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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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उसके शरीर का रंग तप्त कांचन के समान बड़ा ही सुन्दर था, अंग प्रत्यंग सभी सुडौल-सुन्दर थे। शरीर में स्वाभाविक बालचापल्य था।अपनी दोनों बड़ी बड़ी सुहावनी आँखें से वह जिस पुरुष की भी ओर देख लेता वही उसे प्यार करने लगता। वह प्रभु को प्रणाम करने के लिये नित्य प्रति आता। प्रभु उससे अत्यधिक स्नेह करने लगे। उसे पास में बिठाकर उससें प्रेम की मीठी मीठी बातें पूछते, कभी कभी उसे प्रसाद भी दे देते।बच्चों का हृदय तो बड़ा ही सरल और सरस होता है, उनसे जो भी प्रेम से बोले वे उसी के हो जाते हैं। प्रभु के प्रेम के कारण उस बच्चे का ऐसा हाल हो गया कि उसे प्रभु के दर्शनों के बिना चैन ही नहीं पड़ता था। दिन में दो दो, तीन तीन बार वह प्रभु के पास आने लगा। 
दामोदर पण्डित प्रभु के पास ही रहते थे।उन्हें उस अद्वितीय रूप लावण्ययुक्त अल्पवयस्क बच्चे का प्रभु के पास इस प्रकार से आना बहुत ही बुरा लगने लगा। वे एकान्त में बच्चे को डाँट भी देते और उसे यहाँ आने का निषेध भी कर देते, किन्तु हृदय का सच्चा प्रेम किसकी परवा करता है। अत्यन्त प्रेम मनुष्यों को ढीठ बना देता है।पण्डित के मना करने पर भी वह लड़का बिना किसी की बात सुने निर्भय होकर प्रभु के पास चला जाता और घंटों उनके पास बैठा रहता। प्रभु बाल भाव में उससे भाँति-भाँति की बातें किया करते। 
मनुष्य के स्वभाव में एक प्रकार की क्रूरता होती है।जब हम किसी पर अपना पूर्ण अधिकार समझने वाला कोई दूसरा पुरुष भी हो जाता है तो हम मन ही मन उससे डाह करने लगते हैं, फिर चाहे वह कितना भी सर्वगुणसम्पन्न क्यों न हो, हमें वह राक्षस सा प्रतीत होता है।

दामोदर पण्डित का भी यही हाल था। उन्हें उस विधवा के सुन्दर पुत्र की सूरत से घृणा थी, उसके नाम से चिढ़ थी, उसे देखते ही वे जल उठते। एक दिन उन्होंने उस लड़के को प्रभु के पास बैठा देखा। प्रभु उससे हँस-हँस कर बातें कर रहे थे।
उस समय तो उन्होंने प्रभु से कुछ नहीं कहा। जब वह लड़का उठकर चला गया तो उन्होंने कुछ प्रेम पूर्वक रोष के स्वर में कहा- ‘प्रभो ! आप दूसरों को ही उपदेश देने के लिये हैं, अपने लिये नहीं सोचते कि हमारे आचरण को देखकर कोई क्या समझेगा?
प्रभु ने सम्भ्रम के साथ कहा- ‘क्यों, क्यों, पण्डित जी ! मैंने ऐसा कौन सा पापकर्म कर डाला?’ 
उसी प्रकार रोष के साथ दामोदर पण्डित ने कहा- ‘मुझे इस लड़के का आपके पास इस प्रकार निस्संकोच भाव से आना अच्छा प्रतीत नहीं होता।आपको पता नहीं, लोग क्या मन में सोचेंगे? संसारी लोग विचित्र होते हैं, अभी तो सब गुसाईं-गुसाईं कहते हैं। आपके इस आचरण से सभी आपकी निन्दा करने लगेंगे और तब सब ईश्वरपना भूल जायँगे।’
प्रभु ने सरलता पूर्वक कहा- ‘दामोदर ! इस लड़के में तो मुझे कोई भी दोष नहीं दीखता; बड़ा सरल, भोला-भाला और गौ के बछड़े के समान सीधा है।’
दामोदर पण्डित ने कहा- ‘आपको पता नहीं यह विधवा का पुत्र है, इसकी माता अभी युवती है, वैसे वह बड़ी तपस्विनी, सदाचारिणी तथा भगवत्परायणा है, फिर भी उसमें तीन दोष हैं। वह युवती है, अत्यधिक सुन्दरी है और विधवा है तथा अपने घर में अकेली ही है, आप अभी युवक हैं, अद्वितीय रूप लावण्ययुक्त हैं।
हम तो आपके मनोभावों को समझते हैं, किन्तु लोक किसी को नहीं छोड़ता। वह जरा सा छिद्र पाते ही निन्दा करने लगता है। लोगों के मुखों को हम थोड़े पकड़ लेंगे। इतने दिन की जमी हुई प्रतिष्ठा सभी धूल में मिल जायगी।’

