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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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मुंह में भरे हुए ग्रास को जल्दी-जल्दी प्रभु खाते हुए फिर दूसरा ग्रास लेने के लिये उनकी ओर लपके, इतने में ही हल्ला-गुल्ला सुनकर गोस्वामी भी वहाँ आ उपस्थित हुए। प्रभु को रघुनाथ से भात छीनते देखकर उन्होंने उनका हाथ पकड़ लिया और कहने लगे- प्रभो ! यह आपके योग्य नहीं है।'
प्रभु उस सूखे भात को कठिनता से निगलते-निगलते कहने लगे- 'स्वरूप ! तुमसे मैं सत्य कहता हूँ, जितना स्वाद आज के इन चावलों में आया है, उतना जीवनपर्यन्त किसी भी पदार्थ में नहीं मिला।'
अहा, धन्य है, ऐसी भक्त वत्सलता को। हे प्रभो ! यह आपके वैराग्य का ही स्वाद है। हे गौर ! तुम्हीं जीवों को प्रेम-प्रदान करते हो और फिर तुम्हीं उसका रसास्वादन करके मग्न होते हो।हे चैतन्य! तुम्हारी लीला विचित्र है, तुम्हारी माया अपरम्पार है। हम पाप पंक में फंसे हुए विषयों को ही सर्वश्रेष्ठ सुख समझने वाले क्षुद्र प्राणी तुम्हारी लीलाओं का रहस्य समझ ही क्या सकते हैं। जिसके ऊपर तुम कृपा करते हो, वह संसार-सागर से बात-की-बात में पार हो जाता है।
इस प्रकार महामना श्री रघुनाथदास जी चैतन्यचरणों की अपार अनुकम्पा का अनुभव करते हुए सोलह वर्षों तक पुरी में इसी प्रकार का त्याग-वैराग्य युक्त प्रेममय जीवन बिताते रहे।
छोटे हरिदास को स्त्री-दर्शन का दण्ड…..
सचमुच संसार के आदि से सभी महापुरुष एक स्वर से निष्किंचन, भगवद्भक्त अथवा ज्ञाननिष्ठ वैरागी के लिये कामिनी और कांचन- इन दोनों वस्तुओं को विष बताते आये हैं। उन महापुरुषों ने संसार के सभी प्रिय लगने वाले पदार्थों का वर्गीकरण करके समस्त विषय-सुखों का समावेश इन दो ही शब्दों में कर दिया है।जो इन दोनों से बच गया वह इस अगाध समुद्र के परले पार पहुँच गया और जो इनमें फंस गया वह मंझधार में डुबकियां खाता बिलबिलाता रहा। कबीर दास ने क्या सुन्दर कहा है-
चलन चलन सब कोइ कहे, बिरला पहुँचे कोय।
एक 'कनक' अरु 'कामिनी' घाटी दुरलभ दोय।
यथार्थ में इन दो घाटियों का पार करना अत्यन्त ही कठिन हैं, इसीलिये महापुरुष स्वयं इनसे पृथक रहकर अपने अनुयायियों को कहकर, लिखकर, प्रसन्न होकर, नाराज होकर तथा भाँति-भाँति से घुमा-फिराकर इन्हीं दो वस्तुओं से पृथक रहने का उपदेश देते हैं।
त्याग और वैराग्य के साकार स्वरूप चैतन्य महाप्रभुदेव जी भी अपने विरक्त भक्तों को सदा इनसे बचे रहने का उपदेश करते और स्वयं भी उन पर कड़ी दृष्टि रखते। तभी तो आज त्यागिशिरोमणि श्रीगौर का यश सौरभ दिशा-विदिशाओं में व्याप्त हो रहा है। व्रजभूमि में असंख्यों स्थान महाप्रभु के अनुयायिकों के त्याग-वैराग्य का अभी तक स्मरण दिला रहे हैं।
