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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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श्री अद्वैताचार्य गृहस्थी थे, उनके दो स्त्रियां थीं, छ: पुत्र थे, दो चार दासी दास भी थे, बड़े पुत्र अच्युतानन्द को छोड़कर सभी घर-गृहस्थी वाले थे। सारांश कि उनका परिवार बहुत बड़ा था। इतना बड़ा परिवार होने पर भी वे भक्त थे।भक्तों को बहुधा लोग बावला कहा करते हैं। एक कहावत भी है-
भक्त बावले, ज्ञानी अल्हड़, योगी बड़े निखट्टू।
कर्मकांडी ऐसे डोलें, ज्यों भाड़े के टट्टू।
अस्तु, बावले भक्तों के यहाँ यह मेरा है, यह तेरा है का तो हिसाब ही नहीं। जो भी आओ खूब खाओ। जिसे जिस चीज की आवश्यकता हो, ले जाओ। सबके लिये उनका दरवाजा खुला रहता है। वास्तव में उदारता इसी का नाम है।जिसके यहाँ मित्र, अतिथि, स्वजन और अन्य जन बिना संकोच के घर की भाँति रोज भोजन करते हैं, जिसका हाथ सदा खुला रहता है, वही सच्चा उदार है, वही श्री कृष्ण प्रेम का अधिकारी भी होता है। जिसे पैसों से प्रेम है, जो द्रव्य का लोभी है, वह भगवान से प्रेम कर ही कैसे सकता है? वैष्णवों के लिये अद्वैताचार्य जी का घर धर्मशाला ही नहीं किंतु नि:शुल्क भोजनालय भी था ।जो भी आवे जब तक रहना चाहे आचार्य के घर पड़ा रहे। आचार्य सत्कारपूर्वक उसे खिलाते पिलाते थे। इस उदार वृत्ति के कारण आचार्य पर कुछ कर्ज भी हो गया था।उनके यहाँ बाउल विश्वास नाम का एक भृत्य था। आचार्य के चरणों में उनकी अनन्य श्रद्धा थी और वह उनके परिवार की सदा तन-मन से सेवा किया करता था।वह आचार्य के साथ-साथ पुरी भी जाया करता था। आचार्य को द्रव्य का संकोच होता है, इससे उसे मानसिक दु:ख होता था। उनके ऊपर कुछ ऋण भी हो गया, इसका उसे स्वयं ही सोच था। पुरी में उसने प्रभु का इतना अधिक प्रभाव देखा।
महाराज प्रतापरुद्र जी प्रभु को ईश्वर तुल्य मानते थे और गुरु भाव से उनकी प्रत्येक आज्ञा का पालने करने के लिये तत्पर रहते थे। विश्वास ने सोचा कि महाराज से ही आचार्य के ऋण परिशोध के लिये क्यों न कहा जाय? यदि महाराज के कानों तक यह बात पहुँच गयी तो सदा के लिये इनके व्यय का सुदृढ़ प्रबन्ध हो जायेगा।यह सोचकर उसने आचार्य से छिपकर स्वयं जाकर महाराज प्रतापरुद्र जी को एक प्रार्थना-पत्र दिया।उसमें उसने आचार्य को साक्षात ईश्वर का अवतार बताकर उनके ऋणपरिशोध और व्यय का स्थायी प्रबन्ध कर देने की प्रार्थना की।
महाराज ने वह पत्र प्रभु के पास पहुँचा दिया। पत्र को पढ़ते ही प्रभु आश्चर्य चकित हो गये। उनके प्रभाव का इस प्रकार दुरुपयोग किया जाता है, यह सोचकर उन्हें विश्वास के ऊपर रोष आया। उसी समय गोविन्द को बुलाकर प्रभु ने कठोरता के साथ आज्ञा दी- 'गोविन्द ! देखना आज से बाउल विश्वास हमारे यहाँ न आने पावे। वह हमारे और आचार्य के नाम को बदनाम करने वाला है।‘
गोविन्द सिर नीचा किये हुए चुपचाप लौट गया। उसने नीचे जाकर ठहरे हुए भक्तों से कहा। भक्तों के द्वारा आचार्य को इस बात का पता लगा। वे जल्दी से प्रभु के पास दौड़े आये और उनके पैर पकड़कर गद्गद कण्ठ से कहने लगे- 'प्रभो ! यह अपराध तो मेरा है। बाउल ने जो भी कुछ किया है, मेरे ही लिये किया है।इसके लिये उसे दण्ड न देकर मुझे दण्ड दीजिये। अपराध के मूल कारण तो हमी हैं।’
महाप्रभु आचार्य की प्रार्थना की उपेक्षा न कर सके। आचार्य के अवतारी होने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी। किन्तु अवतारी होकर क्षुद्र पैसों के लिये विषयी पुरुषों से प्रार्थना की जाय यह अवतारी पुरुषों के लिये महान कलंक की बात है।आवश्यकता पड़ने पर याचना करना पाप नहीं है, किन्तु अवतार पने की आड़ में द्रव्य मांगना महापाप है, बेचारा बावला बाउल क्या जाने, उस अशिक्षित नौकर को इतनी समझ कहाँ, उसने तो अपनी तरफ से अच्छा ही समझकर यह काम किया था। प्रभु ने अज्ञान में किये हुए उसके अपराध को क्षमा कर दिया और भविष्य में फिर ऐसा कभी न करने के लिये उसे समझा दिया।
गोपीनाथ पट्टनायक सूली से बचे….