दामोदर पण्डित की बातों से प्रभु को हृदय में सन्तोष हुआ कि इन्हें मेंरी पवित्रता का इतना अधिक ध्यान रहता है, किन्तु उनके भोलेपन पर उन्हें हँसी भी आयी। उस समय तो उन्होंने उनसे कुछ भी नहीं कहा।दूसरे दिन एकान्त मे बुलाकर कहने लगे- ‘दामोदर पण्डित ! मैं समझता हूँ, तुम्हारा नवद्वीप में ही रहना ठीक होगा, वहाँ तुम्हारे भय से भक्तवृन्द मर्यादा के विरुद्ध आचरण न कर सकेंगे और तुम माता जी की भी देख-रेख करते रहोगे।वहीं जाकर माता के समीप रहो और बीच में मुझे देखने के लिये यहाँ आ जाया करना। माता जी के चरणों में मेरा प्रणाम कहना और उन्हें समझा देना कि मैं सदा उनके बनाये हुए व्यंजनों को खाने के लिये नवद्वीप में आता हूँ और प्रत्यक्षरीति से भगवान के भोग लगाये हुए नैवेद्य को पाता हूँ।’

इतना कहकर और जगन्नाथ जी का प्रसाद देकर उन्हें नवद्वीप को विदा किया। वे नवद्वीप में आकर शचीमाता के समीप रहने लगे, उनके भय से नवद्वीप के भक्त कोई भी मर्यादा के विरुद्ध कार्य नहीं करते थे। इनकी आलोचना बड़ी ही खरी तथा तीव्र होती थी।

निन्दक के प्रति भी सम्मान के भाव…

महात्मा दादू दयाल जी ने निन्दा करने वाले को अपना पीर-गुरु बताकर उसकी खूब स्तुति की। जिन पाठशालाओ में परीक्षक होते हैं और वे सदा परीक्षा ही लेते रहते हैं, उसी प्रकार इन निन्दकों को भी समझना चाहिये। परीक्षक उन्हीं छात्रों की परीक्षा करते हैं, जो विद्वान बनने की इच्छा से पाठशाला में निमित्त प्रवेश करते हैं। जो बालक पढ़ता ही नहीं, जो जानवरों की तरह पैदा होते ही खाने-पीने की चिन्ता में लग जाता है उसकी परीक्षक परीक्षा ही क्या करेगा?
वह तो निरक्षरता की परीक्षा में पहले ही उत्तीर्ण हो चुका है। इसी प्रकार निन्दक लोग उसी की निन्दा करते हैं तो इहलौकिक तथा पारलौकिक उन्नति करना चाहते हैं, जो श्रेष्ठ बनने की इच्छा से उन्नति की पाठशाला में प्रवेश करते हैं। जिसके जीवन में कोई विशेषता ही नहीं, जो आहार, निद्रा, भय और मैथुनादि धर्मों में अन्य प्राणियों के समान व्यवहार करता है उसकी निन्दा स्तुति दोनों समान हैं।इहलौकिक उन्नति में निन्दा चाहे कुछ विघ्न भी कर सके, किन्तु पारलौकिक उन्नति में तो निन्दा सहायता ही करती हैं। निन्दा के दो भेद हैं- एक तो अपवाद, दूसरा प्रवाद। बुरे काम करने पर जो निन्दा होती है उसे अपवाद कहते हैं। उससे बचने की सभी को जी जान से कोशिश करनी चाहिये।
क्रमशः

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