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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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महाप्रभु ने सभी भक्तों को खू्ब आग्रह पूर्वक भोजन कराया। सभी ने प्रसाद ना लेने के अनन्तर हरिध्वनि की। तब प्रभु ऊपर को हाथ उठाकर कहने लगे- ‘हरिदास जी का जिसने संग किया, जिसने उनके दर्शन किये, उनके गड्ढे में बालू दी, उनका पादोदक पान किया, उनके विजयोत्सव में प्रसाद पाया, वह कृतार्थ हो गया।उसे श्रीकृष्ण प्रेम की प्राप्ति अवश्य हो सकेगी। वह अवश्य ही भगवत्कृपा का भाजन बन सकेगा।’
यह कहकर प्रभु ने जोरों से हरिदास जी की जय बोली।’ ‘हरिदास जी की जय’ के विशाल घोष से आकाश मण्डल गूँजने लगा। हरि-हरि ध्वनि के साथ हरिदास जी का विजयोत्सव समाप्त हुआ।
श्री क्षेत्र जगन्नाथपुरी में टोटा गोपीनाथ जी के रास्ते में समुद्र तीर पर अब भी हरिदास जी की सुन्दर समाधि बनी हुई है। वहाँ पर एक बहुत पुराना बकुल (मौलसिर) का वृक्ष है, उसे ‘सिद्ध बकुल’ कहते हैं। ऐसी प्रसिद्धि है कि हरिदास जी ने दातौन करके उसे गाड़ दिया था, उसी से यह वृक्ष हो गया।अब भी वहाँ प्रतिवर्ष अनन्त चतुर्दशी के दिवस हरिदास जी का विजयोत्सव मनाया जाता है। उन महामना हरिदास जी के चरणों में हम कोटि कोटि प्रणाम।
भक्त कालिदास पर प्रभु की परम कृपा…
वैष्णव ग्रन्थों में ‘भक्त-पद-रज’, ‘भक्त-पादोदक’ और ‘भक्तोच्छिष्ट द्रव्य’ इन तीनों का अत्यधिक माहात्म्य वर्णन किया गया है। श्रद्धालु भक्तों ने इन तीनोंको ही साधन बल बताया है। सचमुच जिन्हें इन तीनों वस्तुऔं में श्रद्धा हो गयी, जिनकी बुद्धि में से भक्तों के प्रति भेदभाव मिट गया, जो भगवत्स्वरूप समझकर सभी भक्तो की पदधूलि को श्रद्धा पूर्वक सिर पर चढ़ाने लगे तथा भक्तों के पादोदक को भक्ति से पान करने लगे, वे निहाल हो गये, उनके लिये भगवान फिर दूर नहीं रह जाते।उनकी पदधूलि की लालसा से भगवान उनके पीछे-पीछे घूमते रहते हैं, किन्तु इन तीनों में पूर्ण श्रद्धा होना ही तो महाकठिन है। महाप्रसाद, गोविन्द, भगवन्नाम और वैष्णवों के श्री विग्रह में पूर्ण विश्वास भगवत-कृपापात्र किसी विरले ही महापुरुष को होता है। यों दूध पीने वाले बनावटी मजनू तो बहुत से घूमते हैं। उनकी परीक्षा तो कटोरा भर खून माँगने पर ही हो सकती है।वे महापुरुष धन्य हैं, जो भक्तों की जाति-पाँति नहीं पूछते। भगवान में अनुराग रखने वाले सच्चे भगवत भक्त को वे ईश्वर तुल्य ही समझकर उनकी सेवा पूजा करते हैं।
भक्त प्रवर श्री कालिदास ऐसे ही परम भागवत भक्तों में से एक जगद्वन्द्य श्रद्धालु भक्त थे। उनकी अद्वितीय भक्तिनिष्ठा सुनकर सभी को परम आश्चर्य होगा।कालिदास जी जाति के कायस्थ थे। इनका घर श्रीरघुनाथदास जी के गाँव से कोस, डेढ़ कोस भेदा या भदुआ नामक ग्राम में था। जाति सम्बन्ध से वे रघुनाथदास जी के समीपी और सम्बन्धी थे। भगवन्नाम में इनकी अनन्य निष्ठा थी।उठते बैठते, सोते जागते, हँसते-खेलते तथा बातें करते करते भी सदा इनकी जिह्वा पर भगवन्नाम ही विराजमान रहता। हरे कृष्ण हरे राम बिना ये किसी बात को कहते ही नहीं थे।