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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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उस दिन नवागत रामचन्द्रपुरी का निमन्त्रण जगदानन्द जी ने किया। मन्दिर से प्रसाद लाकर उन्होंने प्रेमपूर्वक उन्हें भिक्षा करायी। वे तो प्रेमी थे, प्रभु को जिस प्रकार प्रेम पूर्वक आग्रह के साथ भिक्षा कराते थे, उसी प्रकार आग्रह कर करके उन्हें भी खूब खिलाया।वे महाशय आग्रह कर कर सके खिला तो बहुत गये किन्तु जाते ही उन्होंने जगदानन्द पण्डित की निन्दा करनी आरम्भ कर दी। कहने लगे- ‘सचमुच हमने जो सुना था कि श्रीकृष्ण चैतन्य के सभी भक्त पेटू हैं, यह बात ठीक ही निकली। भला, साधु होकर जो इतना अन्न खायेगा, वह भजन पूजन कैसे कर सकेगा?’
इस प्रकार की बहुत सी बातें वे लोगों से कहते। स्वयं त्याग के अभिमान के कारण भिक्षा करके खाते। जहाँ तहाँ एकान्त स्थानों और पेड़ों के नीचे पड़े रहते और महाप्रभु के आचरण की लोगों में खूब निन्दा करते। वे अपने स्वभाव से विवश थे, प्रभु का इतना भारी प्रभाव उन्हें अखरता था।उनमें ही क्या विशेषता है कि लोग उन्हीं की पूजा करते हैं। वे संन्यासी होकर भी गृहस्थियों के घर में रहते हैं। हम विरक्तों की भाँति एकान्त स्थानों में निवास काते हैं। वे रोज बढ़िया बढ़िया पदार्थ संन्यासी धर्म के विरुद्ध अनेकों बार खाते हैं। हम यतिधर्म का पालन करते हुए रूखी सूखी भिक्षा पर ही निर्वाह करते हैं। वे सदा लोगों से घिरे रहते हैं।हम लोगों से एकदम पृथक रहते हैं। फिर भी मूर्ख लोग हमारा सत्कार न करके डनहीं का सबसे अधिक सत्कार करते हैं। मालूम होता है लोग यतिधर्म से अनभिज्ञ हैं, हम उन्हें समझाकर उनके भ्रम को दूर कर देंगे। यह सोचकर वे प्रभु के आचरणों की निन्दा करने लगे और यतिधर्म के व्याज से अपनी प्रशंसा करने लगे।
भक्तों ने जाकर यह बात प्रभु से कही। प्रभु तो किसी के सम्बन्ध का निन्दा वाक्य सुनना ही नहीं चाहते थे, इसीलिये उन्होंने इस बात की एकदम उपेक्षा ही कर दी। रामचन्द्र जी अपने स्वभावानुसार प्रभु की तथा उनके भक्तों की सदा कड़ी आलोचना करते रहते थे।
एक दिन वे प्रातःकाल प्रभु के पास पहुँचे। उस समय प्रभु समुद्रस्नान करके बैठे हुए भगवन्नामों का जप कर रहे थे। एक ओर सुन्दर कमण्डलु रखा था, दूसरी ओर श्रीमद्भागवत की पुस्तक रखी थी। रात्रि की प्रसादी मालाएँ भी वहाँ टँग रही थीं। पुरी को देखते ही प्रभु ने उन्हें उठकर सादर प्रणाम किया और बैठने के लिये आसन दिया।जिस प्रकार मीठा और विष्ठा पास पास रहने पर मक्खी की दृष्टि विष्ठा पर ही जाती है और वह मीठे को छोडकर विष्ठा पर ही बैठती है उसी प्रकार छिद्रान्वेषण स्वभाव वाले रामचन्द्रपुरी की दृष्टि सामने दीवार पर चढ़ती हुई चींटियों के ऊपर पड़ी।दीवाल पर चींटियों का चढ़ना कोई नयी बात नहीं थी, किन्तु वे तो छिद्रान्वेषण के ही निमित्त आये थे। इसलिये बोले-‘क्यों जी ! हम समझते हैं, तुम मीठा बहुत खाते हो, तभी तो तुम्हारे यहाँ इतनी चींटी हैं।’
प्रभु इसे अस्वीकार न कर सके। उन्होंने सरलता के साथ कहा- ‘भगवन ! भगवान के प्रसाद में मैं मीठे खट्टे का विचार नहीं करता।’