वृन्द राय रामानन्द जी के पिता राजा भवानन्द जी के राय रामानन्द, गोपीनाथ पट्टनायक और वाणीनाथ आदि पाँच पुत्र थे, जिन्हें प्रभु पाँच पाण्डवों की उपमा दिया करते थे और भवानन्द जी का पाण्डु कहकर सम्मान और सत्कार किया करते थे। वाणीनाथ तो सदा प्रभु की सेवा में रहते थे।राय रामानन्द पहले विद्यानगर के शासक थे, पीछे से उस काम को छोड़कर वे सदा पुरी में ही प्रभु के पादपद्मों के सन्निकट निवास किया करते थे और महाप्रभु को निरन्तर श्रीकृष्ण कथा श्रवण कराते रहते। उनके छोटे भाई गोपीनाथ पट्टनायक ‘माल जाठ्या दण्डपाट’ नामक उड़ीसा राज्यान्तर्गत एक प्रान्त के शासक थे।ये बड़े शौकीन थे, इनका रहन सहन, ठाट बाट, सब राजसी ढंग का ही था। धन पारक जिस प्रकार प्रायः लोग विषयी बन जाते हैं, उसी प्रकार के ये विषयी बने हुए थे। विषयी लोगों की इच्छा सर्वभुक अग्नि के समान होती है, उसमें धनरूपी ईंधन कितना भी क्यों न डाल दिया जाय उसकरी तृप्ति नहीं होती। तभी तो विषयी पुरुषों को शास्त्रकारों ने अविश्वासी कहा है। विषयी लोगों के वचनों का कभी विश्वास न करना चाहिये।उनके पास कोई धरोहर की चीज रखकर फिर उसे प्राप्त करने की आशा व्यर्थ है। विषय होता ही तब है जब हृदय में अविवेक होता है और अविवेक में अपने पराये या हानि लाभ का ध्यान नहीं रहता। इसलिये विषयी पुरुष अपने को तो आपत्ति के जाल में फंसाता ही है, साथ ही अपने संसर्गियों को भी सदा क्लेश पहुँचाता रहता है। विषयियों का संसर्ग होने से किसे क्लेश नहीं हुआ है। इसीलिये नीतिकारों ने कहा है-
दुर्वतसंगातिरनर्थपरम्पाराया
हेतू: सतां भावति किं वचनीयमत्र।
लंकेश्वरो हरति दाशरथे: कलत्रं
प्राप्नोति बंधनमसौ किल सिंधुराज:॥
इसमें विशेष कहने सुनने की बात ही क्या है? यह तो सनातन की रीति चली आयी है कि विषयी पुरुषों से संसर्ग रचाने से अच्छे पुरुषों को भी क्लेश होता ही है। देखो, उस विषयी रावण ने तो जनकनन्दिनी सीता जी का हरण किया और बन्धन में पड़ा बेचारा समुद्र।साथियों के दुःख सुख का उपभोग सभी को करना होता है।वह सम्बन्धी नहीं जो सुख में सम्मिलित रहता है और दुःख में दूर हो जाता है।
क्रमशः
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