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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु जल्दी से उठे और भीतर से कुछ चीज उठाकर ले आये।प्रभु आकर रघुनाथ जी के ही समीप बैठ गये। रघुनाथदास जी संकोच के कारण और अधिक सिकुड़ गये। प्रभु उनके सुन्दर बालों पर धीरे-धीरे हाथ फेरते हुए कहने लगे- 'रघु! मैं तुम पर बहुत ही अधिक सन्तुष्ट हूँ। मैं प्रसन्न होकर तुम्हें कुछ देना चाहता हूँ, किन्तु मुझ निष्किंचन के पास देने को और है ही क्या? जो मेरी सबसे प्यारी सम्पत्ति है, उसे ही तुम्हें देकर मैं सन्तुष्ट हूंगा। शंकरारण्य सरस्वती वृन्दावन गये थे, उन्होंने वृन्दावन से लौटकर यह गुंजामाला और यह गोवर्धन पर्वत की शिला प्रसादी रूप में मुझे दी थी। तुम तो जानते ही होगे कि गिरिराज गोवर्धन पर्वत तो श्रीकृष्ण का साक्षात विग्रह ही है। श्रीकृष्ण में और गोवर्धन में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं है। इसीलिये आज तीन वर्षों से मैं इस सुन्दर शिला को अपने नेत्र जल से स्नान कराता रहा हूँ। मेरी विकलता की अवस्था में यह शिला मेरे ह्मदय को शीतल बनाती रही है। इसके स्पर्श से मेरी आँखें पवित्र हुई हैं। ललाट धन्य हुआ है, अनेकों बार इसने मेरे हृदय को परम शीतलता प्रदान की है। भगवान को गुंजामाला बहुत प्रिय थी, वे गोवर्धन पर्वत से गुंजों को पेड़ों सहित उखाड़-उखाड़कर उनकी मालाएँ बनाकर स्वयं पहनते और अपने साथी गोप-ग्वालों को भी पहनाते। इसीलिये मैं इसे भजन के समय पहना करता हूँ। ये दोनों वस्तुएँ मुझे अत्यन्त ही प्रिय हैं, इन्हें मैं तुम्हें सौंपता हूँ। तुम आज से इस गोवर्धन शिला की सात्त्विक पूजा किया करना। जल से स्नान करा दिया; तुलसी चढ़ा दी और भक्ति-भाव से दण्डवत कर ली, यही सात्त्विक सेवा का विधान है। तुलसी तथा जल के अभाव में केवल श्रद्धा सहित प्रणाम करने से भी काम चल सकता है। लो संभालो अपनी चीजों को।'
प्रभुप्रदत्त उन दोनों वस्तुओं को पाकर रघुनाथदास जी की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। वे प्रभु की इस अपार कृपा के बोझ से दब से गये। उन्होंने अत्यन्त ही पुलकित अंग से प्रभु के पादपद्मों में साष्टांग प्रणाम किया और भक्तिभाव से उन दोनों पूज्य वस्तुओं को हाथ फैलाकर दीन भिक्षुक की भाँति उन्हें स्वीकार किया।उस दिन से वे उस शिला की पूजा करने लगे। पूजा के लिये एक एक वितस्त के दो वस्त्र और एक काष्ठ का आसन स्वरूप गोस्वामी ने इन्हें दिया और मिट्ठी का एक टोंटनी दार करूवा भी लाकर इन्हें दिया।इनके द्वारा ये भगवान की सात्त्विक पूजा करते। इनका वैराग्य बड़ा ही उत्कट था। साधारण लोगों को तो इनके वैराग्य की कथा सुनकर विश्वास ही न होगा।ये वस्त्रों में बस एक फटी गुदड़ी ही रखते। गुदड़ी के अतिरिक्त दूसरा कोई भी वस्त्र नहीं पहनते थे। रात्रि में केवल घंटे-डेढ-घंटे सोते थे, नहीं तो निरन्तर भगवन्नाम स्मरण ही करते रहते। जिह्वा का स्वाद तो इन्होंने घर छोड़ने पर फिर कभी लिया ही नहीं।भिक्षा में जो भी रूखा-सूखा, मीठा-कड़वा जो कुछ मिल जाता, सबको मिला-जुलाकर खा लेते थे। अब इनके घोर वैराग्य की एक अदभुत कथा सुनिये। इससे इनकी तितिक्षा, सहनशीलता, जिह्वासंयम की कठोरता और निष्किंचनता का पता लग जायगा।