पुरी ने अपना गुरुत्व जताते हुए कहा- ‘यह बात ठीक नहीं है, ऐसा आचरण यतिधर्म के विरुद्ध है। संन्यासी को स्वादिष्ट पदार्थ तो कभी खाने ही न चाहिये। भिक्षा में जो भी कुछ रूखा सूखा मिल गया उसी से उदरपूर्ती कर लेनी चाहिये।साधु को स्वाद से क्या प्रयोजन? तुम्हारे सभी भक्त खूब खाते हैं और तान दुपट्टा सोते हैं, भला इतना अधिक खाने पर भजन कैसे हो सकता है ! सुना है, तुम भी बहुत खाते हो।’
प्रभु ने अत्यन्त ही दीनता के साथ कहा-‘अब आप जैसा उपदेश करेंगे, वैसा ही करूँगा।’
पुरी ने कुछ गर्व के स्वर में कहा- हम क्या उपदेश करेंगे तुम स्वयं समझदार हो।संन्यासी होकर संन्यासियों का सा आचरण करो, इस दुकानदारी को छोड़ो। लोगों का मनोरंजन करने से क्या लाभ? संन्यासी का जीवन तो घोर तितिक्षामय होना चाहिये।’
यह सुनकर प्रभु चुप हो गये और रामचन्द्रपुरी उठकर चले गये। तब प्रभु ने गोविन्द को बुलाकर कहा- ‘गोविन्द ! आज से मेरे लिये एक ‘चोठि’ भात और पाँच पीठा के व्यंजन, बस यही भिक्षा में लिया करना। इससे अधिक मेरे लिये किसी से भिक्षा ली तो मैं बहुत असन्तुष्ट होऊँगा।’
जगन्नाथ जी का प्रसाद सदा मिट्टी की हाँडियों में बनता है। एक हाँडी के चौथाई भाग को ‘एक चोठि’ या एक चौथाई बोलते हैं। मालूम पड़ता है, उन दिनों मोल लेने पर एक हाँडी भात दो-तीन पैसे में मिलता होगा और एक दो पैसे में दूसरे व्यंजन। चार पैसे के प्रसाद में चार-पाँच आदमियों की भली-भाँति तृप्ति हो जाती होगी। अब प्रभु ने केवल एक पैसे का ही भोग लेना स्वीकार किया।काशीश्वर और गोविन्द से कह दिया- ‘तुम लोग अन्यत्र जाकर भिक्षा ले आया करो।’
गोविन्द उदास मन से लौट गया। वह प्रभु की इस कठोर आज्ञा का कुछ भी अभिप्राय न समझ सका। गोविन्द प्रभु का अत्यन्त ही अन्तरंग भक्त था, उसका प्रभु के प्रति मातृवत स्नेह था। प्रभु की सेवा में उसे परमानन्द सुख का अनुभव होता था। उसे पता था कि प्रभु जिस बात का निश्चय कर लेते हैं, फिर उसे सहसा जल्दी नहीं छोड़ते। इसलिये उसने प्रभु के आज्ञा पालन में आनाकानी नहीं की।
उस दिन एक ब्राह्मण ने प्रभु को निमन्त्रण किया था। वह बहुत सा सामान प्रभु की भिक्षा के निमित्त लाया था, किन्तु उसने उतना ही प्रसाद उसमें से लिया जितने की प्रभु ने आज्ञा दी थी, शेष सभी लौटा दिया। इस बात से ब्राह्मण को अपार दुःख हुआ, किन्तु प्रभु ने अधिक लेने की स्वीकृति ही नहीं दी।भक्तों को इस बात का पता चला। सभी रामचन्द्रपुरी को खोटी-खरी सुनाने लगे। सभी प्रभु के समीप आ आकर प्रार्थना करने लगे किन्तु प्रभु ने इससे अधिक भिक्षा स्वीकार नहीं की। यह बात रामचन्द्रपुरी को भी मालूम हुई। वह भी प्रभु के भावों को ताड़ने के निमित्त प्रभु के समीप आये। प्रभु ने पूर्ववत ही उठकर उन्हें प्रेमपूर्वक प्रणाम किया और बैठने के लिये अपने से ऊँचा आसन दिया।
आसन पर बैठते हुए गुरुत्व के भाव से पुरी कहने लगे- ‘हमने सुना है, तुमने हमारे कहने से अपना आहार घटा दिया है, यह बात ठीक नहीं है। हमारे कहने का अभिप्राय यह था कि आहर-विहार युक्त रहना चाहिये।
क्रमशः
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