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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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प्रभु का समाचार पाते ही नित्‍यानन्‍दादि सभी भक्‍त प्रभु से मिलने के लिये दौड़े आये। रास्‍ते में दूर से ही आते हुए उन्‍होंने प्रभु को देखा। प्रभु को देखते ही सभी ने भूमि पर लोटकर प्रभु के चरणों में साष्‍टांग प्रणाम किया। प्रभु ने उन सबको प्रभु क्रमश: अपने हाथों से उठा उठाकर प्रेमालिंगन दान दिया। आज दो वर्षों के पश्‍चात प्रभु का प्रेमालिंगन पाकर सभी प्रेम में बेसुध हो गये और प्रेम के अश्रु बहाते हुए प्रभु के पीछे पीछे चले।इतने में सामने से सार्वभौम भट्टाचार्य तथा गोपीनाथाचार्य प्रभु को आते हुए दिखायी दिये। प्रभु ने अस्‍त व्‍यस्‍त भाव से दौड़कर उनका जल्‍दी से आलिंगन करना चाहा, किन्‍तु वे इससे पहले ही प्रभु के चरणों में गिर पड़े। प्रभु ने उनको स्‍वयं उठाया, उनका आलिंगन किया और उनके वस्‍त्रों में लगी हुई धूलि को अपने हाथों से पोंछा। सभी लोग प्रभु के पीछे पीछे चले। सबसे पहले महाप्रभु जगन्‍नाथ जी के दर्शन के लिये गये। वहाँ के कर्मचारी प्रभु की प्रतीक्षा में सदा चिन्तित से बने रहते थे। सहसा प्रभु के आगमन का समाचार सुनकर सभी आनन्‍द के सहित नृत्‍य करने लगे। प्रभु ने भगवान को साष्‍टांग प्रणाम किया और भाँति-भाँति से स्‍तुति करने लगे। पुजारी ने आकर माला और प्रसाद प्रभु को भेंट किया। बहुत दिनों के पश्‍चात पुरुषोत्तमभगवान का महाप्रसाद पाकर प्रभु परम प्रसन्‍न हुए और प्रसाद को उसी समय उन्‍होंने पा लिया। फिर भक्‍तों के सहित मन्दिर की प्रदक्षिणा करते हुए प्रभु भट्टाचार्य सार्वभौम के घर आये। सार्वभौम ने प्रभु को भिक्षा के लिये निमन्त्रित किया और सभी भक्‍तों के सहित उन्‍होंने प्रभु को भिक्षा करायी।
प्रभु के रहने के लिये भट्टाचार्य ने महाराज प्रतापरुद्र जी को परामर्श करके महाराज के पुरोहित काशी मिश्र के एकान्‍त-निर्जन स्‍थान में पहले से ही प्रबन्‍ध कर रखा था। प्रभु को वह स्‍थान बहुत पसन्‍द आया और प्रभु उसी में रहने लगे।

प्रेम रस लोलुप भ्रमर भक्‍तों का आगमन…..

कस्‍तूरी को कितना भी छिपाकर रखो, उसकी गन्‍ध फैल ही जाती है और उसके प्रभाव को जानने वाले पुरुष दूर से ही जान जाते हैं कि यहाँ पर कीमती कस्‍तूरी विद्यमान है। प्रेम छिपाने से नहीं छिपता। प्रेम को विज्ञापन की आवश्‍यकता नहीं। कमल के खिलते ही मधु-लोलुप भ्रमर अपने आप ही उसके ऊपर टूट पड़ते हैं। रस होना चाहिये। भ्रमरों की क्‍या कमी। सर्दी के दिनों में आग जलाकर स्‍वतन्‍त्र स्‍थान में बैठ जाओ, तापने वाले अपने आप ही एकत्रित हो जायँगे-उन्‍हें बुलाने की आवश्‍यकता न पड़ेगी।

प्रेमार्णव गौरांगदेव के संसर्ग में रहकर जो पहले प्रेम रस का पान कर चुके थे। उन्‍हें भला उनके सिवा दूसरी जगह वह रस कहाँ मिल सकता था? जिनके कर्णों में उस अद्वितीय रस की प्रशंसा भी पड़ गयी थी वे उस रसराज महासागर के दर्शन के लिये लालायित बने हुए थे। सार्वभौम भट्टाचार्य के मुख से प्रभु की प्रशंसा सुनकर कटकाधिपति महाराज प्रतापरुद्रदेव जी भी प्रभु के दर्शनों के लिये अन्‍यन्‍त ही उत्‍कण्ठित बने हुए थे।

