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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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नौराजी अपने दल के सब आदमियों को बुलाकर वह गदगद कण्‍ठ से कहने लगा- ‘भाइयो ! हम सब इतने दिन साथ रहे, तुम्‍हें मैं समय समय पर उचित-अनुचित आज्ञा देता रहा और तुमने भी प्राणों की कुछ भी परवा न करके मेरी समस्‍त आज्ञाओं का पालन किया। साथ में रहने से और नित्‍य के व्‍यवहारों से गलती और अपराधों का होना स्‍वाभाविक ही है; इसलिये भाई ! मुझसे जिसका भी अपकार हुआ हो, वह मुझे सच्‍चे हृदय से क्षमा कर दे। अब मैं अपने भगवान की शरण में जा रहा हूँ।जिनकी शरण में जाने से पापी-से-पापी भी सुखी और निर्भय हो जाता है। अब मैं किसी जीव की हिंसा न करूँगा। आज से मेरे लिये सभी प्राणी उस परमपिता परमात्‍मा के पुत्र हैं। जान बूझकर अब मैं एक चींटी की भी हिंसा नहीं करूँगा। बाल्‍यकाल से अब तक मैंने धन के लिये न जाने कितने पाप किये हैं, कितनी हिंसाएँ की हैं। अरबों-करोड़ों रुपये इन हाथों से लूटे हैं और खर्च किये हैं। अब मैं द्रव्‍य को अपने हाथों से स्‍पर्श भी न करूँगा। अब तक हजारों आदमियों का मेरे द्वारा प्रतिपालन होता था, आज से मैं स्‍वयं भिखारी बन गया हूँ, अब पेट की ज्‍वाला को बुझाने के लिये मैं द्वार द्वार पर मधुकरी भिक्षा करूँगा। तुम लोग मुझे क्षमा करो और ऐसा आशीर्वाद दो कि मैं अपने शेष जीवन को इसी प्रकार श्रीकृष्‍ण प्रेम में पागल बनकर बिताऊँ।’

नौरोजी ने ऐसी बात सुनकर उसके दल के सभी डाकू रोने लगे। उसका दल छिन्‍न भिन्‍न हो गया, बहुतों ने डाका डालने का काम छोड़ दिया। नौरोजी प्रभु के साथ चल दिया।आज तक बहुत से आदमियों ने प्रभु के साथ चलने की प्रार्थना की थी, किन्‍तु प्रभु ने किसी को भी साथ नहीं लिया। परम भाग्‍यवान नौरोजी के भाग्‍य की कोई कहाँ तक प्रशंसा करे, जिसे प्रभु ने प्रसन्‍नतापूर्वक साथ चलने की अनुमति दे दी।

आगे आगे महाप्रभु, उनके पीछे गोविन्‍द दास और सबसे पीछे नौरोजी संन्‍यासी चलते थे। इस प्रकार चलते चलते खण्‍डला में पहुँचे। वहाँ पर लोगों ने महाप्रभु का खूब सत्‍कार किया, वहाँ से चलकर प्रभु नासिक गये और वहाँ पंचवटी में नृत्‍य-कीर्तन करते हुए आनन्‍द में मग्‍न हो गये। नौरोजी महाप्रभु के श्रीअंग के पसीने को बार बार पोंछते रहते थे। उस समय के बड़ौदा के महाराज बड़े ही भक्‍त थे। उन्‍होंने बहुत द्रव्‍य लगाकर भगवान का एक मंदिर बनवाया था, उसमें स्‍वयं ही भगवान की पूजा तथा साधु महात्‍माओं का सत्‍कार करते थे। महाप्रभु श्रीकृष्‍ण की मूर्ति के दर्शन करके प्रेमानन्‍द में मग्‍न होकर नृत्‍य करने लगे। महाराज उनके अद्भुत नृत्‍य और अलौकिक प्रेम के भावों को देखकर मुग्‍ध हो गये। उन्‍होंने महाप्रभु का बहुत सत्‍कार किया। बहुत कुछ भेंट करने की इच्‍छा की किन्‍तु महाप्रभु ने संन्‍यास धर्म के अनुसार मुष्टि-भिक्षा के अतिरिक्‍त कुछ भी ग्रहण नहीं किया। बड़ौदा में ही आकर नौरोजी ने महाप्रभु के सामने अपने इस नश्वर शरीर का त्‍याग किया। महाप्रभु ने रोते रोते आत्‍मीय पुरुष की तरह एक भक्‍त वैष्‍णव की भाँति उसे अपने करकमलों से समाधि में सुला दिया। इस प्रकार जन्‍म से हिंसा और धन अपहरण करने वाला एक डाकू महाप्रभु की शरण आने से अमर हो गया।

नीलाचल में प्रभु का प्रत्‍यागमन….

