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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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गद्गद कण्ठ से दीनता के साथ वे कहने लगे- ‘हे दयालो ! हे भक्तवत्सल !! आपने ही हमारा इस भयंकर विपत्ति से उद्धार किया है। प्रभो ! आपकी असीम कृपा के बिना ऐसा असम्भव कार्य कभी नहीं हो सकता कि चाँग पर चढ़ा हुआ मनुष्य फिर जीवित ही उतर आवे !'
प्रभु उनकी भगवद्भक्ति की प्रशंसा करते हुए कहने लगे- ‘इसे समझा दो, अब कभी ऐसा काम न करे। राजा के पैसे को कभी भी अपने खर्च में न लावे।’
इस प्रकार समझा बुझाकर प्रभु ने उन सब पिता-पुत्रों को विदा किया। उसी समय काशी मिश्र भी आ पहुँचे। प्रभु को प्रणाम करके उन्होंने कहा- ‘प्रभो आज आपकी कृपा से ये पिता पुत्र तो खूब विपत्ति से बचे।’
प्रभु ने कुछ खिन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘मिश्र जी क्या बताऊँ? मैं तो इन विषयी लोगों के संसर्ग से बड़ा दुखी हूँ। मैं चाहता हूँ, इनकी कोई बात मेरे कानों में न पड़े। किन्तु जब यहाँ रहता हूँ, तब लोग मुझसे आकर कह ही देते हैं। सुनकर मुझे क्लेश होता ही है, इसलिये पुरी छोड़कर अब मैं अलालनाथ में जाकर रहूँगा। वहाँ न इन विषयी लोगों का संसर्ग होगा और न ये बातें सुनने में आवेंगी।’
मिश्र जी ने कहा- ‘आपको इन बातों से क्या? यह तो संसार है। इसमें तो ऐसी बातें होती ही रहती हैं। आप किस-किसका शोक करेंगे? आपसे क्या, कोई कुछ भी करे ! आपके भक्त तो सभी विषयत्यागी वैरागी हैं। रघुनाथदास जी को देखिये सब कुद छोड़ छाड़कर क्षेत्र के टुकड़ों पर निर्वाह करते हैं। रामानन्द तो पूरे संन्यासी हैं ही।’
प्रभु ने कहा- ‘चाहे कैसा भी क्यों न हो, अपना कुछ सम्बन्ध रहने से दुःख सुख प्रतीत होता ही है। ये विषयी ठहरे, बिना रुपया चुराये मानेंगे नहीं, महाराज कफर इन्हें चाँग पर चढ़ावेंगे। आज बच गये तो एक न एक दिन फिर यही होना है।’
मिश्र जी ने कहा- ‘नहीं, ऐसा नहीं होगा। महाराज भवानन्द जी को बहुत प्यार करते हैं।’
इसके अनन्तर और भी बहुत-सी बातें होती रहीं। अन्त में काशी मिश्र प्रभु की आज्ञा लेकर चले गये।महाराज प्रतापरुद्र जी अपने कुलगुरु श्री काशी मिश्र के अनन्य भक्त थे। पुरी में जब भी वे रहते, तभी रोज उनके घर आकर पैर दबाते थे। मिश्र जी भी उनसे अत्यधिक स्नेह मानते थे। एक दिन रात्रि में महाराज आकर मिश्र जी के पैर दबाने लगे।बातों ही बातों में मिश्र जी ने प्रसंग छेड़ दिया कि महाप्रभु तो पुरी छोड़कर अब अलालनाथ जाना चाहते हैं। पैरों को पकड़े हुए सम्भ्रम के साथ महाराज ने कहा- ‘क्यों, क्यों ! उन्हें यहाँ क्या कष्ट है? जो भी कोई कष्ट हो उसे दूर कीजिये।मैं आपका सेवक सब प्रकार से स्वयं उनकी सेवा करने को उपस्थित हूँ।’
मिश्र जी ने कहा- ‘उन्हें गोपीनाथ वाली घटना से बड़ा कष्ट हुआ है। वे कहते हैं, विषयियों के संसर्ग में रहना ठीक नहीं है।’
