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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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फाँसी घर के एक छोटे दरवाजे से होकर सभी लोग गंगा तट पर आये। वहाँ पहले से ही नाव तैयार खड़ी थी, सब लोग चुपचाप उसमें बैठ गये। नाव चल पड़ी, सनातन जी ने अन्तिम बार गौड़ की राजधानी को प्रणाम किया और थोड़ी ही देर में वे गंगा जी के उस पार पहुँच गये।पार पहुँचकर सनातन जी ने जेल-दरोगा की ओर कृतज्ञता की दृष्टि से एक बार देखा। डरते-डरते जेलर ने उन्हें प्रणाम किया। नाव में बैठकर जेलर लौट गया और सनातन जी राजपथ को छोड़कर वृक्षलताओं से घिरे हुए झाड़खण्ड के रास्ते से आगे बढ़ने लगे।
वे गौर दर्शनों के लिये इतने उत्सुक हो रहे थे कि पैर में गड़ने वाले कुश-कण्टक तथा कंकड़-पत्थरों का उन्हें ध्यान ही नहीं था। वे गौर-गौर कहकर रुदन करते हुए रात्रि के घोर अन्धकार में पश्चिम की ओर बढ़ रहे थे। इसी प्रकार जंगल और वनों में होते हुए वे पातड़ा नामक पहाड़ के समीप पहुँचे।स्वामिभक्त ईशान नामक सेवक उनकी ऐसी विपत्ति की अवस्था में भी बराबर उनके साथ चल रहा था, पातड़ा पहाड़ के समीप एक डाकुओं का सरदार रहता था। उसके पास ज्योतिषी था, वह ज्योतिषी गणित करके बता देता था कि अमुक पथियों के पास कितना द्रव्य है, वह डाकू अपने साथियों के सहित पथिकों के धन लूट लेता और उन्हें मार डालता था।स्वामिभक्त ईशान ने भी मार्ग व्यय के निमित्त आठ मुहरें अपने वस्त्रों में छिपा रखी थी। ज्योतिषी ने उस डाकुओं के दलपति को बता दिया कि इस आदमी के नौकर के पास आठ मुहरें हैं। मुहरों का नाम सुनते ही सरदार ने इनकी खूब आवभगत की और इनके भोजन आदि का बहुत ही अच्छा प्रबन्ध कर दिया।

आज दो दिनों के पश्चात् भोजन पाकर सनातन जी सुख पूर्वक लेटे। उन्होंने सरदार से कहा- 'कृपा करके हमें पहाड़ के परली पार पहुँचा दीजिये।' सरदार ने उल्लास के सहित कहा- ‘हाँ’, हाँ, अवश्य जैसा आप कहेंगे वैसा ही प्रबन्ध कर दिया जायेगा।' 
बुद्धिमान राजमंत्री सनातन जी ने सोचा- 'डाकू होकर यह हमारा इतना अधिक सम्मान क्यों कर रहा है, यह इतना विनम्र क्यों बना है।अवश्य ही इसके अन्दर कोई गुप्त रहस्य है।' सोचते-सोचते उनकी दृष्टि ईशान पर गयी। उन्होंने पूछा- 'क्यों रे! तेरे पास कुछ द्रव्य तो नहीं है, ठीक-ठीक बता दे तैने कुछ छिपा तो नहीं रखा है?' 
गिड़गिड़ाकर नौकर ने कहा- 'श्रीमन! मेरे पास सात मुहरें है।'
उसे डांटते हुए सनातन जी ने कहा- 'धत्तेरे बदमाश की; तेरा लोभ अब भी बना रहा। अभी जाकर इन सबको डाकुओं के सरदार को दे आ।'

अपने स्वामी की आज्ञा से ईशान सरदार के पास गया और सात मुहरें रखकर कहने लगा- 'मेरे स्वामी ने ये मुहरें आपके पास भेजी हैं।'
हँसकर उसने उत्तर दिया- 'एक तो फिर भी छिपा ही ली, मुझे पहले ही पता चल गया था। अस्तु, मैं तुम्हारे स्वामी की सच्चाई से बहुत प्रसन्न हूँ, ये मुहरें उन्हीं को दे देना।' इतने में ही सनातन जी भी वहाँ आ उपस्थित हुए।

