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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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कोई निन्दित कर्म किया तो है नहीं और वैसे ही लोग डाह से, द्वेष से या भ्रम से निन्दा करने लगे हैं उसे प्रवाद कहते हैं।उन्नति के पथ की ओर अग्रसर होने वाले व्यक्ति को प्रवाद की परवा न करनी चाहिये। प्रवाद ही उन्नति के कण्टकाकीर्ण शिखर पर चढ़ाने के लिये सहारे की लाठी का काम देता है। जो लोकरंजन के लिये प्रवाद की परवा करके उसकी असथार्थता लोगों पर प्रकट करते हैं वे तो ईश्वर हैं।ईश्वरों के तो वचनों को ही सत्य मानना चाहिये, उनके आचरणों की सर्वत्र नकल न करनी चाहिये। धोबी के प्रवाद पर निष्कलंक और पतिपरायणा सती-साध्वी जगन्माता सीता जी को श्री रामचन्द्र जी ने त्याग दिया। लोगों के दोष लगाने पर भगवान स्यमन्तकमणि को ढूँढते-ढूँढते परेशान हो गये।ये कार्य उन्हीं अवतारी पुरुषों को शोभा देते हैं हम साधारण कोटि के जीव यदि इस प्रकार के प्रवादों की परवा करें तब तो हम लोगों को पैर रखने की जगह भी न मिलेगी, क्योंकि जगत प्रवाद प्रिय है, इसे दूसरों की झूठी निन्दा करने में मजा मिलता है। 

ऐसे ही एक निन्दक महाशय स्वामी रामचन्द्रपुरी प्रभु के समीप कुछ काल रहे थे।भगवान माधवेन्द्रपुरी श्रीशंकराचार्य के दस नामी संन्यासियों में होने पर भी भक्तिभाव के उपासक थे। वे व्रजविहारी को ही सविशेष, निर्विशेष, साकार-निराकार तथा देशकाल और कार्यकारण से पृथक सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म समझते थे। वे निर्विशेष ब्रह्म की निन्दा करते थे। उनका कथन था- ‘भाई ! जिन्हें निर्गुण निर्विशेष ब्रह्म के ध्यान में आनन्द आता हो, वे भले ही ध्यान और अभ्यास के द्वारा उस निराकार ब्रह्म का ध्यान करें, किन्तु हमारा मन तो उस यमुना के पुलिनों पर गौओं के पीछे दौड़ने वाले किसी श्यामरंग के छोकरे ने हर लिया है। हमारी आँखों में तो वही गड़ गया है। उसके सिवा हमें दूसरा रूप भाता ही नहीं, विश्व हमें नीला ही नीला दीखता है।
ये रामचन्द्रपुरी जी भी उन्हीं भगवान माधवेन्द्रपुरी के शिष्य थे। उनके शिष्यों में परमानन्दपुरी, रंगपुरी, रामचन्द्रपुरी और ईश्वरपुरी आदि के नाम मिलते हैं। इन सबमें शिवपुरी ही अपने गुरु में अत्यधिक श्रद्धा रखते थे और उनकी छोटी-से-छोटी सेवा अपने ही हाथों से करते थे, इसीलिये इन पर गुरु महाराज का प्रसाद सबसे अधिक हुआ और उसी के फलस्वरूप इन्हें गौरांग महाप्रभु के मंत्र दीक्षा गुरु होने का लोकविख्यात पद प्राप्त हो सका। ये रामचन्द्रपुरी महाशय पहले से ही सूखी तबीयत के और गुरु निन्दक थे।जब भगवान माधवेन्द्रपुरी का अन्तिम समय आया और वे इस नश्वर शरीर को परित्याग करके गोलोक को गमन करने लगे तब श्रीकृष्ण विरह में छटपटाते हुए रुदन करने लगे। रोते-रोते वे विकलता के साथ साँस भर भर कर वेदना के स्वर में कहते- ‘हा नाथ ! तुम्हें कब देख सकूँगा, मथुरा में जाकर आपके दर्शन न कर सका।हे मेरे मनमोहन ! इस अधम को भी उबारो, मैं आपके विरहजन्य दुःख से जला जा रहा हूँ !’ 
उनकी इस पीड़ा को, विकलता को, कातरता और अधीरता को कोई सच्चा भगवत रसिक ही समझ सकता था।शुष्क तबीयत के; अखण्ड प्रकृति से, ज्ञानाभ्यासी रामचन्द्रपुरी इस व्यथा का मर्म क्या जानें। उन्होंने वे ही सुनी हुई ज्ञान की बातें छाँटनी शुरू कर दीं। उन शिक्षकमानी महात्मा को यह भी ध्यान नहीं रहा कि जिन महापुरुष से हमने दीक्षा ली है वे भी इन बातों को जानते होंगे।
वे गुरु जी को उपदेश करने लगे- ‘महाराज ! आप ये कैसी मोह की सी भूली-भूली बातें कर रहे हैं, यह हृदय ही मथुरा है, आप ही ब्रह्म हैं, जगत त्रिकाल में भी नहीं हुआ। आप इस शोक को दूर कीजिये और अपने को ही ब्रह्म अनुभव कीजिये।’
धीरे से क्षीण स्वर में महाराज ने अपने प्रिय शिष्य ईश्वरपुरी महाराज को बुलाया और उन्हें आज्ञा दी कि रामचन्द्र को मेरे सामने से हटा दो। रामचन्द्रपुरी गुरु की असन्तुष्टता को लिये हुए ही बाहर हुए।भगवान माधवेन्द्रपुरी ने श्रीकृष्ण-श्रीकृष्ण कहते हुए और अन्तिम समय में इस श्लोक का उच्चारण करते हुए इस पांच भौतिक नश्वर शरीर को त्याग दिया-

