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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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कालिदास जी ने कहा- ‘जो भगवान का भक्त है, उसकी कोई जाति नहीं होती। वह तो जातिबन्धनों से परे होता है। उससे श्रेष्ठ कोई नहीं होता, वही सबसे श्रेष्ठ होता है। इसलिये आप जाति-कुल का भेदभाव न करें। आप परम भागवत हैं, आपकी पदधूलि से मैं पावन हो जाऊँगा, आप मेरे ऊपर अवश्य कृपा करें।’
झाड़ू भक्त ने कहा- ‘मालिक ! आपकी इस बात को मैं मानता हूँ कि भगवद्भक्त वर्ण और आश्रमों से परे होता है। वह सबका गुरु और पूजनीय होता है, उससे बढ़कर कोई भी नहीं होता, किन्तु वह भक्त होना चाहिये। मैं अधम भला भक्तिभाव क्या जानूँ। मुझे तो भगवान में तनिक भी प्रीति नहीं। मैं तो संसारी गर्त में फँसा हुआ नीच विषयी पुरुष हूँ।’
कालिदास जी ने कहा- ‘सचमुच सच्चे भक्त तो आप ही हैं। जो अपने को भक्त मानकर सबसे अपनी पूजा कराता है, अपने भक्तिभाव का विज्ञापन बाँटता फिरता है, वह तो भक्त नहीं दुकानदार है, भक्ति के नाम पर पूजा प्रतिष्ठा खरीदने वाला बनिया है। सच्चा भक्त तो आपकी तरह सदा अमानी, अहंकार रहित, सदा दूसरों को मान प्रदान करने वाला होता है, उसे इस बात का स्वप्न में भी अभिमान नहीं होता कि मैं भक्त हूँ। यही तो उनकी महत्ता है।आप छिपे हुए सच्चे भगवद्भक्त हैं। हीन कुल में उत्पन्न होकर आपने बपने को छिपा रखा है, फिर भी ऐसी अलौकिक कस्तूरी है कि वह कितनी भी क्यों न छिपायी जाय, सच्चे पारखी तो उसे पहचान ही लेते हैं। कृपा करके अपनी चरण धूलि से मेरे अंग को पवित्र बना दीजिये।’
इस प्रकार कालिदास जी बहुत देर तक उनसे आग्रह करते रहे, किन्तु झाड़ू भक्त ने उसे स्वीकार नहीं किया। अन्त में वे दोनों पति पत्नी को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके उनसे विदा हुये। झाड़ू भक्त शिष्टाचार के अनुसार उन्हें थोड़ी दूर घर से बाहर तक पहुँचाने के लिये उनके पीछे-पीछे आये। जब कालिदास जी ने उनसे आग्रह पूर्वक लौट जाने को कहा तो वे लौट गये। कालिदास जी वहीं खड़े रहे।झाड़ू भक्त जब अपनी कुटिया में घुस गये तब जिस स्थान पर उनके चरण पड़े थे, उस स्थान की धूलि को उठाकर उन्होंने अपने सम्पूर्ण शरीर पर लगाया और एक ओर घर के बाहर छिप कर बैठ गये। रात्रि का समय था। झाड़ू भक्त की स्त्री ने अपने पति से कहा- ‘कालिदास जी ये प्रसादी आम दे गये हैं, इन्हें भगवत अर्पण करके पा लो। भक्त का दिया हुआ प्रसाद है, इसके पाने से कोटि जन्मों के पाप कटते हैं।’
झाडू भक्त ने उल्लास के साथ कहा- ‘हाँ, हाँ, उन आमों को अवश्य लाओ। उनके पाने से तो श्रीकृष्ण प्रेम की प्राप्ति होगी।
पति की आज्ञा पाते ही पतिपरायणा पत्नी उन आमों की टोकरी को उठा लायी। झाड़ू ने मन से आमों का भगवत अर्पण किया और फिर उन्हें प्रसाद समझकर पाने लगे। उनके चूस लेने पर जो बचता उसे उनकी पतिव्रता स्त्री चूसती जाती और गुठली तथा छिलकों को बाहर की ओर फेंकती जाती।पीछे छिपे हुए कालिदास जी उन गुठलियों को उठा उठाकर चूसते और उनमें वे अमृत के समान स्वाद का अनुभव करतें इस प्रकार भक्तों के अच्छिष्ट प्रसाद को पाकर अपने को कृतार्थ समझकर वे बहुत रात्रि बीते अपने घर आये।
