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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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वे अपनी कुटिया में से निकलकर प्रभु के शयन स्थान में गये। पुरी को अपने यहाँ आते देखकर प्रभु उठकर खड़े हो गये और उनकी यथा विधि अभ्यर्चना करके उन्हें बैठने के लिये आसन दिया।बातों-ही-बातों में पुरी जी ने हरिदास का प्रसंग छेड़ दिया और कहने लगे- 'प्रभो ! इन अल्प शक्ति वाले जीवों के साथ ऐसी कड़ाई ठीक नहीं है। बस, बहुत हो गया, अब सबको पता चल गया, अब कोई भूल से भी ऐसा व्यवहार न करेगा। अब आप उसे क्षमा कर दीजिये और अपने पास बुलाकर उसे अन्न-जल ग्रहण करने की आज्ञा दे दीजिये।'
पता नहीं प्रभु ने उसका और भी पहले कोई ऐसा निन्द्य आचरण देखा था या उसके बहाने सभी भक्तों को घोर वैराग्य की शिक्षा देना चाहते थे। हमारी समझ में आ ही क्या सकता है ! महाप्रभु पुरी के कहने पर भी राजी नहीं हुए।उन्होंने उसी प्रकार दृढ़ता के स्वर में कहा- 'भगवान ! आप मेरे पूज्य हैं, आपकी उचित अनुचित सभी प्रकार की आज्ञाओं का पालन करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ, किन्तु न जाने क्यों, इस बात को मेरा हृदय स्वीकार नहीं करता। आप इस सम्बन्ध में मुझसे कुछ भी न कहें।'
पुरी महाराज ने अपने वृद्धपने के सरल भाव से अपना अधिकार-सा दिखाते हुए कहा- 'प्रभो ! ऐसा हठ ठीक नहीं होता, जो हो गया सो हो गया उसके लिये इतनी ग्लानि का क्या काम? सभी अपने स्वभाव से मजबूर हैं।'
प्रभु ने कुछ उत्तेजना के साथ निश्चयात्मक स्वर में कहा- 'श्रीपाद ! इसे मैं भी जानता हूँ कि सभी अपने स्वभाव से मजबूर हैं। फिर मैं ही ही इससे कैसे बच सकता हूँ।मैं भी तो ऐसा करने के लिये मजबूर ही हूँ। इसका एक ही उपाय है, आप यहाँ सभी भक्तों को साथ लेकर रहें, मैं अकेला अलालनाथ में जाकर रहूँगा। बस, ऊपर के कामों के निमित्त गोविन्द मेरे साथ वहाँ रहेगा।
यह कहकर प्रभु ने गोविन्द को जोरों से आवाज दी और आप अपनी चद्दर को उठाकर अलालनाथ की ओर चलने लगे। जल्दी से उठकर पुरी महाराज ने प्रभु को पकड़ा और कहने लगे- 'आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, आपकी माया जानी नहीं जाती। पता नहीं क्या कराना चाहते हैं। अच्छी बात है, जो आपको अच्छा लगे वही कीजिये। मेरा ही यहाँ क्या रखा है? केवल आपके ही कारण मैं यहाँ ठहरा हुआ हूँ। आपके बिना मैं यहाँ रहने ही क्यों लगा? यदि आपने ऐसा निश्चय कर लिया है तो ठीक है। अब मैं इस सम्बन्ध में कभी कुछ न कहूँगा।'
यह कहकर पुरी महाराज अपनी कुटिया में चले गये, प्रभु फिर वहीं लेट गये।जब स्वरूपगोस्वामी ने समझ लिया कि प्रभु अब किसी की भी न सुनेंगे तो वे जगदानन्द, भगवानाचार्य, गदाधर गोस्वामी आदि दस-पांच भक्तों के साथ छोटे हरिदास के पास गये और उसे समझाने लगे- 'उपवास करके प्राण गँवाने से क्या लाभ? जीओगे तो भगवन्नाम-जाप करोगे, स्थान पर जाकर न सही, जब प्रभु जगन्नाथ जी के दर्शनों को जाया करें तब दूरसे दर्शन कर लिया करो।उनके होकर उनके दरबार में पड़े रहोगे तो कभी-न-कभी वे प्रसन्न हो ही जायँगे।'
कीर्तनिया हरिदास जी की समझ में यह बात आ गयी, उसने भक्तों के आग्रह से अन्न-जल ग्रहण कर लिया। वह नित्य प्रति दर्शनों को मन्दिर जाते समय दूर से दर्शन कर लेता और अपने को अभागा समझता हुआ कैदी की तरह जीवन बिताने लगा। उसे खाना-पीना कुछ भी अच्छा नहीं लगता था, किसी से मिलने की इच्छा नहीं होती थी, गाना-बजाना उसने एकदम छोड़ दिया। सदा वह अपने असद व्यवहार के विषय में ही सोचता रहता।होते-होते उसे संसार से एकदम वैराग्य हो गया। ऐसा प्रभुकृपाशून्य जीवन बीताना उसे भार सा प्रतीत होने लगा। अब उसे भक्तों के सामने मुख दिखाने में भी लज्जा होने लगी। इसलिये उसने इस जीवन का अन्त करने का दृढ़ निश्चय कर लिया।
धन मांगने वाले भृत्य को दण्ड….