सरदार को मुहरों को लौटाते देखकर उन्होंने आग्रह पूर्वक कहा- 'आप इन मुहरों को ले लें। मुझे तो कहीं-न-कहीं फेंकनी ही होगी। मैं तो राजमंत्री-पद को छोड़कर जेल से भाग कर आया हूँ, कृपा करके मुझे उस पार पहुँचा दीजिये।'

सरदार ने चार आदमी इनके साथ कर दिये और ये पहाड़ के उस पार हो गये। आगे चलते-चलते सनातन जी ने ईशान से पूछा- 'ईशान! मालूम पड़ता है, अभी तेरे पास कुछ और द्रव्य है?'
ईशान ने लज्जित भाव से कहा- 'श्रीमन! मेरे पास एक मुहर और है। 
तब श्री सनातन जी ने कहा- 'भैया! मुझे अब तुम्हारी आवश्यकता नहीं। मेरा तुम्हारा अब साथ ही कैसा? तुम अपने घर लौट जाओ।' 
रोते-रोते ईशान ने अपने स्वामी के पैर पकड़ लिये और उनके बहुत कहने पर वह लौट गया। सनातन जी उसी प्रकार झाड़-झंडकाड़ों में होते हुए हाजीपुर पहुँचे।हाजीपुर में इनके बहनोई श्री कान्त जी किसी राजकाज से ठहरे हुए थे, उनसे अकस्मात इनकी भेंट हो गयी। श्री कान्त इन्हें दरवेश के वेश में देखकर बड़े ही विस्मित हुए और कुछ काल वहाँ ठहरने का आग्रह किया, किन्तु इन्होंने वहाँ रहना स्वीकार नहीं किया।श्री कान्त इनसे मार्ग व्यय ले जाने के लिये बहुत आग्रह करने लगे, किन्तु इन्होंने कुछ भी साथ लेना स्वीकार नहीं किया, बहुत कहने पर एक भूटानी कम्बल इन्होंने ले लिया।इनका वेश मुसलमान फकीरों-सा था। भिक्षा मांगते हुए और गौर-नाम का जप करते हुए ये श्री काशीजी में पहुँचे। वहाँ इन्हें पता चला कि महाप्रभु चन्द्रशेखर के घर पर ठहरे हुए हैं। इस समाचार को सुनते ही ये परम उल्लास के सहित चन्द्रशेखर जी के घर के पास पहुँचे और बाहर बैठकर प्रभु-दर्शनों की प्रतीक्षा करने लगे।
प्रेम में भी कितना अधिक आकर्षण होता है, घर के भीतर बैठे हुए महाप्रभु ने सनातन जी का आगमन जान लिया और पास में बैठे हुए चन्द्रशेखर से उन्होंने कहा- 'चन्द्रशेखर! बाहर एक वैष्णव साधु बैठे हैं, उन्हें बुला लाओ।'

बाहर जाकर चन्द्रशेखर ने देखा कि यहाँ तो कोई वैष्णव साधु है नहीं। भीतर लौटकर उन्होंने प्रभु से कहा- 'प्रभो! वहाँ तो कोई वैष्णव साधु है नहीं।'
प्रभु ने हंसकर कहा- 'हाँ है, जरूर है, तुम अच्छी तरह से खोजो।'

चन्द्रशेखर फिर गये, किन्तु वहाँ एक मुसलमान दरवेश के सिवा कोई वैष्णव साधु उनके देखने में नहीं आया।उन्होंने आकर हैरानी के साथ कहा- 'प्रभो! एक मुसलमान दरवेश तो द्वार पर बैठा है। उसके अतिरिक्त कोई वैष्णव साधु तो मुझे फिर भी नहीं दीखा।'
प्रभु ने मुसकराकर कहा- ‘जिसे तुम मुसलमान दरवेश समझते हो वही परम भागवत वैष्णव है, उसी को मेरे पास लाओ।’

प्रभु की आज्ञा से चन्द्रशेखर श्री सनातन जी को साथ लेकर भीतर आये। सनातन ने दूर से ही भूमि पर लेटकर प्रभु के चरणों में प्रणाम किया। प्रभु जल्दी से उठकर उन्हें आलिंगन करने के लिये दौड़े। प्रभु को देखते ही वे सर्प को देखकर डरते हुए की भाँति पीछे हटते हुए दीनता के साथ प्रभु से कहने लगे- 'प्रभो! मुझको स्पर्श न कीजिये। नाथ! मैं आपके स्पर्श के योग्य नहीं हूँ।'
क्रमशः

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