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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इतना कहकर प्रभु उससे भक्तों के सम्बन्ध में बहुत सी बातें पूछने लगे। पुराने भक्तों की बात पूछकर प्रभु ने नवीन भक्तों के सम्बन्ध में पूछा कि अबके बाल भक्तों में से कौन-कौन आया है? प्रभु के पीछे जो बच्चे उत्पन्न हुए थे, वे सभी अबके अपनी अपनी माताओं के साथ प्रभु के दर्शनों की उत्कण्ठा से आ रहे थे। श्रीकान्त ने सभी बच्चों का परिचय देते हुए शिवानन्द जी के पुत्र परमानन्द दास का परिचय दिया और उसकी प्रखर प्रतिभा तथा प्रभु दर्शनों की उत्कण्ठा की भी प्रशंसा की।
प्रभु उस बच्चे को देखने के लिये लालायित से प्रतीत होने लगे। इन सभी बातों में श्री कान्त नित्यानन्द जी की शिकायत करना भूल गये। इतने में ही सभी भक्त आ उपस्थित हुए। प्रभु ने सदा की भाँति सबका स्वागत-सत्कार किया और उन्हें रहने के लिये यथायोग्य स्थान दिलाकर सभी के प्रसाद की व्यवस्था करायी।
पुरीदास या कवि कर्णपूर…..
कविता एक भगवद्दत्त वस्तु है। जिसके हृदय में कमनीय कविता करने की कला विद्यमान है उसके लिये फिर राज्य सुख की क्या अपेक्षा। इन्द्रासन उसके लिये तुच्छ है। कविता गणित की तरह अभ्यास करने से नहीं आती, वह तो अलौकिक प्रतिभा है, किसी भाग्यवान पुरुष को ही पूर्वजन्मों के पुण्यों के फलस्वरूप प्राप्त हो सकती है। कवि क्या नहीं कर सकता? जिसे चाहे अमर बना सकता है। जिसे चाहे पाताल पहुँचा सकता है।
भोज, विक्रम जैसे अरबों-खरबों नहीं असंख्यों राजा हो गये, उनका कोई नाम क्यों नहीं जानता-इसलिये कि वे कालिदास जैसे कवि कुलचूडामणि महापुरुष के श्रद्धाभाजन नहीं बन सके। कवि ईश्वर है, अचतुर्भज विष्णु है, एक मुख वाला ब्रह्मा है और दो नेत्रों वाला शिव है। कवि वन्द्य है, पूज्य है, आदरणीय और सम्माननीय है।कवि के चारणों की वन्दना करन ईश्वर की वन्दना के समान है। कविता रूप से श्रीहरि ही उसके मुख से भाषण करते हैं, जिसे सुनकर सुकृति और भाग्यवान पुरुषों का मन मयूर पंख फैलाकर नृत्य करने लगता है और नृत्य करते-करते अश्रुविमोचन करता है। उन अश्रुओं को बुद्धिरूपी मयूरी पान करती है और उन्हीं अश्रुओं से आह्लादरूपी गर्भ को धारण करती है, जिससे आनन्दरूपी पुत्र की उत्पत्ति होती है। वे पिता धन्य हैं जिनके घर में प्रतिभाशाली कवि उत्पन्न होते हैं।
ऐसा सौभाग्य श्री शिवानन्द सेन जैसे सुकृति, साधुसेवी और भगवद्भक्त पुरुषों को ही प्राप्त हो सकता है, जिनके कवि कर्णपूर जैसे नैसर्गिक प्रतिभा सम्पन्न कवि पुत्र उत्पन्न हुए कविता का कोई निश्चय नहीं, वह कब परिस्फुट हो उठे। किसी किसी में तो जन्म से ही वह शक्ति विद्यमान रहती है, जहाँ वे बोलने लगते हैं वहीं उनकी प्रतिभा फूटने लगती है। कवि कर्णपूर ऐसे ही स्वाभाविक कवि थे।