बड़ौदा से चलकर महाप्रभु अहमदाबाद आये, वहाँ पर दो बंगाली वैष्‍णवों से प्रभु की भेंट हुई। उनसे नवद्वीप का समाचार पाकर प्रभु की पूर्वस्‍मृति पुन: जागृत हो उठी। उनसे कुशलक्षेम पूछकर प्रभु ने द्वारका के लिये प्रस्‍थान किया। द्वारका जी के मन्दिर में जाकर प्रभु आनन्‍द में मग्‍न होकर नृत्‍य कीर्तन करने लगे। वहाँ से समुद्र किनारे होते हुए सोमनाथ शिव जी के दर्शनों के लिये प्रभासक्षेत्र में आये, जहाँ पर प्राची सरस्‍वती हैं। इस प्रकार समस्‍त तीर्थों में भ्रमण करके अब प्रभु की इच्‍छा पुन: नीलाचल लौटने की हुई। इसलिये गोदावरी नदी के किनारे किनारे होते हुए पुन: विद्यानगर में पहुँच गये।
महाप्रभु के आने का समाचार पाते ही राय रामानन्‍द जी उसी समय प्रभु के दर्शनों के निमित्त दौड़े आये। प्रभु ने उनका गाढ़ालिंगन किया। राय ने विनीतभाव से कहा- ‘प्रभो ! इस अधम को आप भूले नहीं हैं और इसकी स्‍मृति अभी तक आपके हृदय में बनी हुई है, इस बात को स्‍मरण करके मैं प्रसन्‍नता के कारण अपने अंगों में फूला नहीं समाता। आज अपने पुन: दर्शन देकर मुझे अपनी परम कृपा का यथार्थ में ही पात्र बना लिया।’

प्रभु ने कहा- ‘राय महाशय, यथार्थ में तो आपके ही दर्शन से मेरे सब तीर्थ सफल हो गये थे। फिर भी मैं और तीर्थों में वैसे ही चला गया। जितना सुख मुझे यहाँ आपके साथ मिला था, उतना अन्‍यत्र कहीं भी नहीं मिला। अब फिर मैं उस आनन्‍द को प्राप्‍त करने आपके पास आया हूँ। कहावत है- ‘लाभाल्‍लोभ: प्रजायते।’ अर्थात जितना भी लाभ होता है, उतना ही अधिक लोभ बढ़ता जाता है। इसलिये अब तो यही सोचकर आया हूँ कि आपके ही साथ निरन्‍तर वास करके उस आनन्‍द रस का आस्‍वादन करता रहूँ।’
रामानन्‍द जी ने अत्‍यन्‍त ही संकोच के साथ कहा- ‘प्रभो! मैंने आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके महाराज को राज काज से अवकाश देने की प्रार्थना की थी। उन्‍होंने मेरी प्रार्थना को स्‍वीकार करके बुलाया है। अब तो आपके चरणों में रहने का सम्‍भवतया सौभाग्‍य प्राप्‍त हो सके।’
प्रभु ने कहा- ‘इसीलिये तो मैं ही हूँ, अब आपको साथ लेकर ही पुरी चलूँगा।’

राय महाशय ने कुछ विवशता सी दिखाते हुए कहा- ‘प्रभो! मेरे साथ चलने में आपको कष्‍ट होगा। अभी मुझे बहुत से राज काज करने शेष हैं, फिर मेरे साथ हाथी घोड़े, नौकर, चाकर बहुतसे चलेंगे। उन सबके साथ आपको कष्‍ट होगा। इसलिये आप पहले अकेले ही पुरी पधारें, फिर मैं भी पीछे से आ जाऊँगा।’
प्रभु ने राय रामानन्‍दजी की इस बात को स्‍वीकार किया और ये तीन चार दिन विद्यानगर में रहकर जिस रास्‍ते से आये थे, उसी से अलालनाथ पहुँच गये। अलालनाथ पहुँचने पर प्रभु ने कृष्‍णदास के द्वारा नित्‍यानन्‍द आदि के समीप अपने आने का समाचार भेजा। ये लोग प्रभु की प्रतीक्षा में उसी प्रकार बैठे हुए थे जिस प्रकार अंगदादि वानर समुन्‍द्र को पार करके सीता जी की खोज के लिये हुए श्रीहनुमान जी की प्रतीक्षा में समुद्र के किनारे बैठे थे। क्रमशः

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