इस प्रकार की इनकी भक्तों के प्रति अनन्य श्रद्धा थी। एक बार गौड़ीय भक्तों के साथ वे भी नीलाचंल में प्रभु के दर्शन के लिये पधारे। इनके ऐसे भक्ति भाव की बातें सुनकर प्रभु इनसे अत्यणिक सन्तुष्ट हुए ओर इन्हें बड़े ही सम्मान के साथ अपने पास रखा।महाप्रभु जब जगन्नाथ जी के मन्दिर में दर्शनों के लिये जाते, तब सिंहासन के समीप वे एक गड़ढे में पैर धोया करते थे। गोविन्द उनके साथ ही जाता था। प्रभु ने कठोर आज्ञा दे रखी थी कि यहाँ हमारे पादोदक को कोई भी पान न करे इसलिये वहाँ जाकर प्रभु के पादोदक पान करने का साहस किसी को भी नहीं होता था किन्तु भक्तों का पादोदक और भक्तभुक्त अन्न ही जिनके साधन का एकमात्र बल है, वे कालिदास जी भला कब मानने वाले थे।वे निर्भीक होकर प्रभु के समीप चले गये और उनके पैर धोये हुए जल को पीने लगे। एक चुल्लू पीया, प्रभु चुपचाप उनके मुख की ओर देखते रहे। दूसरा चुल्लू पीया, प्रभु थोड़े से मुसकराये, तीसरा चुल्लू पीया, प्रभु जोरों से हँस पड़े। चौथे चुल्लू के लिये ज्यों ही उन्होंने हाथ बढ़ाया त्यों ही प्रभु ने उनका हाथ पकड़ लिया और कहने लगे- ‘बस, बहुत हुआ। अब फिर कभी ऐसा न करना।’
इस प्रकार अपने को बड़भागी समझते हुए कालिदास जी जगन्नाथ जी के दर्शन करते हुए प्रभु के साथ-ही-साथ अपने निवास स्थान पर आये। महाप्रभु ने भिक्षा पायी और भिक्षा पाने के अनन्तर संकेत से गोविन्द को आज्ञा दे दी कि कालिदास जी को हमारा उच्छिष्ट प्रसाद दे दो। प्रभु का संकेत समझकर गोविन्द ने कालिदास जी को प्रभु का उच्छिष्ट महाप्रसाद दे दिया।पादोदक के अनन्तर प्रभु के अधरामृत सिंचित उच्छिष्ठ प्रसाद को पाकर उनकी प्रसन्नता का वारावार नहीं रहा। धन्य है ऐसे भक्तिभाव को और धन्य है उनके ऐसे देवदुर्लभ सौभाग्य को, जिनके लिये महाप्रभु ने स्वयं उच्छिष्ट प्रसाद देने की आज्ञा प्रदान की।
जगदानन्द जी के साथ प्रेम-कलह…
प्रेम कलह में कितना मिठास है, इसका अनुभव प्रेमी हृदय ही कर सकता है। यदि प्रेम में कलह पृथक की दी जाय जो उसका स्वाद उसी प्रकार का होगा जिस प्रकार चीनी निकालकर भाँति-भाँति के मेवा डालकर बनाये हुए हलुवे का। चीनी के बिना जिस प्रकार खूब घी डालकर बनाया हुआ हलवा स्वादिष्ट और चित्त को प्रसन्नता प्रदान करने वाला नहीं होता उसी प्रकार जब तक बीच बीच में मधुर मधुर कलह का सम्पुट न लगता रहे, तब तक उसमें निरन्तर रस नहीं आता। प्रणय-कलह प्रेम को नित्य नूतन बनाती रहती है। कलह प्रेमरूपी कभी न फटने वाली चद्दर की सज्जी है, वह उसे समय समय पर धोकर खूब साफ बनाती रहती है। किन्तु यह कलह मधुर भाव के उपासकों में ही भूषण समझी जाती है; अन्य भावों में तो इसे दूषण कहा है।
पण्डित जगदानन्द जी नवद्वीप में श्री निवास पण्डित के यहाँ प्रभु के साथ सदाकीर्तन में सम्मिलित होते थे। संन्यास ग्रहण करक प्रभु पुरी में पधारे।
क्रमशः
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