हरिदास जी वयोवृद्ध थे और सदा नाम-जप ही किया करते थे। इनके अतिरिक्त एक दूसरे कीर्तनिया हरिदास और थेवे हरिदास जी से अवस्था में बहुत छोटे थे, गृहत्यागी थे और महाप्रभु को सदा अपने सुमधुर स्वर से संकीर्तन सुनाया करते थे। भक्तों में वे 'छोटे हरिदास' के नाम से प्रसिद्ध थे। वे पुरी में ही प्रभु के पास रहकर भजन-संकीर्तन किया करते थे।प्रभु के समीप बहुत-से विरक्त भक्त पृथक-पृथक स्थानों में रहते थे। वे सभी भक्ति के कारण कभी-कभी प्रभु को अपने स्थान पर बुलाकर भिक्षा कराया करते थे। भक्तवत्सल गौर उनकी प्रसन्नता के निमित्त उनके यहाँ चले आते थे और उनके भोजन की प्रशंसा करते हुए भिक्षा भी पा लेते थे।वहीं पर भगवानाचार्य नाम के एक विरक्त पण्डित निवास करते थे, उनके पिता सतानन्द खां घोर संसारी पुरुष थे, उनके छोटे भाई का नाम थो गोपाल भट्टाचार्य। गोपाल श्री काशी जी से वेदान्त पढ़कर आया था, उसकी बहुत इच्छा थी कि मैं प्रभु को अपना पढ़ा हुआ शारीरकभाष्य सुनाऊं, किन्तु वहाँ तो सब श्री कृष्ण कथा के श्रोता थे।जिसे जगत प्रपंच समझना हो और जीव-ब्रह्म की एकता का निर्णय करना हो, वह वेदान्तभाष्य सुन अथवा पढ़े। जहाँ श्री कृष्ण प्रेम को ही जीवन का एकमात्र ध्येय मानने वाले पुरुष हैं, जहाँ भेदाभेद को अचिन्त्य बताकर उससे उदासीन रहकर श्रीकृष्ण कथा की ही प्रधानता दी जाती है, वहाँ पदार्थों की सिद्धि के प्रसंग को सुनना कोई क्यों पसंद करेगा। अत: स्वरूप गोस्वामी के कहने से वे भट्टाचार्य महाशय अपने वेदान्त ज्ञान को ज्यों का त्यों ही लेकर अपने निवास स्थान को लौट गये।आचार्य भगवान जी वहीं पुरी में रह गये। उनकी स्वरूप दामोदर जी से बड़ी घनिष्ठता थी। वे बीच-बीच में कभी-कभी प्रभु का निमन्त्रण करके उन्हें भिक्षा कराया करते थे।जगन्नाथ जी में बने-बनाये पदार्थों का भोग लगता है और भगवान के महाप्रसाद को दुकानदार बेचते भी हैं किन्तु जो चावल बिना सिद्ध किये कच्चे ही भगवान को अर्पण किये जाते हैं, उन्हें 'प्रसादी' या 'अमानी' अन्न कहते हैं, उस का घर पर ही लोग भात बना लेते हैं। भगवान जी ने घर पर ही प्रभु के लिये भात बनाने का निश्चय किया।
शिखि माहिती का स्मरण होगा, श्री जगन्नाथ जी के मन्दिर में हिसाब-किताब लिखने का काम करते थे, उनके मुरारी नाम का एक छोटा भाई और माधवी नाम की एक बहिन थी। दक्षिण की यात्रा से लौटने पर सार्वभौम भट्टाचार्य ने इन तीनों भाई बहिनों का प्रभु से परिचय कराया था।ये तीनों ही श्रीकृष्ण भक्त थे और परस्पर बड़ा ही स्नेह रखते थे। माधवी दासी परम तपस्विनी और सदाचारिणी थी। इन तीनों का ही महाप्रभु के चरणों में दृढ़ अनुराग था। महाप्रभु माधवी दासी का गणना राधा जी के गणों में करते थे।उन दिनों राधा जी के गणों में साढ़े तीन पात्रों की गणना थी- (1) स्वरूप दामोदर, (2) राय रामानन्द, (3) शिखि माहिती और आधे पात्र में माधवी देवी की गणना थी। इन तीनों का महाप्रभु के प्रति अत्यन्त ही मधुर श्रीमती जी का सा सरस भाव था।
भगवानाचार्य जी ने प्रभु के निमन्त्रण के लिये बहुत बढि़या महीन शुक्ल चावल लाने के लिये छोटे हरिदास से कहा। छोटे हरिदास जी माधवी दासी के घर में भीतर चले गये और भीतर जाकर उनसे चावल मांगकर ले आये। आचार्य ने विधिपूर्वक चावल बनाये। कई प्रकार के शाक, दाल, पना तथा और भी कई प्रकार की चीजें उन्होंने प्रभु के निमित्त बनायीं।नियत समय पर प्रभु स्वयं आ गये। आचार्य ने इनके पैर धोये और सुन्दर स्वच्छ आसन पर बैठाकर उनके सामने भिक्षा परोसी।
क्रमशः
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