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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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कोई परम भाग्यवान क्षमाशील भगवद्भक्त ही महापुरुषों के क्रोध को बिना मन में विकार लाये सहन करने में समर्थ होते हैं और इसीलिये वे संसार में सुयश के भागी बनते हैं क्योंकि शास्त्रों में मनुष्य का भूषण सुन्दर रूप बताया गया है, सुन्दर रूप भी तभी शोभा पाता है, जब उसके साथ सदगुण भी हों। सदगुणों का भूषण ज्ञान है और ज्ञान का भूषण क्षमा है।चाहे मनुष्य कितना भी बड़ा ज्ञानी क्यों न हो, उसमें कितने ही सदगुण क्यों न हों, उसका रूप कितना ही सुन्दर क्यों न हो, यदि उसमें क्षमा नहीं है, यदि वह लोगों के द्वारा कही हुई कड़वी बातों को प्रसन्नतापूर्वक सहन नहीं कर सकता तो उसका रूप, ज्ञान और सभी प्रकार के सदगुण व्यर्थ ही हैं।

क्षमावान तो कोई शिवानन्द जी सेन के समान लाखों-करोड़ों में एक आध ही मिलेंगे। महात्मा शिवानन्द जी तो क्षमा के अवतार ही थे।गौड़ीय भक्त रथ यात्रा को उपलक्ष्य बनाकर प्रतिवर्ष ज्येष्ठ  के अन्त में अपने स्त्री-बच्चों के सहित श्री जगन्नाथ पुरी में आते थे और बरसात के चार मास बिताकर अन्त में अपने-अपने घरों को लौट जाते थे। उन सबके लाने का, मार्ग में सभी प्रकार के प्रबन्ध करने का भार प्रभु ने शिवानन्द जी को ही सौंप दिया था। वे भी प्रतिवर्ष अपने पास से हजारों रुपये व्यय करके बड़ी सावधानी के साथ भक्तों को अपने साथ लाते थे।
सबसे अधिक कठिनाई घाटों पर उतरने की थी। एक एक, दो-दो रुपये उतराई लेने पर भी घाट वाले यात्रियों को ठीक समय पर नहीं उतारते थे। यद्यपि महाप्रभु के देशव्यापी प्रभाव के कारण गौर भक्तों को इतनी अधिक असुविधा नहीं होती थी, फिर भी कोई कोई खोटी बुद्धि वाला घटवारिया इनसे कुछ न कुछ अड़ंगा लगा ही देता था। ये बड़े सरल थे, सम्पूर्ण भक्तों का भार इन्हीं के ऊपर था, इसलिये घटवारिया, पहले-पहल इन्हें ही पकड़ते थे।

एक बार नीलाचंल आते समय पुरी के पास ही किसी घटवारिया ने शिवानन्द सेनजी को रोक रखा। वे भक्तों के ठहरने और खाने पीने का कुछ भी प्रबन्ध न कर सक क्योंकि घटवारियों ने उन्हें वहीं बैठा लिया था। इससे नित्यानन्द जी को उनके ऊपर बड़ा क्रोध आया। एक तो वे दिन भर भूखे थे, दूसरे रास्ता चलकर आये थे, तीसरे भक्तों को निराश्रय भटकते देखने से उनका क्रोध उभड़ पड़ा।वे सेन महाशय को भली बुरी बातें सुनाने लगे, उसी क्रोध के आवेश में आकर उन्होंने यहाँ तक कह डाला कि- ‘इस शिवानन्द के तीनों पुत्र मर जाये, इसकी धन सम्पत्ति का नाश हो जाय, इसने हमारे तथा भक्तों के रहने और खाने पीने का कुछ भी प्रबन्ध नहीं किया।’