ये दोपहर को क्षेत्र से भिक्ष लाते थे।उसमें भी उन्हें कुछ परतन्त्रता सी दिखायी देने लगी। भण्डारी इन्हें अधिक भिक्षा देने लगा तथा और भी इन्होंने उसमें संग्रह के भाव देखे। अत: इन्होंने क्षेत्र से अन्न लाना भी बंद कर दिया। अब ये दूसरी ही तरह इस पेटरूपी गड्ढे को पाटने लगे। जगन्नाथ जी में दूकानों पर भगवान प्रसादी भात बिकता है, दुकानदारों की दुकान पर जब दो-तीन दिन भात नहीं बिकता है, तो वह सड़ जाता है। उस सड़े हुए चावलों को वे गौओं के लिये रास्ते में फेंक देते हैं।तैलंग देश वहाँ से पास में ही है, पुरी में बड़ी-बड़ी तैलंगी गौएं वैसे ही इधर-उधर घूमती रहती हैं। उनका पेट इसी प्रकार के भात से भर जाता है। सिंहद्वार के समीप में बहुत-सी दूकानें हैं, उन्हीं पर प्रसाद बिकता है। सड़े भात को सायंकाल के समय रघुनाथदास जी उठा ले जाते थे। फिर उसमें बहुत-सा जल डालकर धोते थे। उनमें से बहुत सड़े-सड़े दानों को बीन-बीन कर वे निकाल देते और जो कुछ अच्छे चावल के दाने शेष रह जाते उन्हें ही थोड़े नमक के साथ खाकर वे पानी पी लेते थे। बस, इसी प्रकार वे समय बिताने लगे। इस सारे काम को वे रात्रि में ही करते थे, जिससे कोई देखने न पावे।
एक दिन स्वरूप गोस्वामी ने इन्हें इस भात को खाते हुए देख लिया। उन्होंने हंस कर कहा- 'क्यों रघु ! अकेले ही अकेले ऐसे सुस्वादु पदार्थ को खा जाते हो, हमें एक दिन भी नहीं देते।
’रघुनाथदास जी कुछ लज्जित भाव से चुप हो गये।महाप्रभु तो अपने भक्तों की एक-एक बात की खोज-खबर रखते थे। एक दिन प्रभु ने गोविन्द से पूछा- 'गोविन्द मालूम पड़ता है, रघु अब क्षेत्र से भी भिक्षा नहीं लाता। वह भिक्षा कहाँ करता है?'
गोविन्द ने रघुनाथदास का सभी वृतान्त सुना दिया। सुनकर प्रभु के आनन्द का ठिकाना नहीं रहा। उसी दिन सांय काल के समय प्रभु रघुनाथ जी के स्थान पर गये। उस समय वे धीरे-धीरे उस सुस्वादु अन्न को खा रहे थे।प्रभु धीरे-धीरे जाकर उनके पीछे खड़े हो गये। रघुनाथ दास जी को क्या पता कि मेरे पीछे कौन खड़ा है? ज्यों ही उन्होंने ग्रास को मुंह में दिया त्यों ही प्रभु ने धीरे से कहा- 'क्यों जी स्वरूप के रघु ! हमारा निमन्त्रण भी बंद कर दिया और ऐसे सुन्दर-सुन्दर पदार्थों को भी आप-ही-आप छिपकर चुपके-चुपके खा जाते हो, हमें इसमें से कुछ भी नहीं देते।’
यह कहकर प्रभु ने उनके पात्र में से एक मुट्ठी चावल जल्दी से उठाकर अपने मुंह में डाल लिये। हाय, हाय करते हुए अत्यन्त ही करुण स्वर में रघुनाथदास जी रोते-रोते और उस पात्र को दोनों हाथों से पकड़े हुए कहने लगे- 'प्रभो ! यह आप क्या कर रहे हैं? नाथ ! यह आपके योग्य नहीं है। प्रभो ! इस गले हुए उच्छिष्ट अन्न को खाकर मुझे पाप का भागी न बनाइये।’
क्रमशः
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