महाप्रभु जब संन्यास ग्रहण करके पुरी में विराजमान थे, तब बहुत से भक्तों की स्त्रियाँ भी अपने पतियों के साथ प्रभु दर्शनों की लालसा से पुरी जाया करती थीं। एक बार जब शिवानन्द सेन जी अपनी पत्नी के साथ भक्तों को लेकर पुरी पधारे तब श्रीमती सेन गर्भवती थीं। प्रभु ने आज्ञा दी कि अबके जो पुत्र हो, उसका नाम पुरी गोस्वामी के नाम पर रखना।प्रभु भक्त सेन महाशय ने ऐसा ही किया, जब उनके पुत्र हुआ तो उसका नाम रखा परमानन्ददास। परमानन्ददास जब बड़े हुए तब वे प्रभु दर्शनों के लिये अपनी उत्कण्ठा प्रकट करने लगे।इनकी प्रभु परायण माता ने बाल्यकाल से ही इन्हें गौर चरित्र रटा दिये थे और सभी गौर भक्तों के नाम कण्ठस्थ करा दिये थे।इनके पिता प्रतिवर्ष हजारों रुपये अपने पास से खर्च करके भक्तों को पुरी ले जाया करते थे और मार्ग में उनकी सभी प्रकार की व्यवस्था स्वयं करते थे। इनका घर भर श्रीचैतन्य चरणों का सेवक था। इनके तीन पुत्र थे-बड़े चैतन्यदास, मँझले रामदास और सबसे छोटे ये परमानन्ददास, पुरीदास या कर्णपूर थे।
परमानन्ददास बालक पन से ही होनहार, मेधावी प्रत्युत्पन्नमति और सरस हृदय के थे। इनके बहुत आग्रह पर वे इन्हें इनकी माता के सहित प्रभु के पास ले गये। वैसे तो प्रभु ने इन्हें देख लिया था, किन्तु सेन इन्हें एकान्त में प्रभु के पैरों में डालना चाहते थे।
एक दिन जब महाप्रभु स्वरूप गोस्वामी आदि दो-चार अन्तरंग भक्तों के सहित एकान्त में बैठे श्रीकृष्ण कथा कह रहे थे तभी सेन महाशय अपने पुत्र परमानन्द पुरी को प्रभु के पास लेकर पहुँच गये। सेन ने इन्हें प्रभु के पैरों में लिटा दिया, ये प्रभु के पैरों में लेटे ही लेटे उनके अँगूठे को चूसने लगे, मानो वे प्रभुपादपद्मों की मधुरिमा को पी रहे हों। प्रभु इन्हें देखकर अत्यन्त ही प्रसन्न हुए। उन्होंने पूछा- ‘इसका नाम क्या रखा है?’
धीरे से महाशय ने कहा-‘परमानन्ददास’
प्रभु ने कहा- ‘यह तो बड़ा लम्बा नाम हो गया, किसी से लिया भी कठिनता में जायेगा। इसलिये पुरीदास ठीक है।’ यह कहकर वे बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए प्रेम से कहने लगे- ‘क्यों रे पुरीदास ! ठीक है न तेरा नाम? तू पुरीदास ही है न?’
बस, उस दिन से ये परमानन्ददास की जगह पुरीदास हो गये।
एक बार सेन इन्हें फिर लेकर प्रभु के दर्शनों का आये। तब प्रभु ने इन्हें पुचकारकर कहा- ‘बेटा पूरीदास ! अच्छा, कृष्ण-कृष्ण कहो।’
किन्तु पुरीदास ने कुछ नहीं कहा। तब तो प्रभु बहुत आश्चर्य में रह गये। पिता भी कह कहकर हार गये।प्रभु ने भी पुचकारकर, पुचकारकर कई बार कहा, किन्तु इन्होंने कृष्ण-कृष्ण ही न कहा। तब तो पिता को इस बात से बड़ा दुःख हुआ कि हमारा यह पुत्र अभक्त होगा क्या, अभक्त पुत्र से तो बिना पुत्र के ही रहना अच्छा। प्रभु भी आश्चर्य करने लगे कि हमने जगत से श्रीकृष्ण नाम लिवाया, इस छोटे से बालक से श्रीकृष्ण नहीं कहला सके। इस पर स्वरूप गोस्वामी ने कहा- ‘यह बालक बड़ा ही बुद्धिमान है।इसने समझा है कि प्रभु ने हमें मन्त्र प्रदान किया है। इसलिये अपने इष्ट मन्त्र को मन ही मन जप रहा है। मन्त्र किसी के सामने प्रकट थोड़े ही किया जाता है।’ इस बात से सभी को सन्तोष हुआ।
एक दिन जब इसकी अवस्था केवल सात वर्ष की थी तब सेन महाशय इन्हें प्रभु के समीप ले गये। प्रभु ने पूछा- ‘कुछ पढ़ता भी है यह?’
सेन ने धीरे से कहा- ‘अभी क्या पढ़ने लायक है, ऐसे ही थोड़ा-बहुत खेल करता रहता है।’
क्रमशः
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