228

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
228-

वह कहने लगा- ‘आपकी आकृति से ही प्रतीत हो रहा है कि आप कोई साधारण पुरुष नहीं हैं। संन्‍यासी होकर भी इतनी नम्रता, यह तो महान आश्‍चर्य की बात है। इतनी सरलता, इतनी भक्ति और ऐसे प्रेम के सात्त्विक विकार मेरे गुरुदेव के कृपापात्र संन्‍यासियों को छोड़कर और किसी संन्‍यास में नहीं पाये जाते। आप अपना परिचय मुझे दीजिये।’

प्रभु ने अत्‍यन्‍त ही विनीत भाव से कहा- ‘संन्‍यासियों में भक्तिभाव के प्रवर्तक भगवान माधवेन्‍द्रपुरी के प्रधान शिष्‍य श्रीमत ईश्‍वरपुरी महाराज मेरे मन्‍त्र-दीक्षा-गुरु हैं। संन्‍यास के गुरु मेरे श्रीमत केशवभारती महाराज हैं।’

श्रीरंगपुरी महाराज ने पूछा- ‘आपकी पूर्वाश्रम की जन्‍मभूमि कहाँ है?’

प्रभु ने सरलता के साथ कहा- ‘इस शरीर का जन्‍म गौड़देश में भगवती भागीरथी के तट पर नवद्वीप नामके नगर में हुआ है।

प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए पुरी महाराज कहने लगे- ‘ओहो ! तब तो आप अपने बड़े ही निकट सम्‍बन्‍धी हैं। श्रीअद्वैताचार्य को तो आप जानते ही होंगे, मैं अपने गुरुदेव के साथ पहले नवद्वीप गया था। वहाँ पर जगन्‍नाथ मिश्र नामके एक बड़े श्रद्धालु ब्राह्मण हैं, उनकी पत्‍नी तो साक्षात अन्‍नपूर्णादेवी ही हैं। मैंने एक दिन उनके घर भिक्षा की थी। उस ब्राह्मणी ने मुझे बड़े ही प्रसन्‍नता के सहित भिक्षा करायी थी। उनका एक सर्वगुणसम्‍पन्‍न पुत्र संन्‍यासी हो गया था। वह तो बड़ा ही होनहार था किन्‍तु दैव की गति बड़ी विचित्र होती है, संन्‍यास लेने के दो वर्ष बाद, उसने यहीं पर शरीर त्‍याग दिया। उसका संन्‍यास का नाम शंकरारण्‍य था।’
इस बात को सुनकर प्रभु कुछ विस्मित से हो गये। उनके दोनों स्‍वच्‍छ और बड़े बड़े कमल के समान नेत्रों में आप से आप ही जल भर आया। रुँधे हुए कण्‍ठ से उन्‍होंने कहा- ‘भगवन ! वे महाभाग शंकरारण्‍य स्‍वामी मेरे पूर्वाश्रम के अग्रज थे।’

इस बात को सुनते ही पुरी महाराज ने प्रभु का फिर आलिंगन किया और कहने लगे- ‘क्‍या आप सब के सब संन्‍यासी ही हो गये या घर पर कोई और भी भाई है?’

प्रभु ने नीचे को सिर करके धीरे से कहा- ‘घर पर तो वे ही श्रीहरि हैं, जिनका आपने पहले नाम लिया। मेरे पूर्वाश्रम के पिता तो परलोकवासी हो गये। हम दो ही भाई थे, सो दोनों ही आपके चरणों की शरण में आ गये। अब घर पर वृद्धा माता ही है।’

पुरी ने कहा- ‘भाई आपका ही कुल धन्‍य हैं, आपके ही माता पिता का पुत्र उत्‍पन्न करना सार्थक हुआ।’

इस प्रकार दोनों में और भी परमार्थ सम्‍बन्‍धी बहुत सी बातें होती रहीं। दो तीन दिन तक दोनों ही साथ साथ रहे। अन्‍त में पुरी महाराज तो द्वारिका के लिये चले गये और महाप्रभु श्री विठ्टलनाथ जी के दर्शन करके आगे बढ़े।’

