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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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इनकी सहिष्णुता जागरूकता, तितिक्षा और भगवन्नाम में अनन्यभाव से निष्ठा आदि सभी बातें परम आदर्श और अनुकरणीय हैं।इनका जैसा वैराग्य था वैसा सभी मनुष्यों में नहीं हो सकता। कोटि-कोटि पुरुषों में कही खोजने से किसी में मिल सके तो मिले, नहीं तो इन्होंने अपना आचरण असम्भव सा ही बना लिया था।’ 
यह कहकर प्रभु बेंतों की घटना, वेश्या की घटना, नाग की घटना तथा इनके सम्बन्ध की और प्रलोभन सम्बन्धी दैवी घटनाओं का वर्णन करने लगे।सभी भक्त इनके अनुपमेय गुणों को सुनकर इनके पैरों की धूलि को मस्तक पर मलने लगे। उसी समय बड़े कष्ट से हरिदास जी ने प्रभु को सामने आने का संकेत किया। भक्तवत्सल चैतन्य उन महापुरुष के सामने बैठ गये। अब तक उनकी आँखें बन्द थीं, अब उन्होंने दोनों आँखों को खोल लिया और बिना पलक मारे अनिमेषभाव से वे प्रभु के श्री मुख की ओर निहारने लगे मानों वे अपने दोनों बड़े-बड़े नेत्रों द्वारा महाप्रभु के मनोहर मुखारविन्द के मकरन्द का तन्मयता के साथ पान कर रहे हों। उनकी दृष्टि महाप्रभु के श्री मुख की ओर से क्षणभर को भी इधर-उधर हटती नहीं थी। सभी मौन थे, चारों ओर नीरवता और स्तब्धता छायी हुई थी।हरिदास जी अत्यन्त ही पिपासु की तरह प्रभु की मकरन्द माधुरी को पी रहे थे। अब उन्होंने पास में बैठे हुए भक्तों की धीरे-धीरे पदधूलि उठाकर अपने काँपते हुए हाथों से शरीर पर मली। उनकी दोनों आँखों की कोरों में से अश्रुओं की बूँदें निकल-निकलकर पृथ्वी में विलीन होती जाती थीं। मानों वे नीचे के लोक में हरिदास विजयोत्सव का संवाद देने जा रही हों।उनकी आँखों के पलक गिरते नहीं थे, जिह्वा से धीरे-धीरे ‘श्रीकृष्ण चैतन्य’ ‘श्रीकृष्ण चैतन्य’ इन नामों को उच्चारण कर रहे थे। देखते ही देखते उनके प्राण पखेरू इस जीर्ण-शीर्ण कलेवर को परित्याग करके न जाने किस लोक की ओर चले गये। उनकी आँखें खुली-की-खुली ही रह गयीं, उनके पलक फिर गिरे नहीं। मीन की तरह मानो वे पलकहीन आँखें, निरन्तररूप से त्रैलोक्य को शीतलता प्रदान करने वाले चैतन्यरूपी जल का आश्रय ग्रहण करके उसी की ओर टकट की लगाये अविच्छिन्नभाव से देख रही हैं।