श्रीजगन्‍नाथ जी के मन्दिर के सभी कर्मचारी, पुरी के बहुत से गण्‍यमान पुरुष तथा अनेक साधु संत प्रभु के दर्शन की इच्‍छा रखते थे। प्रभु के पुरी पधारने का समाचार सुनकर भट्टाचार्य सार्वभौम के सहित बहुत से प्रेमी पुरुष प्रभु से मिलने के लिये आये। प्रभु ने सभी को प्रेमपूर्वक बैठने के लिये कहा। सभी प्रभु के चरणों में प्रणाम करके बैठ गये। सार्वभौम भट्टाचार्य प्रभु को सबका पृथक पृथक परिचय कराने लगे। सबसे पहले उन्‍होंने काशी मिश्र का परिचय दिया- ‘ये महाराज के कुलगुरु और राज्‍यपुरोहित श्रीकाशी मिश्र हैं। प्रभु के चरणों में इनका दृढ़ अनुराग है। आपके चले जाने पर ये दर्शन के लिये बड़े ही उत्‍कण्ठित से बने रहे। यह घर, जिसमें प्रभु ठहरे हुए हैं, इन्‍हीं का है।’

प्रभु ने मिश्र जी की ओर प्रेमभरी चितवन से देखते हुए कहा- ‘मिश्र जी, मैं आज आपके दर्शनों से कृतार्थ हुआ। आप तो मेरे पिता के समान हैं। आपके घर में रहकर मैं भक्‍तों के सहित कृष्‍ण कीर्तन करता हुआ कालयापन करूँगा और नित्‍य आपके दर्शन पाता रहूँगा। इससे बढ़कर मेरे लिये और कौन सी सौभाग्‍य की बात हो सकती है?’

हाथ जोड़े हुए अत्‍यन्‍त ही विनीत-भाव से काशी मिश्र ने कहा- ‘प्रभो ! यह घर आपका ही है और सेवा करने के लिये यह दास भी सदा आपके चरणों के समीप ही बना रहेगा। आप इसे अपना निजी सेवक समझकर जो भी आज्ञा हो नि:संकोच भाव से कर दिया करें।’
इसके अनन्‍तर सार्वभौम भट्टाचार्य ने जगन्‍नाथ जी के अन्‍तरंग सेवक जनार्दन भगवान के स्‍वर्णबेंतधारी कृष्‍णदास, प्रधान लिखिया शिखी माइती, उनके भाई मुरारि तथा बहिन माध्‍वी और महापात्र प्रहरिराज प्रद्युम्‍न मिश्र आदि जगन्‍नाथ जी के सेवकों का प्रभु को परिचय कराया। प्रभु इन सबका परिचय पाकर उनकी बड़ाई करने लगे- ‘आप लोग की धन्‍य हैं, जो निरन्‍तर श्रीभगवान की सेवा पूजा में लगे रहते हैं। मनुष्‍य का मुख्‍य कर्तव्‍य यही है कि वह भगवत्‍सेवा पूजा के अतिरिक्‍त मन से भी दूसरे संसारी कामों का चिन्‍तन न करे।’

सभी भक्‍तों ने प्रभु के चरणों में प्रणाम किया और महाप्रभु की आज्ञा पाकर वे अपने अपने स्‍थानों के लिये चले गये। इसके अनन्‍तर महाप्रभु ने अपने साथ जाने वाले सेवक कृष्‍णदास को बुलाया। उसके आ जाने पर उसे लक्ष्‍य करके प्रभु भट्टाचार्य सार्वभौम से कहने लगे- ‘भट्टाचार्य, आप लोगों ने इसे मेरे साथ इसलिये भेजा था कि अचेतनावस्‍था में यह मेरे शरीर की देख-रेख करे, इसने यथाशक्ति मेरी खूब सेवा शूश्रूषा की; किन्‍तु यह एक स्‍थान में कुछ दम्‍भी साधुओं के बहकाने से कामिनी कांचन का लोभ में फंस गया। यह मुझे छोड़कर उनके साथ चला गया। जिसे कामिनी कांचन का लोभ हैं, जो अपनी इन्द्रियों पर इतना भी निग्रह नहीं कर सकता, उसे अपने पास रखना मैं उचित नहीं समझता। इसलिये आप इससे कह दें कि जहाँ इसकी इच्‍छा हो चला जावे। अब यह मेरे साथ नहीं रह सकता।’

प्रभु की ऐसी बात सुनकर (काला) कृष्‍णदास बड़े ही जोरों के साथ रुदन करने लगा। किन्‍तु प्रभु ने उसे फिर किसी भी प्रकार अपने साथ रखना स्‍वीकार नहीं किया। तब तो वह निराश होकर नित्‍यानन्‍द जी की शरण में गया और उनके चरण पकड़कर रोने लगा।
क्रमशः

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