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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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दिन ढलकर शाम हो जाती, फिर अन्ध कार छा जाता, किन्तु इन्हें इस का कुछ भी ध्यान नहीं। ये तो चैतन्य-चिन्तन में सभी कामों को भूले हुए थे। इन का मन मधुप सदा अरुण रंग वाले श्री चैतन्य पदारविन्दों में ही गुंजार करता रहता। शरीर कारावास की काल कोठरी में पड़ा हुआ धौंकनी की तरह साँस लेता रहता। जब इन्हें बाह्य ज्ञान होता, तभी इन का दिल धड़क ने लगता, इस बात के स्मरण से कि मेरा शरीर श्री चैतन्य-चरणों से पृथक होकर कारावास में पड़ा हुआ है, ये इन विचारों के आते ही मूर्च्छित हो जाते और लम्बी-लम्बी सांसें छोड़ने लगते।
इसी बीच गुप्त रीति से इन्हें अपने बड़े भाई का पत्र मिला। पत्र को पढ़कर इनकी विकलता और भी बढ़ गयी। ये चैतन्य-चरणों के मंगलमय तलुओं में अपने मस्तक को रगड़ने के लिये व्यग्र हो उठे।

मोदी के यहाँ दस हजार रूपयों का समाचार पाते ही इन्होंने सोचा- 'इन चांदी के ठीकरों के द्वारा ही इस कारावास से मेरी मुक्ति हो जाय और मैं चैतन्य -चरणों के दर्शन पा सकूँ तो यह जीवन सार्थक हो जाय।' प्रेम में नियम कैसा? प्रेम तो नियम के झंझटो से परे है। उन्होंने उसी समय कारावास के प्रधान कर्मचारी से कहा-' भाई ! तुम मुझे जानते हो, मैं कौन हूँ?'

जेलर ने कहा- 'श्रीमन! मैं आपको खूब जानता हूँ, आप राज्य के प्रधान मन्त्री हैं।' श्
री सनातन ने कहा- 'तुम्हें यह भी पता है कि मैं क्यों जेल में हूँ?'

नम्रता के साथ जेलर ने कहा- 'श्रीमन! इस बात को सभी लोग जानते हैं कि आपने कोई अपराध नहीं किया है, आप अपनी नौकरी को छोड़ना चाहते थे, इसी पर बादशाह ने आपको कैद कर लिया।'

श्री सनातन जी ने स्नेह से कहा- 'तुम बता सकते हो, मैं नौकरी क्यों छोड़ना चाहता था?'
जेलर ने कहा- 'श्रीमन! मैंने पण्डितों और समझकर आदमियों के मुख से ऐसा सुना है कि आप भजन करना चाहते हैं।'
'भजन करना अच्छा काम है या बुरा, तुम्हारा इस बारे में क्या विचार है?'- सनातन जी ने पूछा। 
इस पर बड़ी ही सरलता के साथ जेलर ने कहा- 'श्रीमन! मैं इस बारे में क्या बताऊँ? हम तो घर-गृहस्थी के झंझटों के कारण पैसे के ऐसे गुलाम बन गये हैं कि जिसने हमें पैदा किया है, उसे एकदम भूल गये हैं।हम इस बारे में कह ही क्या सकते हैं? आप भाग्यवान हैं, जो आप सब कुछ छोड़-छाड़कर ईश्वर का भजन करना चाहते हैं, इससे बढ़कर दूसरा कोई काम और हो ही क्या सकता है?'

'अच्छा, तुम यह बताओ जो लोग भजन करना चाहते हैं, उनकी मदद करना पाप है या पुण्य?' -सनातन जी ने धीरे से पूछा।
जेलर ने कहा- 'ऐसे आदमियों की जितनी भी जिससे बन सके, मदद करनी चाहिये, इससे बढ़कर पुण्य का काम दूसरा है ही नहीं।' 
'तब तुम मुझे इस जेल खाने से निकालने में सहायता दो।'- सनातन जी ने चारों ओर देखकर जेलर के कान में कहा।