नित्यानन्द जी के क्रोध में दिये हुए ऐसे अभिशाप को सुनकर सेन महाशय की पत्नी को अत्यन्त ही दुःख हुआ, वे फूट फूट कर रोने लगीं। जब बहुत रात्रि बीतने पर घाटवालों से जैसे-तैसे पिण्ड छुड़ाकर शिवानन्द जी अपने बाल-बच्चों के समीप आये तब उनकी धर्मपत्नी ने रोते रोते कहा- 'गुसाईं ने क्रुद्ध होकर हमें ऐसा भयंकर शाप दे दिया है। हमने उनका ऐसा क्या बिगाड़ा था? अब भी वे क्रुद्ध हो रहे हैं, आप उनके पास न जायँ।’
शिवानन्द जी ने दृढ़ता के साथ पत्नी की बात की अवहेलना करते हुए कहा- ‘पगली कहीं की ! तू उन महापुरुष की महिमा क्या जाने? तेरे तीनों पुत्र चाहे अभी मर जायँ और धन सम्पत्ति की तो मुझे कुछ परवा नहीं। वह तो सब गुसाईं की ही है, वे चाहें तो आज ही सबको छीन लें। मैं अभी उनके पास जाऊँगा और उनके चरण पकड़कर उन्हें शान्त करूँगा।’ 
यह कहते हुए वे नित्यानन्द जी के समीप चले। उस समय भी नित्यानन्द जी का क्रोध शान्त नहीं हुआ था।वृद्ध शिवानन्द जी को अपनी ओर आते देखकर उनकी पीठ में उठकर जोरों से एक लात मारी। सेन महाशय ने कुछ भी नहीं कहा। उसी समय उनके ठहरने और खाने पीने की समुचित व्यवस्था करके हाथ जोड़े हुए कहने लगे- ‘प्रभो ! आज मेरा जन्म सफल हुआ, जिन चरणों की रज के लिये इन्द्रादि देवता  भी तरसते हैं वही चरण आपने मेरी पीठ से छुआये।मैं सचमुच कृतार्थ हो गया। गुसाईं ! अज्ञान के कारण मेरा जो अपराध हुआ हो, उसे क्षमा करें। मैं अपनी मूर्खतावश आपको क्रुद्ध करने का कारण बना- इस अपराध के लिये मैं लज्जित हूँ। प्रभो ! मुझे अपना सेवक समझ कर मेरे समस्त अपराधों को क्षमा करें और मुझ पर प्रसन्न हों।’

शिवानन्द जी की इतनी सहनयशीलता, ऐसी क्षमा और ऐसी एकान्तनिष्ठा को देखकर नित्यानन्द जी का हृदय भर आया। उन्होंने जल्दी से उठकर शिवानन्द जी को गले से लगाया और उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहने लगे-‘शिवानन्द ! तुम्हीं सचमुच प्रभु के परम कृपापात्र बनने योग्य हो।जिसमें इतनी अधिक क्षमा है वह प्रभु का अवश्य ही अन्तरंग भक्त बन सकता है।’ 
सचमुच नित्यानन्द जी का यह आशीर्वाद फलीभूत हुआ और प्रभु ने सेन महाशय के ऊपर अपार कृपा प्रदर्शित की। प्रभु ने अपने अच्छिष्ट महाप्रसाद को शिवानन्द जी के सम्पूर्ण परिवार के लिये भिजवाने की गोविन्द को स्वयं आशा दी।इनकी ऐसी ही तपस्या के परिणामस्वरूप तो कवि कर्णपूर-जैसे परम प्रतिभावान महाकवि और भक्त इनके यहाँ पुत्ररूप में उत्पन्न हुए।

नित्यानन्द जी का ऐसा बर्ताव शिवानन्द जी सेन के भगिनी-पुत्र श्री कान्त को बहुत ही अरुचिकर प्रतीत हुआ।वह युवक था, शरीर में युवावस्था का नूतन रक्त प्रवाहित हो रहा था, इस बात से उसने अपने मामा का घोर अपमान समझा और इसकी शिकायत करने के निमित्त वह सभी भक्तों से अलग होकर सबसे पहले प्रभु के समीप पहुँचा। बिना वस्त्र उतारे ही वह प्रभु को प्रणाम करने लगा।
इस पर गोविन्द ने कहा- श्री कान्त ! तुम यह शिष्टाचार के विरुद्ध बर्ताव क्यों कर रहे हो? अंगरखे को उतारकर तब साष्टांग प्रणाम किया जाता है। पहले वस्त्रों को उतार लो, रास्ते की थकान मिटा लो, हाथ-मुँह धो लो, तब प्रभु के सम्मुख प्रणाम करने जाना।’ 
किन्तु उसने गोविन्द की बात नहीं सुनी। प्रभु भी समझ गये अवश्य ही कुछ दाल में काला है, इसलिये उन्होंने गोविन्द से कह दिया- ‘श्री कान्त के लिये क्या शिष्टाचार और नियम, वह जो करता है ठीक ही है, इसे तुम मत रोका। इसी दशा में इसे बातें करने दो।’ 
क्रमशः

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