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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इतना अधिक भी न करना चाहिये कि भजन में बैठा ही न जाय और इतना कम भी न करना चाहिये कि शरीर कृश हो जाय। युक्तपूर्वक भोजन करना चाहिये। शरीर सुखाने से क्या लाभ?
प्रभु ने धीरे से नम्रता के साथ कहा- ‘मैं आपका बच्चा हूँ, आप गुरुजन जैसी आज्ञा करेंगे, वैसा ही मैं करूँगा।’
उसी स्वर में पुरी कहने लगे- ‘हाँ, यह तो ठीक है, किन्तु भोजन पेट भर किया करो।’
इतना कहकर पुरी महाराज चले गये किन्तु प्रभु ने अपने आहार उतना ही रखा; उसमें कुछ भी परिवर्तन नहीं किया। इससे भक्तों को तो बड़ा ही दुःख हुआ। वे सब परमानन्द जी पुरी के पास पहुँचे और उनसे प्रार्थना करने लगे कि वे प्रभु को समझा दें।भक्तों के कहने पर परमानन्द जी प्रभु के पास गये और अत्यन्त ही क्षीण देखकर कहने लगे- ‘आप इतने कृश क्यों हो गये हैं, सुना है आपने अपना आहार भी अति सूक्ष्म कर दिया है, इसका कारण क्या है?’
प्रभु ने सरलता पूर्वक उत्तर दिया- ‘श्रीपाद रामचन्द्र जी पुरी ने मुझे ऐसी आज्ञा दी थी कि संन्यासी को कम आहार करना चाहिये।’
कुछ रोष के स्वर मे परमानन्द जी ने कहा- ‘आपने भी किसकी बात मानी? उसे आप नहीं जानते, उसका तो स्वभाव ही दूसरों की निन्दा करना है, ऐसे निन्दकों के उपदेश पर चलने लगें तो सभी रसातल में पहुँच जायँ। आपकी तो बात ही क्या है, वह तो महामहिम श्री गुरुचरणों की निन्दा किये बिना नहीं रहता था। उसके कहने से आप शरीर को सुखा रहे हैं, इससे हमें बड़ा कष्ट होता है। आप हमारे आग्रह से भर पेट भोजन किया कीजिये।’
प्रभु ने सरलता के साथ कहा- ‘आप भी गुरु हैं, वे भी मान्य हैं। आपकी आज्ञा को भी टाल नहीं सकता, आज से कुछ अधिक खाया करूँगा।’
प्रभु के ऐसा विश्वास दिलाने पर पुरी उठकर अपने आसन पर चले गये। उस दिन से प्रभु ने आहार कुछ बढ़ाया तो अवश्य, किन्तु पहले के बराबर उनका आहार फिर कभी हुआ ही नहीं। सभी भक्त मन ही मन रामचन्द्रपुरी को कोसने लगे ओर भगवान से प्रार्थना करने लगे कि जल्दी ही इनके श्वेत पैर पुरी की पावन भमि को परित्याग करके कहीं अन्यत्र चले जायँ। भक्तों की प्रार्थना भगवान ने सुन ली और थोड़े दिनों बाद रामचन्द्रपुरी महाशय अपने आप ही पुरी छोड़कर किसी अन्य स्थान के लिये चले गये।
महात्मा हरिदास जी का गोलोकगमन….
