मैंने तुम्हें इन्हीं को सौंप दिया है। साध्यसाधन तत्त्व तो ये मुझसे भी अधिक जानते हैं। मुझे भी कोई बात पूछनी होती है, तो इन्हीं से पूछता हूँ।
इतना कहकर प्रभु चुप हो गये और फिर अपने आप ही कहने लगे- 'यदि तुम्हारी इच्छा ऐसी ही है कि मैं ही तुमसे कुछ कहूँ तो मैंने तो सभी शास्त्रों का सार यही समझा है कि श्रीकृष्ण-कीर्तन और नाम-स्मरण ही संसार में सुख का सर्वश्रेष्ठ साधन है। प्रेम की उपलब्धि नाम-स्मरण से ही हो सकती है। अब नाम-स्मरण कैसा बनके करना चाहिये, बस यही समझने की बात है।जिसे प्रेम की प्राप्ति करनी हो उसे सबसे पहले साधु-संग करना चाहिये। भजन, कीर्तन, सत्संग, भगवत-लीलाओं का स्मरण यही मुख्य धर्म है, इन धर्मों का पालन करना चाहिये। संसारी लोगों से विशेष सम्बन्ध रखना, संसारी लोगों से इधर-उधर की बहुत-सी बातें करना, दूसरों की निन्दा-स्तुति करना, इसी को ऋषियों ने लोक धर्म बताया है।इन बातों से सदा बचे रहना चाहिये। दूसरों के गुण-दोषों का कथन एकदम परित्याग कर देना चाहिये। यदि कुछ कहना ही हो तो दूसरों के गुणों को ही कहना चाहिये। दूसरों के अवगुणों पर तो ध्यान ही न देना चाहिये। यदि कोई कितना भी बड़ा ज्ञानी, ध्यानी, मानी और पण्डित क्यों न हो, जहाँ उसने दूसरों की निन्दा के वाक्य मुख से निकाले वहीं उसे पतित हुआ समझना चाहिये।दूसरों के यथार्थ गुणों की स्तुति के अनन्तर जहाँ यह वाक्य निकला कि अजी, और तो सब ठीक है; बस उनमें यही एक दोष है, वहाँ ही वह दोष उस मनुष्य के हृदय में प्रवेश कर जाता है। क्योंकि दोषों के परमाणु अति सूक्ष्म होते हैं, जब तक वे हृदय में प्रवेश नहीं करते, तब तक दूसरों की निन्दा हो नहीं सकती।निन्दा करने में हम तभी समर्थ हो सकेंगे, जब दोषों के परमाणु हमारे हृदय में आ जायंगे। ज्यों-ज्यों दूसरों की निन्दा करोगे त्यों-ही-त्यों वे परमाणु बढ़ने लगेंगे और वे तुम्हारे हृदय की पवित्रता, सरलता, सच्चरित्रता और ज्ञानार्जन की इच्छा आदि सदवृत्तियों को दबाकर वहाँ अज्ञान और मोह का साम्राज्य स्थापित कर देंगे।इसलिये अदोषदर्शी होना यह वैष्णवों के लिये सबसे मुख्य काम है। जो भगवद्भक्त महात्मा हैं, भगवत और साधु पुरुष हैं, उनकी निरन्तर सेवा करते रहना चाहिये। मान-प्रतिष्ठा और विषय-भोगों की इच्छा-इन सभी को कामतृष्णा कहते हैं। विरक्त पुरुषों को इनसे सदा बचे रहना चाहिये।इस प्रकार सबसे विरक्त होकर निरन्तर भगवन्नामों का जप, भगवल्लीलाओं का श्रवण और भगवत-गुणों का कीर्तन-ये ही सभी परमार्थ के पथिकों के लिये कर्तव्य कर्म हैं। इन कर्मों के करने वाले को कभी संसारमोह नहीं होता। मैं संक्षेप में तुझे वैष्णवों के मुख्य-मुख्य कर्म बताता हूँ।
1. ग्राम्यकथा कभी श्रवण नहीं करनी चाहिये, ग्राम्यकथा सुनने से चित्त में वे ही बातें स्मरण होती हैं जिससे भजन में चित्त नहीं लगता।
2. ग्राम्यकथा कहनी भी नही चाहिये। विषयी लोगों की बातें करने से चित्त विषयमय बन जाता है।
3. अच्छे-अच्छे स्वादिष्ट पदार्थ न खाने चाहिये, क्योंकि ऐसे पदार्थों से विषय लोलुपता बढ़ती है।
4. अच्छे, चमकीले और बहुत स्वच्छ वस्त्र न पहनने चाहिये, क्योंकि उनके पहनने से जीवन में बनावट आती है और बनावट से वृत्ति बहिर्मुखी बन जाती है।
5. सदा अभिमानरहित होकर बर्ताव करना चाहिये। हृदय में अभिमान आते ही सभी साधन नष्ट हो जाते हैं।
6. दूसरों को सदा मान देते रहना चाहिये, दूसरों को मान देने से आत्मा का सम्मान होता है और आत्म सम्मान ही सर्वश्रेष्ठ सम्मान है। इसके सामने सभी सम्मान तुच्छातितुच्छ हैं।
7. सदा सर्वत्र और सब अवस्थाओं में भगवन्नामों का जप करते रहना चाहिये। नाम-जप से श्री कृष्ण चरणों में प्रीति उत्पन्न होती हैं।
8. शुद्ध और श्रेष्ठ भाव से श्री भगवान की पूजा करते रहना चाहिये। मानसिक पूजा ही सर्वश्रेष्ठ पूजा है।
इस प्रकार इन धर्मों के पालन करने वाले वैष्णव को ही प्रभु प्रेम की प्राप्ति हो सकती है। महाप्रभु के उपदेशामृत को पान करके रघुनाथदास जी की साध्य-साधन तत्वजिज्ञासारूपी पिपासा भलीभाँति शान्त हो गयी। उस दिन से वे अहर्निश नामसंकीर्तन ही करते रहते। दिन-रात्रि के आठ पहरों में से वे साढ़े सात पहर भगवन्नामों का जप करते रहते और आधा पहर भोजन तथा शयन में बिताते।
क्रमशः
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