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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु ने कहा- ‘पुरीदास ! अच्छा बेटा ! कुछ सुनाओ तो सही।’
इतना सुनते ही सात वर्ष का बालक स्वयं ही इस स्वरचित श्लोक को बोलने लगा-
श्रवसोः कुवलयमक्ष्णारंजनमुरसो महेन्द्रमणिदाम।
वृन्दावनरमणीनां मण्डलनमखिलं हरिर्जयति।
जो वृन्दावन की रमणियों के कानों के नील कमल, आखों के अंजन, कक्षःस्थल की इन्द्रनीलमणि एवं समस्त आभरणरूप हैं उन भगवान हरि की जय हो।
सात वर्ष के बालक के मुख से ऐसा भावपूर्ण श्लोक सुनकर सभी उपस्थित भक्तों को परमाश्चर्य हुआ। इसे सभी ने प्रभु की पूर्ण कृपा का फल ही समझा। तब प्रभु ने कहा- ‘तैंने सबसे पहले अपने श्लोक में व्रजांगनाओं के कानों के आभूषण का वर्णन किया है, अतः तू कवि होगा और ‘कर्णपूर’ के नाम से तेरी ख्याति होगी।’ तभी से ये ‘कवि कर्णपूर’ हुए।ये महाप्रभु के भावों को भलीभाँति समझते थे। सच्चे सुकवि से भला किसके मनोभाव छिपे रह सकते हैं? ये सुकवि थे। इन्होंने अपनी अधिकांश कविता श्री चैतन्य देव के ही सम्बन्ध में की हैं। इनके बनाये हुए आनन्द-वृन्दावन (चम्पू), अलंकारकौस्तुभ (अलंकार), श्री चैतन्य-चरित (काव्य), श्री चैतन्य चन्द्रोदय (नाटक) और ‘गौरगनोद्देशदीपिका’ प्रभृति ग्रन्थ मिलते हैं। इनका चैतन्य चरित महाकाव्य बड़ा ही सुन्दर है।चैतन्य चन्द्रोदय नाटक की भी खूब ख्याति है। ‘गौरगनोद्देश दीपिका’ में इन्होंने श्रीकृष्ण की लीला और श्री चैतन्य की लीलाओं को समान मानते हुए यह बताया है कि गौर भक्तों में से कौन कौन भक्त श्रीकृष्ण लीला की किस किस सखी के अवतार थे। इनमें रूप, सनातन, रघुदास आदि सभी गौर भक्तों को भिन्न-भिन्न सखियों का अवतार बताया गया है।
बड़ी विशाल कल्पना है, कवि प्रतिभा ही जो ठहरी, जिस ओर लग गयी उसी ओर कमाल करके दिखा दिया। अपने पिता के सम्बन्ध में ये लिखते हैं-
पुरा वृन्दावने वीरा दूतो सर्वाश्च गोपिकाः।
निनाय कृष्णनिकटं सेदानीं जन को मम।
अर्थात ‘पहले श्रीकृष्णलीला में वीरा नाम की दूती जो सभी गोपिकाओं को श्रीकृष्ण के पास ले जाया करती थी। उसी वीरा दूती के अवतार मेरे पिता (श्री शिवानन्द सेन) हैं।'
इसी प्रकार सभी के सम्बन्ध की इन्होंने बड़ी सुन्दर कल्पनाएँ की हैं। धन्य हैं ऐसे कवि को और धन्य है उनके कमनीय काव्यामृत को, जिसका मान करके आज भी गौर-भक्त उसी चैतन्यरूपी आनन्द सागर में किलोलें करते हुए परमानन्दसुख का अनुभव करते हैं। अक्षरों को जोड़ने वाले कवि तो बहुत हैं, किन्तु सत्कवि वही है, जिसकी सभी लोग प्रशंसा करें। सभी जिसके काव्यामृत को पान करके लटटू हो जायँ। एक कवि ने कवि के सम्बन्ध में एक बड़ी ही सुन्दर बात कही है-
सत्यं सन्ति गृहे गृहेऽपि कवयो येषा वचश्चातुरी
स्वे हर्म्ये कुलकन्यकेव लभते स्वल्पैर्गुणैगौंरवम्।
दुष्प्रापः स तु कोपऽति कोविन्मतिर्यद्वाग्रसग्राहिणां
पण्यस्त्रीव कलाकलापकुशला चेतांसि हर्तु क्षमा।
वैसे तो बोलने चालने और बातें बनाने में जो औरों की अपेक्षा कुछ व्युत्पन्नमति के होते हैं ऐसे कवि कहलाने वाले महानुभाव घर घर मौजूद हैं। अपने परिवार में जो लड़की थोड़ी सुन्दरी और गुणवती होती है, उसी की कुल वाले बहुत प्रशंसा करने लगते हैं। क्योंकि उसके लिये उतना बड़ा परिवार ही संसार है। ऐसे अपने ही घर में कवि कहलाने वाले सज्जनों की गणना सुकवियों में थोड़े ही हो सकती है।