सभी भक्तों ने एक साथ हरिध्वनि की। महाप्रभु उनके प्राणहीन कलेवर को अपनी गोदी में उठाकर जोरों के साथ नृत्य करने लगे। सभी भक्त  रुदन करते हुए ‘हरि बोल’, ‘हरि बोल’ की हृदयविदारक ध्वनि से मानों आकाश के हृदय के भी टुकड़े-टुकड़े करने लगे।उस समय का दृश्य बड़ा ही करुणा जनक था। श्री चैतन्य हरिदास के प्राणहीन शरीर को गोदी में लेकर रोते-रोते नृत्य कर रहे थे, उसका वर्णन करना हमारी शक्ति के बाहर की बात है।इस प्रकार बड़ी देर तक भक्तों के सहित प्रभु कीर्तन करते रहे। अनन्तर श्री जगन्नाथ जी का प्रसादी वस्त्र मँगाया गया। उससे उनके शरीर को लपेटकर उनका बड़ा भारी विमान बनाया गया। सुन्दर कलाबे की डोरियों से कसकर उनका शरीर विमान पर रखा गया।सैकड़ों भक्त ढोल, करतार झाँझ, मृदंग और शंख, घडियाल तथा घण्टा बजाते हुए विमान के आगे-आगे चलने लगे। सभी भक्त बारी-बारी से हरिदास जी के विमान में कन्धा लगाते थे। महाप्रभु सबसे आगे विमान के सामने अपना उन्मत्त नृत्य करते जाते थे।वे हरिदास जी की गुणावली का निरन्तर गान कर रहे थे। इस प्रकार खूब धूम-धाम के साथ वे हरिदास जी के शव को लेकर समुद्र तट पर पहुँचे। समुद्रतट पर पहुँचकर भक्तों ने हरिदास जी के शरीर को समुद्र जल में स्नान कराया। महाप्रभु अश्रुविमोचन करते हुए गदगद कण्ठ से कहने लगे- ‘समुद्र आज से पवित्र हो गया, अब यह हरिदास जी के अंगस्पर्श से महातीर्थ बन गया।’ 
यह कहकर आपने हरिदास जी का पादोदक पान किया।सभी भक्तों ने हरिदास जी के पादोदक से अपने को कृतकृत्य समझा। बालू में एक गडढा खोदकर उसमें हरिदास जी के शरीर को समाधिस्थ किया गया। क्योंकि वे संन्यासी थे, संन्यासी के शरीर की शास्त्रों में ऐसी ही विधि बतायी है। प्रभु ने अपने हाथों से गडढे में बालू दी और उनकी समाधि पर सुन्दरसा एक चबूतरा बनाया।सभी ने शोकयुक्त प्रेम के आवेश में उन्मत्त होकर समाधि के चारों ओर संकीर्तन किया और समुद्र स्नान करके तथा हरिदास जी की समाधि की प्रदक्षिणा करके सभी ने पुरी की ओर प्रस्थान किया। पथ में प्रभु हरिदास जी की प्रशंसा करते-करते प्रेम में पागलों की भाँति प्रलाप करते जाते थे। सिंहद्वार पर पहुँच कर प्रभु रोते रोते अपना अंचल पसार पसारकर दुकानदारों से भिक्षा माँगने लगे।
वे कहते थे- ‘भैया! मैं अपने हरिदास का विजयोत्सव मनाऊँगा, मुझे हरिदास के नाम पर भिक्षा दो।’ 
दुकानदार अपना अपना सभी प्रसाद प्रभु की झोली में डालने लगे। तब स्वरूप दामोदर जी ने प्रभु का हाथ पकड़कर कहा- ‘प्रभो! यह आप क्या कर रहे हैं? भिक्षा माँगने के लिये हम आपके सेवक ही बहुत हैं, आपको इस प्रकार माँगते देखकर हमें दुःख हो रहा है, आप चलिये। जितना भी आप चाहेंगे उतना ही प्रसाद हम लोग माँग माँगकर एकत्रित कर देंगे।’

इस प्रकार प्रभु को समझा-बुझाकर स्वरूप गोस्वामी ने उन्हें स्थान पर भिजवा दिया और आप चार-पाँच भक्तों को साथ लेकर दुकानों पर महाप्रसाद माँगने चले। उस दिन दुकानदारों ने उदारता की हद कर डाली। उनके पास जितना भी प्रसाद था, सभी दे डाला। इतने में ही वाणीनाथ, काशी मिश्र आदि बहुत से भक्त मनों प्रसाद लेकर प्रभु के आश्रम पर आ उपस्थित हुए।चारों ओर महाप्रसाद का ढेर लग गया। जो भी सुनता वही हरिदास जी के विजयोत्सव में सम्मिलित होने के लिये दौड़ा आता। इस प्रकार हजारों आदमी वहाँ एकत्रित हो गये।महाप्रभु स्वयं अपने हाथों से सभी को परोसने लगे। महाप्रभु का परोसना विचित्र तो होता ही था। एक-एक पत्तल पर चार चार, पाँच पाँच आदमियों के योग्य भोजन और तारीफ की बात यह कि लोग सभी को खा जाते थे। 
भक्तों ने आग्रह पूर्वक कहा- ‘जब तक महाप्रभु प्रसाद न पा लेंगे, तब तक हममें से कोई एक ग्रास भी मुँह में न देगा।’ 
तब प्रभु ने परासना बंद कर दिया और पुरा तथा भारती आदि संन्यासियों के साथ काशी मिश्र के लाये हुए प्रसाद को पाने लगे, क्योंकि उस दिन प्रभु का उन्हीं के यहाँ निमन्त्रण था।
क्रमशः

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