कुछ डरता हुआ और चारों ओर देखता हुआ कम्पित स्वर में धीरे-धीरे जेलर कहने लगा- 'श्रीमन! यह मेरी शक्ति के बाहर की बात है। बादशाह इस बात के सुनते ही मुझे जिन्दा ही गड़वाकर कत्ल करा देगा।'
सनातन जी ने धीर से कहा- 'भाई! मैंने मन्त्रीपने में तुम्हारे साथ बड़े-बड़े उपकार किये हैं, तुम इतना भी नहीं कर सकते? मेरे दस हजार रूपये अमुक मोदी के यहाँ रखे हैं, आज ही पत्र लिखकर मैं उन्हें मंगवाकर तुम्हें दे दूँगा। तुम बाल-बच्चेदार आदमी हो; उनसे तुम्हारा काम चलेगा।'

दस हजार रूपयों का नाम सुनते ही पैसों को ही पैसों की ही सर्वस्व समझने वाला वह तीस रूपये महीने का जेलर कर्तव्य विमूढ़ हो गया। उसने दस हजार रूपये अपने जीवन में कभी देखे भी नहीं थे।आज थोड़ा-सा साहस करने में ही इकट्ठे दस हजार रूपये मिल जायँगे, इसी को सोचकर और हर्ष के भावों को दबाते हुए विवशता के स्वर में कहने लगा- 'श्रीमन! रूपयों की क्या बात है, मैं तो पहले भी आपका गुलाम था अब भी गुलाम हूँ, मगर बादशाह पूछेंगे तो मैं क्या जवाब दूँगा?'
सनातन जी समझ गये कि मेरा मन्त्र काम कर गया। उन्होंने दृढ़ता के स्वर में कहा- 'हम कोई चोर-डाकुओं की तरह तो बन्दी हैं ही नहीं। राजा भी जानता है कि हमारे साथ राजबन्दी का-सा व्यवहार होता है। कह देना-वे गंगा स्नान करने गये थे, वहीं गंगा जी में बह गये। फिर बहुत ढुंढ़वाने पर भी उनका पता नहीं चला। मैं आज ही गौड़ देश को छोड़ दूँगा और और फिर इधर आऊँगा ही नहीं, तब बादशाह को कैसे पता चल जायगा।'

यह उक्ति जेलर के मन में बैठ गयी। बैठ क्या गयी दस हजार रुपयो के लोभ से घबड़ायी हुई बुद्धि के बहलाव का उसे एक अकाट्य बहाना मिल गया। वह सनातन जी की बात से सहमत हो गया और मोदी के यहाँ से रूपये मंगा लिये गये। छिपकर भागने का सभी प्रबन्ध ठीक कर दिया गया।अन्धकार से परिपूर्ण घोर रात्रि थी, सभी लोग सो रहे थे। जेल के पहरेदार कभी-कभी भर्राई हुई आवाज से बीच-बीच में- 'ताला जंगला लालटेन सब ठीक है सा...हब' कह-कहकर बेमन से चिल्ला देते थे और फिर दीवाल के सहारे लुढ़क जाते। सभी पर निद्रादेवी का प्रभाव व्याप्त था, किन्तु दो ही जाग रहे थे, एक तो प्रभु-दर्शनों के लालची श्री सनातन और दूसरे दस हजार रूपयों की गर्मी से फूले हुए गौड़ देश के जेल-दरोगा।

एक को प्रभु की चिन्ता थी, दूसरे को पैसे का हर्ष था, अत्यन्त चिन्ता में और अत्यन्त हर्ष में नींद नहीं आती। धीरे से सनातन जी की कोठरी के किवाड़ खुले। एक विश्वासी पहरेदार के साथ जेलर के उनकी कोठरी में प्रवेश किया। दबी हुई आवाज से उसने कहा- 'सब प्रबन्ध ठीक हो गया है। श्रीमन! अब आपके चलने की ही देर है।'
जेलर की बात सुनकर धीरे से सनातन जी ने कहा- 'मैं भी बिलकुल तैयार हूँ।' यह कहकर पास में पड़े हुए अपने एक ईशान नामक विश्वासी सेवक को उन्होंने जगाया। आँखें मलता हुआ ईशान जल्दी से उठ पड़ा और उनके संकेत से अपनी गुदड़ी को उठाकर उनके पीछे-पीछे चलने लगे।
क्रमशः

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