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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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किन्तु एक बात है, यदि खोटे पुरुषों का सौभाग्यवश किसी महापुरुष से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध हो जाता है तो उसके इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर जाते हैं।साधु पुरुष तो सदा विषयी पुरुषों से दूर ही रहते हैं, किन्तु विषयी किसी भी प्रकार से उनके शरणापन्न हो जाय, तो फिर उसका बेड़ा पार ही समझना चाहिये। महापुरुषों को यदि किसी के दुःख को देखकर दुःख भी होता है तो फिर वह उस दुःख से छूट ही जाता है, जब संसारी दुःख महापुरुषों की तनिक सी इच्छा से छूट जाते हैंतब शुद्ध हृदय से और श्रद्धाभक्ति पूर्वक जो उसकी शरण में जाता है उसका कल्याण तो होगा ही- इसमें कहना ही क्या? राजा भवानन्द जी शुद्ध हृदय से प्रभु के भक्त थे। उनके पुत्र गोपीनाथ पट्टनायक महान विषयी थे। पिता का महाप्रभु के साथ सम्बन्ध था। इसी सम्बंध से उनका प्रभु के साथ थोड़ा बहुत सम्बन्ध था। इस सम्बन्धी के सम्बन्ध संसर्ग के ही कारण वे सूली पर चढ़े हुए भी बच गये। महापुरुषों की महिमा ऐसी ही है।

गोपीनाथ एक प्रदेश के शासक थे। सम्पूर्ण प्रान्त की आय उन्हीं के पास आती थी। वे उसमें से अपना नियत वेतन रखकर शेष रुपयों को राजदरबार में भेज देते थे। किन्तु विषयियों में इतना संयम कहाँ कि वे दूसरे के द्रव्य की परवा करें। अविवेक के कारण विषयी पुरुषों को बपने पराये का ज्ञान नहीं रहता। गोपीनाथ पट्टनायक भी राजकोष में भेजने वाले द्रव्य को अपने ही खर्च में व्यय कर देते।इस प्रकार उड़ीसा के महाराज के दो लाख रूपये उनकी ओर हो गये। महाराज ने इनसे अपने रुपये माँगे, किन्तु इनके पास रुपये कहाँ? उन्हें तो वेश्या और कलाकारों ने अपना बना लिया। गोपीनाथ ने महाराज से प्रार्थना की कि ‘मेरे पास नकद रूपये तो हैं नहींमेरे पास दस बीस घोड़े हैं कुछ और भी सामान है, इसे जितने में समझें ले लें, शेष रुपये मैं धीरे-धीरे देता रहूँगा।’ महाराज ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और घोड़ों की कीमत निश्चय करने के निमित्त अपने एक लड़के को भेजा।
वह राजकुमार बड़ा बुद्धिमान था, उसे घोड़ों की खूब परख थी, वह अपने दस-बीस नौकरों के साथ घोड़े की कीमत निश्चय करने वहाँ गया। राजकुमार का स्वभाव था कि वह ऊपर को सिर करके बार बार इधर उधर मुँह फिरा फिराकर बातें किया करता था। राजपुत्र था, उसे अपने राजपाट और अधिकार का अभिमान था, इसलिये कोई उसके सामने बोलता तक नहीं था। उसने चारों ओर घोड़ों को देख-भालकर मूल्य निश्चय करना आरम्भ किया।जिन्हें गोपीनाथ दो चार हजार के मूल्य का समझते थे, उनका उसने बहुत ही थोड़ा मूल्य बताया। महाराज गोपीनाथ को भवानन्द जी के सम्बन्ध से पुत्र की भाँति मानते थे, इसलिये वे बड़े ढ़ीठ हो गये थे। राजपुत्रों को वे कुछ समझते ही नहीं थे। जब राजपुत्र ने दो चार घोड़ों का ही इतना कम मूल्य लगाया तब गोपीनाथ से न रहा गया। उन्होंने कहा- ‘श्रीमान ! यह तो आप बहुत ही कम मूल्य लगा रहे हैं।’
राजपुत्र ने कुछ रोष के साथ कहा- ‘तुम क्या चाहते हो, दो लाख रुपये इन घोड़ों में ही बेबाक कर दें? जितने के होंगे उतने ही तो लगावेंगे।’ 
गोपीनाथ ने अपने रोष को रोकते हुए कहा- ‘श्रीमान ! घोड़े बहुत बढि़या नस्ल के हैं। इनता मूल्य तो इनके लिये बहुत ही कम है।’
इस बात पर कुपित होकर राजपुत्र ने कहा- ‘दुनिया भर के रद्दी घोड़े इकट्ठे कर रखे हैं और चाहते हैं इन्हें ही देकर दो लाख रूपयों से बेबाक हो जायँ। यह नहीं होने का। घोड़े जितने के होंगे, उतने के ही लगाये जायँगे।’ 

