331
श्री श्री चैतन्य चरितावली
331-
गोविन्द ने कुछ ममता के स्वर में कहा- ‘क्यों, क्यों, बात क्या है, बताओं तो सही। तबीयत तो अच्छी है न?’
हरिदास जी ने फिर उसी प्रकार विषण्णतायुक्त वाणी में कहा- ‘हाँ, तबीयत अच्छी है, किन्तु आज नाम जप की संख्या पूरी नहीं हुई। बिना संख्या पूरी किये प्रसाद कैसे पाऊँ? तुम ले आये हो तो अब प्रसाद का अपमान करते भी नहीं बनता।’
यह कहकर उन्होंने प्रसाद को प्रणाम किया और उसमें से एक कण लेकर मुख में डाल लियो। गोविन्द चला गया, उसने सब हाल महाप्रभु से जाकर कहा।
दूसरे दिन सदा की भाँति समुद्रस्नान करके प्रभु हरिदास जी के आश्रम में गये। उस समय भी हरिदास जी जमीन पर पड़े झपकी ले रहे थे। पास में ही मिट्टी के करवे में जल भरा रखा था। आज आश्रम सदा की भाँति झाड़ा-बुहारा नहीं गया था। इधर-उधर कूड़ा पड़ा था, मक्खियाँ भिनक रही थीं प्रभु ने आवाज देकर पूछा- 'हरिदास जी ! तबीयत कैसी है? शरीर तो स्वस्थ है न?
हरिदास जी ने चौंककर प्रभु को प्रणाम किया और क्षीण स्वर में कहा-‘शरीर तो स्वस्थ है। मन स्वस्थ नहीं है।’
प्रभु ने पूछा- ‘क्यों मन को क्या क्लेश है, किस बात की चिंता है?’
उसी प्रकार दीनता के स्वर में हरिदास जी ने कहा- ‘यही चिन्ता है प्रभो ! कि नाम की संख्या अब पूरी नहीं होती।’ प्रभु ने ममता के स्वर में कुछ बात पर जोर देते हुए कहा- ‘देखो, अब तुम इतने वृद्ध हो गये हो। बहुत हठ ठीक नहीं होती। नाम की संख्या कुछ कम कर दो। तुम्हारे लिये क्या संख्या और क्या जप? तुम तो नित्यसिद्ध पुरुष हो, तुम्हारे सभी कार्य केवल लोकशिक्षा के निमित्त होते हैं।’
हरिदास जी ने कहा- ‘प्रभो ! अब उतना जप होता ही नहीं, स्वतः ही कम हो गया है। हाँ, मुझे आपके श्री चरणों में एक निवेदन करना था।’
प्रभु पास में ही एक आसन खींचकर बैठ गये और प्यार से कहने लगे- ‘कहो, क्या कहना चाहते हो?
अत्यन्त ही दीनता के साथ हरिदास जी ने कहा- आपके लक्षणों से मुझे प्रतीत हो गया है कि आप शीघ्र ही लीला संवरण करना चाहते हैं। प्रभो ! मेरी श्री चरणों में यही अन्तिम प्रार्थना है कि यह दुःखप्रद दृश्य मुझे अपनी आँखों से देखना न पड़े। प्रभो ! मेरा हृदय फट जायगा। मैं इस प्रकार हृदय फटकर मृत्यु नहीं चाहता।मेरी तो मनोकामना यही है कि नेत्रों के सामने आपकी मनमोहिनी मूरत हो, हृदय में आपके सुन्दर सुवर्णवर्ण की सलोनी सूरत हो, जिह्वा पर मधुरातिमधुर श्रीकृष्ण-चैतन्य यह त्रैलोक्यपावन नाम हो और आपके चारु चरित्रों का चिन्तन करते-करते मैं इस नश्वर शरीर को त्याग करूँ। यही मेरी साध है, यह मोर उत्कट अभिलाषा है। आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, सब कुछ करने में समर्थ हैं। इस भिक्षा को तो आप मुझे अवश्य ही दे दें।’
प्रभु ने डबडबायी आँखों से कहा- ‘ठाकुर हरिदास ! मालूम पड़ता है, अब तुम लीला संवरण करना चाहते हो। देखो, यह बात ठीक नहीं। पुरी में मेरा और कौन है, तुम्हारी ही संगति से तो यहाँ पड़ा हुआ हूँ। हम तुम साथ ही रहे, साथ ही संकीर्तन किया, अब तुम मुझे अकेला छोड़कर जाओगे, यह ठीक नहीं है।’