महाराज ने कहा- ‘श्रीमहाराज ! मैंने तो तुम्हें धमकाने के लिये ऐसा किया था। वैसे भवानन्द जी के प्रति मेरी बड़ी श्रद्धा है। इस छोटी सी बात के पीछे प्रभु पुरी को क्यों परित्याग कर रहे हैं। दो लाख रुपयों की कौन सी बात है? मैं रुपयों को छोड़ दूँगा। आप जैसे भी बने तैसे प्रभु को यहीं रखिये।’
मिश्र जी ने कहा- ‘रुपये छोड़ने को वे नहीं कहते। रुपयों की बात सुनकर तो उन्हें और अधिक दुःख होगा। वैसे ही वे इस झंझट से दूर रहना चाहते हैं। कहते हैं- रोज रोज यही झगड़ा चला रहेगा। गोपीनाथ फिर ऐसा ही करेगा।’
महाराज ने कहा- ‘आप उन्हें रुपयो की बात कहें ही नहीं। गोपीनाथ तो अपनी ही आदमी है। अब झगड़ा क्यों होगा? मैं उसे समझा दूँगा, आप महाप्रभु को जाने न दें। जैसे भी रख सकें अनुनय-विनय और प्रार्थना करके उन्हें यहीं रखें।’
महाराज के चले जाने पर दूसरे दिन मिश्र जी ने सभी बातें आकर प्रभु से कहीं ! सब बातों को सुनकर प्रभु कहने लगे- ‘यह आपने क्या किया? यह तो दो लाख रुपये आपने मुझे ही दिलवा दिये। इस राज प्रतिग्रह को लेकर मैं उलटा पाप का भागी बना।’
मिश्र जी ने सभी बातें प्रभु को समझा दीं। महाराज के शील, स्वभाव, नम्रता और सदगुणों की प्रशंसा की। प्रभु उनके भक्ति भाव की बातें सुनकर सन्तुष्ट हुए और उन्होंने अलालनाथ जाने का विचार परित्याग कर दिया।
इधर महाराज ने आकर गोपीनाथ जी को बुलाया और उन्हें पुत्र की भाँति समझाते हुए कहने लगे- ‘देखो इस प्रकार व्यर्थ व्यय नहीं करना चाहिये। तुमने बिना पूछे इतने रुपये खर्च कर दिये इसलिये हमें क्रोध आ गया। जाओ, वे रुपये माफ किये। अब फिर ऐसा काम कभी भी न करना। यदि इतने वेतन से तुम्हारा कान नहीं चलता है तो हमसे कहना चाहिये था।तब तक तुमने यह बात हमसे कभी नहीं कही। आज से हमने तुम्हारा वेतन भी दुगुना कर दिया।’
इस प्रकार दो लाख रुपये माफ हो जाने पर और वेतन भी दुगुना हो जाने से गोपीनाथ जी को परम प्रसन्नता हुई। उसी समय वे आकर प्रभु के पैरों में पड़ गये और रोते-रोते कहने लगे- ‘प्रभो ! मुझे अब अपने चरणों की शरण में लीजिये, अब मुझे इस विषय जंजाल से छुड़ाइये।'
प्रभु ने उन्हें प्रेमपूर्वक आलिंगन किया और फिर कभी ऐसा काम न करने के लिये कहकर विदा कियाजब महापुरुषों की तनिक सी कृपा होने पर गोपीनाथ सपरिवार सूली से बच गये, दो लाख रुपये माफ हो गये, वेतन दुगुना हो गया और पहले से भी अधिक राजा के प्रीतिभाजन बन गये, तब जो अनन्यभाव से महापुरुषों के चरणों ही सेवा करते हैं और उनके ऊपर जो महापुरुषों की कृपा होती है, उस कृपा के फल का तो कहना ही क्या? उस कृपा से तो फिर मनुष्य का इस संसार से ही सम्बन्ध छूट जाता है। वह तो फिर सर्वतोभावेन प्रभु का ही हो जाता है। धन्य है ऐसी कृपालुता को।
श्री शिवानन्द सेन की सहनशीलता….
महापुरुषों को बड़ा भारी कोप और नीच पुरुषों का अत्यधिक स्नेह दोनों बराबर ही हैं। बल्कि कुपुरुषों के प्रेम से सत्पुरुषों का क्रोध लाख दर्जे अच्छा है, किन्तु सत्पुरुषों के क्रोध को सहन करने की शक्ति सब किसी में नहीं होती है।
क्रमशः
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