भगवत-भक्तों के प्रति इनकी ऐसी अद्भुत निष्ठा थी कि जहाँ भी किसी भगवत भक्त का पता पाते वहीं दौड़े जाते और यथाशक्ति उनकी सेवा करते। भक्तों को अच्छे अच्छे पदार्थ खिलाने में उन्हें परमानन्द का अनुभव प्राप्त होता। भक्तों को जब ये श्रद्धा पूर्वक सुस्वादु पदार्थ खिलाते तो उनके दिव्य स्वादों का ये स्वयं भी अनुभव करते। स्वयं खाने से इन्हें इतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी कि भक्तों को खिलाने से।भक्तों को खिलाकर ये स्वयं उनका उच्छिष्ट महाप्रसाद पाते, कोई कोई भक्त संकोचवश इन्हें अपना उच्छिष्ट नहीं देता तो से उसके बर्तनों को ही चाटते। उसी महाप्रसाद को पाकर ये अपने को कृतार्थ समझते। निरन्तर भगवन्नामों का जप करते रहना, भक्तों का पादोदक पान करना, उनकी पदधूलि को मस्तक पर चढ़ाना और उनके अच्छिष्ट महाप्रसाद को पूर्ण श्रद्धा के साथ पाना ही-ये इनके साधनबल थे।इनके अतिरिक्त ये योग, यज्ञ, तप, पूजा, पाठ, अध्ययन और अभ्यास आदि कुछ भी नहीं करते थे। इनका विश्वास था कि हमें इन्हीं साधनों के द्वारा प्रभुपादपद्मों की प्रीति प्राप्त हो जायगी। ऐसा दृढ़ विश्वास था, इसमें बनावटी गन्ध तक भी नहीं थी।
इनके गाँव ही के एक झा नाम के भूमि माली जाति के शूद्र भगवत-भक्त थे। उनकी पत्नी भी अत्यन्त ही पतिपरायणा सती साध्वी नारी थी। दोनों की खूब भक्ति भाव से श्रीकृष्ण-कीर्तन किया करते थे।
एक दिन भक्त कालिदास जी उन दोनों भक्त दम्पति के दर्शनों के निमित्त उनके घर पर गये। उन दिनों आमों की फसल थी, इसलिये वे उनकी भेंट के लिये बहुत बढ़िया बढ़िया सुन्दर आम ले गये थे। प्रतिष्ठित कुलोद भूत कालिदास को अपनी टूटी झोंपड़ी में आया देखकर उस भक्त दम्पति के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उन दोनों ने उठकर कालिदास जी की अथ्यर्थना की और उन्हें बैठने के लिये एक फटा सा आसन दिया।कालिदास जी के सुख पूर्वक बैठ जाने पर कुछ लज्जित भाव से अत्यन्त की कृतज्ञता प्रकट करते हुए झाड़ू भक्त कहने लगे-‘महाराज ! आपने अपनी पदधूलि से इस शूद्राधम की कुटी को परम पावन बना दिया। आप जैसे श्रेष्ठ पुरुषों का हम जैसी जाति के पुरुषों के यहाँ आना साक्षात भगवान के पधारने के समान है।हम एक जो वैसे ही शूद्र हैं दूसरे धनहीन हैं, फिर आपकी किस प्रकार सेवा करें। आप जैसे अतिथि हमारे यहाँ काहे को आने लगे, हम आपका सत्कार किस वस्तु से करें। आज्ञा हो तो किसी ब्राह्मण के यहाँ से कोई वस्तु बनवा लावें।’
कालिदास जी ने कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा- ‘आप दोनों के शुभ दर्शनों से ही मेरा सर्वश्रेष्ठ सत्कार हो चुका। यदि आप कृपा करके कुछ करना ही चाहते हैं, तो यही कीजिये कि अपने चरणों को मेरे मस्तक पर रखकर उनकी पावन पराग से मेरे मस्तक को पवित्र बना दीजिये। यही मेरी आपसे प्रार्थना है, इसी के द्वारा मुझे सब कुछ मिल जायेगा।’
अत्यन्त ही दीनता के साथ गिड़गिड़ाते हुए झाड़ू भक्त ने कहा- ‘स्वामी ! आप यह कैसी भूली-भूली सी बातें कर रहे हैं। भला, हम जाति के शूद्र, धर्म कर्म से हीन, आपके शरीर को स्पर्श करने तक के भी अधिकारी नहीं हैं, फिर हम आपको अपने पैर कैसे छुआ सकते हैं। हमारी यही आपसे प्रार्थना है कि ऐसी पाप चढ़ाने वाली बात फिर कभी भी अपने मुँह से न निकालें। इससे हमारे सर्वनाश होने की सम्भावना है।’
क्रमशः
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