पण्‍ढरपुर में भीमा नदी में स्‍नान करके महाप्रभु कृष्‍णवीणा नदी के किनारे आये। वहाँ ब्राह्मणों के समीप से प्रभु ने श्रीविल्‍वमंगलकृत ‘कृष्‍णकर्णामृत’ नामक अपूर्व रसमय ग्रन्‍थ का संग्रह किया। ब्रह्मसंहिता और कृष्‍णकर्णामृत इन दोनों पुस्‍तकों को यत्‍नपूर्वक साथ लिये हुए प्रभु ताप्‍ती नदी के निकट आये। वहाँ पुण्‍यतोया ताप्‍तीनदी में स्‍नान करके महिष्‍मतीपुर होते हुए वे नर्मदा जी के किनारे आये, वहाँ ऋष्‍यमूक पर्वत को देखते हुए, दण्‍डकारण्‍य के समस्‍त तीर्थों को पावन करते हुए सप्‍तलाल तीर्थ का उद्धार किया। महाप्रभु ने नीलगिरी प्रदेश में भ्रमण करते समय असंख्‍य लोगों को श्रीकृष्‍ण प्रेम में उन्‍मत्त बनाया। इसी प्रकार भ्रमण करते हुए गुर्जरी नगर में आकर उपस्थित हुए। यहाँ पर एक अर्जुन नाम के शुष्‍क वेदान्‍ती पण्डित को प्रभु ने श्रीकृष्‍ण तत्त्व समझाया और उसे प्रेम प्रदान किया। गुर्जरी नगर में महाप्रभु बीजापुर के पार्वत्‍य प्रदेश में भ्रमण करते हुए और अनेक पुण्‍य तीर्थों में दर्शन, स्‍नान, मार्जन और आचमन करते हुए पूर्ण नगर में पहुँचे। वहाँ एक सरोवर के निकट प्रभु ने वास किया। वह नगर बड़ा ही समृद्धशाली था, उसमें संस्‍कृत के बहुत से विद्वान पण्डित थे और अनेक पाठशालाएँ थीं। महाप्रभु को उन दिनों श्रीकृष्‍ण विरह का अत्‍यन्‍त ही प्राबल्‍य था, वे सरोवर के तीर पर बैठ हुए जोरों से रोते हुए चिल्‍ला रहे थे ‘हाँ प्राणनाथ! हा हृदयेश्‍वर! तुम कहाँ हो, दर्शन दो। प्राणवल्‍लभ! शीघ्र आओ, तुम कहाँ छिपे हो।’ प्रभु के करुण क्रन्‍दन को सुनकर बहुत से नर नारी एकत्रित हो गये। उनमें कुछ अपने को तत्त्वज्ञानी मानने वाले शुष्‍क तार्किक भी थे। प्रभु अत्‍यन्‍त ही दीनभाव से उनसे पूछने लगे- ‘आप कृपा करके मेरे प्राणनाथ का पता जानते हों तो बताइये। वे कहाँ है, मुझे छोड़कर वे कहाँ छिपे गये?’

उन पण्डितों में से एक अत्‍यन्‍त ही शुष्‍क हृदयवाला पण्डित बोल उठा- ‘तेरे कृष्‍ण इस जल में छिपे हैं।’ बस, इतना सुनना था कि महाप्रभु उसी क्षण छलाँग मारकर जल में कूद पड़े। लोगों के आश्‍चर्य का ठिकाना नहीं रहा। सर्वत्र हाहाकार मच गया। बहुत से पुरुष उसी क्षण सरोवर में कूद पड़े और प्रभु को जल से बाहर निकाला। इस पर सभी लोग उस पण्डित को धिक्‍कार देने लगे। वह भी अपना सा मुँह लेकर मारे शर्म के उसी क्षण चला गया।’

यहाँ से चलकर प्रभु भोलेश्‍वर होते हुए जिजूरी नगर में पहुँचे। यहाँ पर खाण्‍डवादेव का बड़ा भारी मन्दिर है। यहाँ एक बड़ी ही बुरी प्रथा है। जिस कन्‍या का विवाह नहीं होता उसे माता-पिता देवता के अर्पण कर देते हैं और उसे देव दासी कहते हैं। उनमें अधिकांश दुश्‍चरित्रा और व्‍याभिचारिणी होती हैं।

महाप्रभु ने जब यह बात सुनी तब वे स्‍वयं इन अभागी पतिता नारियों को देखने के लिये खाण्‍डवादेव के मन्दिर में गये। प्रभु ने अपनी आँखों से उन अभागिनियों की दुर्दशा देखी। उनकी दयनीय दशा देखकर दयामय श्रीचैतन्‍य उनसे बोले- ‘देवियो ! तुम धन्‍य हो, तुम्‍हारा ही जीवन सार्थक है, अन्‍य स्त्रियों के पति तो हाड़-मांस के पुतले नश्‍वर शरीर वाले मनुष्‍य होते हैं, किन्‍तु तुम्‍हारे पति तो साक्षात श्रीहरि हैं। गोपियों ने श्रीहरि को पति बनाने के लिये असंख्‍यों वर्ष तप किया था। असल में सच्‍चे पति तो वे ही नन्‍दनन्‍दन हैं, इसलिये तुम सब प्रकार से मन लगाकर श्रीकृष्‍ण नाम का ही कीर्तन किया करो। श्रीहरि के ही नाम का सदा स्‍मरण किया करो। उनका नाम पतितपावन है, सच्‍चे हृदय से जो एक बार भी यह कह देता है कि मैं तुम्‍हारी शरण हूँ, तो वे सभी पापों को क्षमा कर देते हैं।
क्रमशः

Comments

Popular posts from this blog

cc 201

362

cc 90