राजप्रसाद प्राप्त मानी गोपीनाथ अपने इस अपमान को सहन नहीं कर सके। उन्होंने राजपुत्र की उपेक्षा करते हुए धीरे से व्यंग्य के स्वर में कहा- ‘कम से कम मेरे ये घोड़े तुम्हारी तरह ऊपर मुँह उठाकर इधर उधर तो नहीं देखते।’ उनका भाव था कि तुम्हारी अपेक्षा घोड़ों का मूल्य अधिक है।आत्मसम्मानी राजपुत्र इस अपमान को सहन नहीं कर सका। वह क्रोध के कारण जलने लगा। उस समय तो उसने कुछ नहीं कहा। उसने सोचा कि यहाँ हम कुछ कहें तो बात बढ़ जाय और महाराज न जाने उसका क्या अर्थ लगावें। शासन में अभी हम स्वतन्त्र नहीं हैं, यही सोचकर वह वहाँ से चुपचाप महाराज के पास चला गया। वहाँ जाकर उसने गोपीनाथ की बहुत सी शिकायतें करते हुए कहा- ‘पिताजी ! वह तो महाविषयी है, एक भी पैदा देना नहीं चाहता।उलटे उसने मेरा घोर अपमान किया है। उसने मेरे लिये ऐसी बुरी बात कही है, जिसे आपके सामने कहने में मुझे लज्जा आती है। सब लोगों के सामने वह मेरी एक सी निन्दा कर जाय? नौकर होकर उसका ऐसा भारी साहस? यह सब आपकी ही ढील का कारण है। उसे जब तक चाँग पर न चढ़ाया जायेगा तब तक रुपये वसूल नहीं होंगे, आप निश्चय समझिये।’
महाराज ने सोचा- ‘हमें तो रुपये मिलने चाहिये। सचमुच जब तक उसे भारी भय न दिखाया जायगा, तब तक वह रुपये नहीं देने का। एक बार उसे चाँग पर चढ़ाने की आज्ञा दे दें। सम्भव है इस भय से रुपये दे दे। नहीं तो पीछे उसे अपनी विशेष आज्ञा से छोड़ देंगे। भवानन्द के पुत्र को भला हम दो लाख रुपयों के पीछे चाँग पर थोड़े ही चढ़वा सकते हैं।अभी कह दें, इससे राजकुमार का क्रोध भी शान्त हो जायगा और रुपये भी सम्भवतया मिल ही जायँगे। यह सोचकर महाराज ने कह दिया- ‘अच्छा भाई, वही काम करो, जिससे उससे रुपये मिलें। चढ़वा दो उसे चाँग पर।’

बस, फिर क्या था। राजपुत्र ने फौरन आज्ञा दी कि गोपीनाथ को यहाँ बाँधकर लाया जाय। क्षण भर में उसकी आज्ञा पालन की गयी। गोपीनाथ बाँधकर चाँग के समीप खड़े किये गये। चाँग एक प्रकार से सूली का ही नाम है। सूली में और चाँग में इतना ही अन्तर है कि सूली गुदा में होकर डाली जाती है और सिर में होकर पार निकाल ली जाती है।इससे जल्दी प्राण नहीं निकलते, बहुत देर में तड़प तड़प कर प्राण निकलते हैं। चाँग उससे कुछ सुखकर प्राण नाशक क्रिया है। एक बड़ा सा मंच होता है। उस मंच के नीचे भाग में तीक्ष्ण धार वाला एक बहुत बड़ा खड्ग लगा रहता है।
क्रमशः

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