अयि दीनदयार्द्र नाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्य से।
हृदयं त्वदलोककातरं दयित! भ्राम्यति किं करोम्यहम्।

हे दीनों के ऊपर दया करने वाले प्रभो! हे दयालो! हे मथुरानाथ। तुम्हारे मनोहर मुखकमल को कब देख सकूँगा? यह हदय तुम्हें न देखने के कारण कातर होकर तुम्हारे लिये छटपटा रहा है, चारो ओर घूम रहा है, प्राणवल्लभ! अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ?

पुरी महाराज के निधन के अनन्तर ईश्वरपुरी महाराज तो गौड़-देश की ओर चले गये और रामचन्द्रपुरी तीर्थों में भ्रमण करते रहे। भ्रमण करते-करते ये प्रभु की कीर्ति और प्रशंसा सुनकर पुरी में आये। आकर उन्होंने अपने ज्युष्ठ गुरुभ्राता परमानन्द जी पुरी के चरणों में प्रणाम किया और फिर प्रभु से मिलने के लिये गये।प्रभु इनका परिचय पाकर उठकर खड़े हो गये और इनके चरणों में गुरुभाव से श्रद्धा के साथ प्रणाम किया और भी प्रभु के साथी बहुत से विरक्त भक्त वहाँ आ गये, सभी ने गुरुभाव से पुरी को प्रण्धाम किया और बहुत देर तक भगवत्सम्बन्धी बातें होती रहीं।प्रभु के पास आये हुए अतिथियों का भार इन्हीं सब विरक्त वैष्णवों पर था। वे लोग भिक्षा करके लाते थे और उसी से आगत अतिथियों का स्वागत सत्कार करते रहे। महाप्रभु की भिक्षा का कोई नियम नहीं था, जो भी भक्त निमन्त्रण करके प्रसाद दे जाय उसे ही प्रभु पा लेते थे। सार्वभौम भट्टाचार्य आदि गृहस्थी भक्त प्रभु को अपने घर पर भी बुलाकर भिक्षा कराते थे और विरक्त भक्त भी बारी बारी से प्रभु को भिक्षा करा दिया करते थे। सामान्यतया प्रभु की भिक्षा में चार आने का खर्च था।चार आने के प्रसाद में प्रभु की भिक्षा का काम चल जाता और सब तो इधर उधर से भिक्षा कर लाते थे। केवल श्री ईश्वापुरी के शिष्य काशीश्वर और सेवक गोविन्द ये दो प्रभु के ही समीप भिक्षा पाते थे। इन चार आनों के प्रसाद में तीनों का ही काम चल जाता था।इसके अतिरिक्त प्रेम के कारण कोई और भी अधिक मिष्टान्न आदि पदार्थ ले आवे तो प्रभु उसकी भी अवहेलना नहीं करते थे। प्रसाद में उनकी भेद बुद्धि नहीं थी।भक्त प्रेमपूर्वक प्रभु का आग्रह कर करके खूब खिलाते थे और प्रभु भी उनके आग्रह को मानकर इच्छा न होने पर भी थोड़ा खा लेते थे।
क्रमशः

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