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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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तब ये भी प्रभु दण्ड लिये एक साधारण सेवक की भाँति उनके पीछे पीछे चले और रास्ते भर ये स्वयं भिक्षा माँगकर प्रभु तथा अन्य सभी साथियों को भोजन बनाकर खिलाते थे। प्रभु के पहले वृन्दावन आने पर ये भी साथ चले थे और फिर रामकेलि से ही उनके साथ लौट भी आये थे। प्रभु के नीलाचल में स्थायी रहने पर ये भी वहाँ स्थायी रूप से रहने लगे। बीच बीच में प्रभु की आज्ञा से शची माता के लिये भगवान का प्रसादी वस्त्र और महाप्रसाद लेकर ये नवद्वीप आया जाया भी करते थे। प्रभु के प्रति इनका अत्यन्त ही मधुर भाव था। भक्त इनके अत्यन्त ही कोमल मधुर भाव को देखकर इन्हें सत्यभामा का अवतार बताया करते थे और सचमुच इनकी उपासना थी भी इसी भाव की।
ये प्रभु के संन्यास की कुछ भी परवा नहीं करते थे। ये चाहते थे, प्रभु खूब अच्छे अच्छे पदार्थ खायें, सुन्दर सुन्दर वस्त्र पहनें और अच्छे अच्छे स्वच्छ और सुन्दर आसनों पर शयन करें। प्रभु यतिधर्म के विरुद्ध इन वस्तुओं का सेवन करना चाहते नहीं थे।बस, इसी बात पर कलह होती ! कलह का प्रधान कारण यही था कि जगदानन्द प्रभु के शरीर की तनिक सी भी पीड़ा को सहन नहीं कर सकते थे और प्रभु शरीर पीड़ा की कभी परवा ही नहीं करते थे। जगदानन्द जी अपने प्रेम के उद्रेक में प्रभु से कड़ी बातें भी कह देते और प्रभु भी इनसे सदा डरते-से रहते।
एक बार ये महाप्रसाद और वस्त्र लेकर नवद्वीप में शचीमाता के समीप गये। माता इन्हें देखकर अपने निमाई के दर्शनों का अनुभव करती थी और सभी गौरभक्त भी इनके दर्शनों से श्रीचैतन्य चरणों के दर्शनों का सा आनन्द प्राप्त करते। ये जाते तो सभी भक्तों से मिलकर ही आते। नवद्वीप से आचार्य के घर शान्तिपुर होते हुए ये शिवानन्द जी सेन के घर भी गये।वहाँ से ये एक कलश सुगन्धित चन्दनादि तैल प्रभु के निमित्त लेते आये। प्रभु सदा भाव में विभोर से रहते। उनके अंग प्रत्यंगों की नसें ढीली हो जातीं और सम्पूर्ण शरीर में पीड़ा होने लगती। इन्होंने सोचा के इस तैल से प्रभु की वात-पित्तजन्य सभी व्याधियाँ शान्त हो जाया करेंगी।प्रेम के आवेश में पण्डित होकर भी ये इस बात को भूल गये कि संन्यासी के लिये तैल लगाना शास्त्रों में निषेध है। प्रेम में युक्तायुक्त विचारणा रहती ही नहीं। प्रेमी के लिये कोई लौकिक नियम नहीं, उसकी मथुरा तो तीन लोक से न्यारी हैं। जगदानन्द जी ने तैल लाकर गोविन्द को दे दिया और उससे कह दिया कि इसे प्रभु के अंगों में मल दिया करना।
गोविन्द ने प्रभु से निवेदन किया- ‘प्रभो ! जगदानन्द पण्डित गौड़देश से यह चन्दनादि तैल लाये हैं और शरीर में मलने के लिये कह गये हैं। अब जैसी आज्ञा हो वैसा ही मैं करूँ।’
प्रभु ने कहा- ‘एक तो जगदानन्द पागल है, उसके साथ तू भी पागल हो गया। भला, संन्यासी होकर कहीं तैल लगाया जाता है, फिर तिस पर भी सुगन्धित तैल, जो रास्ते में जाते हुए देखेंगे, वे ही कहेंगे- यह शौकीन संन्यासी कैसा श्रृंगार करता है। सभी विषयी कहकर मेरी निन्दा करेंगे। मुझे ऐसा तैल लगाना ठीक नहीं है।’
गोविन्द इस उत्तर को सुनकर चुप हो गया।दो चार दिन के पश्चात् जगदानन्द जी ने गोविन्द से पूछा- ‘गोविन्द ! तुमने वह तैल प्रभु के शरीर में लगाया नहीं?’