सच्चा सुकवि तो वही है जिसकी कमनीय कविता अज्ञात कुल गोत्र वाले कलाकोविदों के मन को भी हठात अपनी ओर आकर्षित कर ले। उनकी वाणी सुनते ही उनके मुखों से वाह वाह निकल पड़े। जैसे कला कलाप में कुशल वारांगना के कुल गोत्र को न जानने वाले पुरुष भी उसके गायन और कला से मुग्ध होकर ही स्वयं उसकी ओर खिंच से जाते हैं।’ ऐसे सुकवियों के चरणों में हमारा कोटि-कोटि प्रणाम है।
महाप्रभु की अलौकिक क्षमा…
महापुरुषों के पास भिन्न भिन्न प्रकृति के भक्त होते हैं। बहुत से तो ऐसे होते हैं, जो उनके गुण अवगुण को समझते ही नहीं, उनके लिये वे जो भी कुछ करते हैं सब अच्छा ही करते हैं। महापुरुषों के कार्यों में उन्हें अनौचित्य दीखता ही नहीं। बहुत से ऐसे होते हैं, जो गुण दोषो का विवेचन तो कर लेते हैं, किन्तु महापुरुषों के दोषों के ऊपर ध्यान नहीं देते। वे अवगुणो की उपेक्षा करके गुणों को ही ग्रहण करते हैं। कुछ ऐसे होते हैं, हृदय से उनके गुणों के प्रति तो श्रद्धा के भाव रखते हैं, किन्तु जहाँ उन्हें कोई मर्यादा के विरुद्ध कार्य करते देखते हैं वहाँ उनकी आलोचना भी करते हैं और उन्हें उस दोष से पृथक रखने के लिये प्रयत्नशील भी होते हैं।कुछ ऐसे भी भक्त या कुभक्त होते हैं जो महापुरुषों के प्रभाव को देखकर मन ही मन डाह करते हैं और उनके कामों में सदा छिद्रान्वेषण ही करते रहते हैं। उपर्युक्त तीन प्रकार के भक्त तो महापुरुषों से यथाशक्ति लाभ उठाते हैं, किन्तु ये चौथे निन्दक महाशय अपना नाश करके महापुरुष का कल्याण करते हैं।अपनी नीचता के द्वारा महापुरुषों की सदवृत्तियों को उभाड़कर उन्हें लोगों के सम्मुख रखते हैं। उनके बराबर परोपकारी संसार में कौन हो सकता है, जो अपना सर्वस्व नाश करके लोक कल्याण के निमित्त महापुरुषों के द्वारा क्षमा और सहनशीलता का आदर्श उपस्थित कराते हैं।
महाप्रभु के दरबार में पहले और दूसरे प्रकार के भक्तो की संख्या ही अधिक थी। प्रायः उनके सभी भक्त उन्हें ‘सचल जगन्नाथ’ ‘संन्यास वेषधारी पुरुषोत्तम’ मानकर भगवदबुद्धि से उनकी सेवा पूजा किया करते थे, किन्तु आलोचक और निन्दकों का एकदम अभाव ही हो, सो बात नहीं थी। उनके बहुत से आलोचक भी थे, किन्तु प्रभु उनकी बातें ही नहीं सुनते थे।कोई भूल में आकर उनसे कह भी देता, तो वे उसे उस बात के सुनाने से एकदम रोक देते थे। यह तो बाहर के लोगों की बात रही, उनके अंतरंग भक्तों तथा साथियों में भी ऐसे थे, जो खरी कहने के लिये प्रभु के सामने भी नहीं चूकते थे, किंतु उनका भाव शुद्ध था। एक त्यागाभिमानी रामचन्द्रपुरी नाम के उनके घोर निन्दक संन्यासी भी थे, किन्तु प्रभु की अलौकिक क्षमा के सामने उन्हें अन्त में पुरी को ही छोड़कर जाना पड़ा।
पहले दामोदर पण्डित की आलोचना की एक घटना सुनिये।महाप्रभु श्री मन्दिर के समीप ही रहते थे। वहीं कहीं पास में ही एक उड़िया ब्राह्मणी का घर था। वह ब्राह्मणी विधवा थी, उसका एक तेरह-चौदह वर्ष का लड़का प्रभु के पास आया करता था। उस लड़के का सौन्दर्य अपूर्व ही था।
क्रमशः
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