मैं खूब सोच-विचारकर निश्चित रूप से कहता हूँ, मेरे वचनों को मिथ्या मत समझना। मैं कहता हूँ औऱ दावे के साथ कहता हूँ जो लोग श्री हरि का भजन करते हैं वे कठिनता से पार होने वाले इस असार संसार रूपी समुद्र को बात की बात में तर जाते हैं।जिनकी भाग्यवती जिह्वा पर श्री हरि के मधुर नाम सदा विराजमान रहते हैं, नाम संकीर्तन के द्वारा जिनके रोम रोम में राम रम गया है, जिन्होंने कृष्ण-कीर्तन के द्वारा इस कलुषित कलेवर को चिन्मय बना लिया है, वे नाम प्रेमी संत समय समय पर संसार को शिक्षा देने के निमित्त इस अवति पर अवतरित होकर लोगों के सम्मुख नाम माहात्म्य प्रकट करते हैं।वे नित्य सिद्ध और अनुग्रह सृष्टि के जीव होते हैं। न उनका जन्म है और न उनकी मृत्यु। उनकी कोई जाति नहीं, कुटुम्ब परिवार नहीं। वे वर्णाश्रम परे मत-मतान्तरों से रहित और यावतब भौतिक पदार्थों से संसर्ग रखने वाले सम्बन्ध हैं उन सभी से पृथक ही रहते हैं।अपने अलौकिक आचरण के द्वारा संसार को साधन पथ की ओर अग्रसर करने के निमित्त ही उनका अवतरण होता है। वे ऊपर से इसी कार्य के निमित्त उतरते हैं और कार्य समाप्त होने पर ऊपर चले जाते हैं। हम संसारी लोगों की दृष्टि में उनके जन्म मरण आदि सभी कार्य होते से दीखते हैं। वे जन्मते भी हैं, बढ़ते भी हैं, रहते भी हैं, खाते-पीते तथा उठते-बैठते से भी दीखते हैं, वृद्ध भी होते हैं और इस पांच भौतिक शरीर को त्यागकर मृत्यु को भी प्राप्त करते हैं।हम करें भी तो क्या करें, हमारी बुद्धि ही ऐसी बनी है। वह इन धर्मों से रहित व्यक्ति का अनुमान ही नहीं कर सकती। गोल छिद्र में तो गोल ही वस्तु आवेगी, यदि तुम उसमें उसी नाप की चौकोनी वस्तु डालोगे तो तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ होगा।छिद्र की बनावट देखकर ही उसमें वस्तु डालनी चाहिये। इसीलिये कभी न मरने वाले अमर महात्माओं के भी शरीर त्याग का वर्णन किया जाता है। वास्तव में तो श्री हरिदास जी जैसे तब थे वैसे ही अब भी हैं, नमामृत ने उन्हें सदा के लिये जरा, व्याधि तथा मरण से रहित बनाकर अमर कर दिया। जो अमर हो गया उसकी मृत्यु कैसी ? उसके लिये शोक कैसा, उसकी मृत्यु भी एक प्रकार की लीला है और श्री चैतन्य उस लीला के सुचतुर सूत्रधार हैं।वे दृःख से रहित होकर भी दृःख करते से दीखते हैं, ममता मोह से पृथक होने पर भी वे उसमें सने से मालूम पड़ते हैं। शोक, उद्वेग और सन्ताप से अलग होने पर भी वे शोकयुक्त, उद्वेगयुक्त और संतापयुक्त से दृष्टिगोचर होते हैं। उनकी माया वे ही जानें। हम तो दर्शक हैं, जैसा देख रहे हैं, वैसा ही बतावेंगे, जैसा सुनेंगे, वैसा ही कहेंगे। लीला है, बनावट है, छद्म है, नाटक है या सत्य है, इसे वे ही जानें।*ट
दोपहर हो चुकी थी, प्रभु का सेवक गोविन्द नित्य की भाँति महाप्रसाद लेकर हरिदास के पास पहुँचा। रोज वह हरिदास जी को आसन पर बैठे हुए नाम जप करते पाता था। उस दिन उसने देखा हरिदास जी सामने के तख्त पर आँख बंद किये हुए लेट रहे हैं। उनके श्रीमुख से आप ही आप निकल रहा था-
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
गोविन्द ने धीर से कहा- हरिदास, उठो, आज कैसे सुस्ती में पड़े हो।’
कुछ सम्भ्रम के साथ चौंककर आँखें खोलते हुए भर्राई आवाज में हरिदास जी ने पूछा- ‘कौन?’
गोविन्द ने कहा- ‘कोई नहीं, मैं हूँ गोविन्द। क्यों क्या हाल है? पड़े कैसे हो? प्रसाद लाया हूँ, ला प्रसाद पा लो।’
कुछ क्षीण स्वर में हरिदास जी ने कहा- ‘प्रसाद लाये हो? प्रसाद कैसे पाऊँ?’
क्रमशः
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