धीरे-धीरे खिसककर प्रभु के पैरों में मस्तक रगड़ते हुए हरिदास कहने लगे- ‘प्रभो ! ऐसी बात फिर कभी अपने श्री मुख से न निकालें। मेरा जन्म म्लेच्छकुल में हुआ। जन्म का अनाथ, अनपढ़ और अनाश्रित, संसार से तिरस्कृत और श्री हीन कर्मों के कारण अत्यन्त ही अधम, तिसपर भी आपने मुझे अपनाया; नरक से लेकर स्वर्ग में बिठाया।बड़े-बड़े श्रोत्रिय, ब्राह्मणों से सम्मान कराया, त्रैलोक्यपावन पुरुषोत्त क्षेत्र का देवदुर्लभ वास प्रदान किया। प्रभो ! दीन हीन कंगाल को रंक से चक्रवर्ती बना दिया, यह आप की ही सामर्थ्य है। आप करनी न करनी सभी कुछ कर सकते हैं।आपकी महिमा का पार कौन पा सकता है? मेरी प्रार्थना को स्वीकार कीजिये और मुझे अपने मनोवांछित वरदान को दीजिये।’
प्रभु ने गदगद कण्ठ से कहा- ‘हरिदास ! तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध करने की भला सामर्थ्य ही किसकी है? जिसमें तुम्हें सुख हो, वही करो।’
प्रभु इतना कहकर अपने स्थान को चले गये। महाप्रभु ने गोविन्द से कह दिया कि हरिदास की खूब देख-रेख रखो, अब वे इस पाँच भौतिक शरीर को छोड़ना चाहते हैं। गोविन्द प्रसाद लेकर रोज जाता था, किन्तु हरिदास जी की भूख तो अब समाप्त हो गयी। फूटे हुए फोड़े में पुलटिस बाँधने से लाभ ही क्या? छिद्र हुए घड़े में जल रखने से प्रयोजन ही क्या? उसमें अब जल सुरक्षित न रहेगा।
महाप्रभु नित्य हरिदास जी को देखने जाया करते थे। एक दिन उन्होंने देखा; हरिदास जी के शरीर की दशा अत्यन्त ही शोचनीय है। वे उसी समय अपने आश्रम पर गये और उसी समय गोविन्द के द्वारा अपने सभी अन्तरंग भक्तों को बुलाया। सबके आ जाने पर प्रभु उन्हें साथ लिये हुए हरिदास जी के आश्रम में जा पहुँचे। हरिदास जी पृथ्वी पर पड़े हुए धीरे-धीरे-
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
इस महामन्त्र का जप कर हरे थे। प्रभु ने पूछा- ‘क्यों, हरिदास ! कहो, क्या हाल है?’
‘सब आनन्द है प्रभो !’ कहकर हरिदास ने कष्ट के साथ करवट बदली। महाप्रभु उनके मस्तक पर धीरे-धीरे हाथ फिराने लगे। राय रामानन्द, सार्वभौम भट्टाचार्य, स्वरूप दामोदर, वक्रेश्वर पण्डित, गदाधर गोस्वामी, काशीश्वर, जगदानन्द पण्डित आदि सभी अन्तरंग भक्त हरिदास जी को चारों ओर से घेरकर बैठ गये। धीरे-धीरे भक्तों ने संकीर्तन आरम्भ किया।भट्टाचार्य जोश में आकर उठ खड़े हुए और जोरों से नृत्य करने लगे। अब तो सभी भक्त उठकर और हरिदास जी को घेरकर जोरों के साथ गाने-बजाने और नाचने लगे। संकीर्तन की कर्णप्रिय ध्वनि सुनकर सैकड़ों आदमी वहाँ एकत्रित हो गये। कुछ क्षण के अनन्तर प्रभु ने संकीर्तन बन्द करा दिया, भक्तों के सहित हरिदास जी को चारों ओर से घेरकर बैठ गये। प्रभु के दोनों कमल के समान कमल के समान नेत्रों में जल भरा हुआ था, कण्ठ शोक के कारण गदगद हो रहा था।उन्होंने कष्ट के साथ धीरे-धीरे रामानन्द तथा सार्वभौम आदि भक्तों से कहना आरम्भ किया- ‘हरिदास जी के भक्ति भाव का बखान सहस्र मुख वाले शेषनाग जी भी अनन्त वर्षों में नहीं कर सकते।
क्रमशः
Comments
Post a Comment