प्रेमरूपी धन की प्राप्ति में ही सदा यत्नशील रहते हैं, वे उदरपूर्ति के लिये अन्न और अंग रक्षा के लिये साधारण वस्त्रों के अतिरिक्त किसी प्रकार के धन का संग्रह नहीं करते। धन का स्वभाव है लोभ उत्पन्न करना और लोभ से द्वेष की प्रगाढ़ मित्रता है।जहाँ लोभ रहेगा वहाँ दूसरों के प्रति द्वेष अवश्य विद्यमान रहेगा। द्वेष से घृणा होती है और पुरुषों के प्रति घृणा करना यही नाश का कारण है। इन्हीं सब बातों को सोचकर तो त्यागी महापुरुष द्रव्य का स्पर्श नहीं करते।वे जहाँ तक हो सकता है, द्रव्य से दूर ही रहते हैं। गृहस्थियों का तो द्रव्य के बिना काम चलना ही कठिन है, उन्हें तो गृहस्थी चलाने के लिये द्रव्य रखना ही होगा, किन्तु उन्हें भी अधर्म से या अनुचित उपायों से धनार्जन करने की प्रवृत्ति को एकदम त्याग देना चाहिये। धर्म पूर्वक न्यायोचित रीति से प्राप्त किया हुआ धन ही फलीभूत होता है और वही उन्हें संसारी बन्धनों से छुड़ाकर धीरे-धीरे परमार्थ की ओर ले जाता है।जो संखिया वैसे ही बिना सोचे-विचारे खा लिया जाये तो वह मृत्यु का कारण होता है और उसे ही वैद्य के कथनानुसार शोधकर खाया जाय तो वह रसायन का काम करता है, उससे शरीर नीरोग होकर सम्पूर्ण अंग पुष्ट होते हैं। इसलिये वैद्य रूपी शास्त्र की बतायी हुई धर्मरूपी विधि से सेवन किये जाने वाला विषरूपी धन भी अमरता प्रदान करने वाला होता है।
महाप्रभु चैतन्यदेव जिस प्रकार स्त्री संगियों से डरते थे, उसी प्रकार धन लोलुपों से भी वे सदा सतर्क रहते थे। जो स्त्री सेवन अविधिपूर्वक कामना वासना की पूर्ति के लिये किया जाता है, शास्त्रों में उसी की निन्दा और उसी कामिनी को नरक का द्वार बताया है।जिसका पाणि ग्रहण शास्त्र मर्यादा के साथ विधि पूर्वक किया गया है, वह तो कामिनी नहीं, धर्म पत्नी है। उसका उपयोग कामवासनातृप्ति न होकर धार्मिक कृत्यों में सहायता प्रदान करना है। ऐसी स्त्रियों का संग तो प्रवृत्ति मार्ग वाले गृहस्थियों के लिये परम धर्म है।इसी प्रकार धर्म पूर्वक विधियुक्त, विनय और पात्रता के साथ उपार्जन किया हुआ धन धर्म तथा सुख का प्रधान कारण होता है। उस धन को कोई अन्यान से अपनाना चाहता है तो वह विषयी है, ऐसे विषयी लोगों का साथ कभी भी न करना चाहिये।
क्रमशः
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