गोविन्द ने कहा- ‘वे लगाने भी दें तब तो लगाऊँ ? वे तो मुझे डाँटते थे।’ जगदानन्द जी ने धीरे से कहा-‘अरे ! तैने भी उनके डाँटने का खूब खयाल किया ! वे तो ऐसे ही कहते ही रहेंगे, तू लगा देना। मेरा नाम ले देना।’
गोविन्द ने कहा- ‘पण्डित जी ! ऐसे लगाने का तो मेरा साहस नहीं है। हाँ, आप कहते हैं तो एक बार फिर निवेदन करूँगा।’
दो चार दिन के पश्चात् एकान्त में अत्यन्त ही दीनता के साथ गोविन्द ने कहा- ‘प्रभो ! वे बेचारे कितना परिश्रम करके इतनी दूर से तैल लाये हैं, थोड़ा सा लगा लीजिये। उनका भी मन रह जायगा और फिर यह ता औषधि है, रोग के लिये औषधि लगाने में क्या दोष ?’
प्रभु ने प्रेम के रोष में कहा- ‘तुम सब तो मिलकर मुझे अपने धर्म से च्युत करना चाहते हो। आज सुगन्धित तैल लगाने को कह रहे हो, कल कहोगे कि एक मालिश करने वाला रख लो। जगदानन्द की तो बुद्धि बिगड़ गई है, पण्डित होकर उन्हें इतना भी ज्ञान नहीं कि संन्यासी के लिये सुगन्धित तैल छूना भी महापाप है। वे यदि परिश्रम करके लाये हैं तो इसे जगन्नाथ जी के मन्दिर में दे आओ। वहाँ दीपक में जल जायेगा।’
गोविन्द प्रभु की मीठी फटकार सुनकर एकदम चुप हो गया, फिर उसने एक भी शब्द तैल के सम्बन्ध में नहीं कहा।गोविन्द ने सभी बातें जाकर जगदानन्द जी से कह दीं। दूसरे दिन जगदानन्द जी मुँह फुलाये हुए कुछ रोष में भरे हुए प्रभु के समीप आये। प्रभु उनके हाव-भाव को ही देखकर समझ गये कि ये जरूर कुछ खरी खोटी सुनाने आये हैं, इसलिये उन्होंने पहले से पहले ही प्रसंग छेड़ दिया। वे अत्यन्त ही स्नेह प्रकट करते हुए धीरे धीरे मधुर वचनों में जगदानन्द जी से कहने लगे- ‘जगदानन्द जी ! आप गौड़देश से बड़ा सुन्दर तैल लाये हैं।मेरी तो इच्छा होती है, थोड़ा सा इसमें से लगाऊँ, किन्तु क्या करूँ, संन्यास धर्म से विवश हूँ। आप स्वयं पण्डित हैं, यह बात आपसे छिपी थोड़े ही है कि संन्यासी के लिये सुगन्धित तैल लगाना महापाप है। इसीलिये मैं लगा नहीं सकता। आप एक काम करें, इस तैल को जगन्नाथ जी भेंट कर आइये, वहाँ इसके दीपक जल जायँगे, आपका सभी परिश्रम सफल हो जायगा।’
जगदानन्द जी ने कुछ रोष के स्वर में कहा- ‘आपसे यह बिना सिर पैर की बात कह किसने दी। मैं कब तैल लाया हूँ ?’
प्रभु ने हँसते हँसते कहा- ‘आप सच्चे, मैं झूठा। इस तैल के कलश को मेरे यहाँ कोई देवदूत रख गया।’
यह सुनकर जगदानन्द जी रोष में उठे और उस तैल के कलश को उठाकर जोर से आँगन में दे मारा। कलश आँगन में गिरते ही चकनाचूर हो गया।सम्पूर्ण तैल आँगन में बहने लगा। कलश को फोड़कर जगदानन्द जी जल्दी से अपने घर को चले गये और भीतर से किवाड़ बंद करके पड़ रहे।
क्रमशः
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