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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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दो दिन तक न तो अन्न जल ग्रहण किया और न बाहर निकले। प्रणयकोप में भीतर ही पड़े रहे।
जगदानन्द जी की एकनिष्ठा….
शास्त्रों में भक्तों के उत्तम, मध्यम और प्राकृत रूप से तीन भेद बताये गये हैं। जो भक्त अपने इष्ट देव को सर्वव्यापक समझकर प्राणिमात्र के प्रति श्रद्धा के भाव रखता है और सभी वस्तुओं में इष्टबुद्धि रखकर उनका आदर करता है, वह सर्वोत्तम भक्त है। जो अपने इष्ट में प्रीति रखता है और अपने ही समान इष्ट बन्धुओं के प्रति श्रद्धा का भाव, असाधकों के प्रति कृपा के भाव, विद्वेषियों और भिन्न मत वालों के प्रति उपेक्षा के भाव रखता है, वह मध्यम भक्त है और जो अपने इष्ट के विग्रह में ही श्रद्धा के साथ उन श्री हरि की पूजा करता तथा भगवत भक्तों की तथा अन्य पुरुषों से एकदम उदासीन रहता है, वह प्राकृत भक्त है।प्राकृत भक्त बुरा नहीं है, भक्ति का सच्चा श्री गणेश तो यहीं से होता है, जो पहले प्राकृत भक्त नहीं बना वह उत्तम तथा मध्यम भक्त बन ही कैसे सकता है। नीचे की सीढ़ियों को छोड़कर सबसे ऊँची पर बिना योगेश्वरेश्वर कृपा से कोई भी नहीं जा सकता।
पण्डित जगदानन्द जी सरल प्रकृति के भक्त थे, वे प्रभु के शरीर सुख के पीछे सब कुछ भूल जाते थे। प्रभु के अतिरिक्त उनके लिये कोई पूजनीय संन्यासी नहीं था, प्रभु के सभी काम लीला हैं, यही उनकी भावना थी। महाप्रभु भी उनके ऊपर परम कृपा रचाते थे। इनके क्षण क्षण में रूठने और क्रुद्ध होने के स्वभाव से वे पूर्णतः परीचित थे, इसीलिये इनसे कुछ भय भी करते थे। साधु-संन्यासी के लिये जिस प्रकार स्त्री स्पर्श पाप है, उसी प्रकार रूई भरे हुए गुदगुदे वस्त्र का उपयोग करना पाप है। इसीलिये महाप्रभु सदा केले के पत्तों पर सोया करते थे। वे दिन रात्रि श्रीकृष्ण विरह में छटपटाते रहते थे। आहार भी उन्होंने बहुत ही कम कर दिया था। इसी कारण उनका शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया था। उस क्षीण शरीर को केले के पत्तों पर पड़ा देखकर सभी भक्तों को अपार दुःख होता था, किन्तु प्रभु के सम्मुख कुछ कहने की हिम्मत ही किसकी थी? सब मन मसोसकर इस दारुण दुःख को सहते और विधाता को धिक्कारते रहते कि ऐसा सुकुमार सुन्दर स्वरूप देकर फिर इस प्रकार का जीवन प्रभु को प्रदान किया, यह उस निर्दयी दैव का क्रूर कर्म है।
जगदानन्द जी प्रभु की इस कठोरता से सदा असन्तुष्ट रहते और अपने भोले स्वभाव के कारण उनसे कभी-कभी इस प्रकार के हठों को त्यागने का आग्रह भी किया करते, किन्तु प्रभु मो धीर थे, वे भला किसी के कहने सुनने से न्यायमार्ग का कब परित्याग करने लगे। इसीलिये जगदानन्द जी के सभी प्रयत्न असफल ही होते, फिर भी वे अपने सीधे स्वभाव के कारण सदा प्रभु को सुखी रखने करने की चेष्टा किया करते।उन्होंने जब देखा कि प्रभु शरीर को केले के पत्तों पर कष्ट होता है तो वे बाजार से एक सुन्दर सा वस्त्र खरीद लाये। उसे गेरुए रंग में रँगकर उसके तोशक तकिये बनाये। स्वयं सेमर की रूई लाकर उन्होंने गद्दे, तकिये में भरी और उन्हें गोविन्द को ले जाकर दे दिया।गोविन्द से उन्होंने कह दिया- ‘इसे प्रभु के नीचे बिछा देना और ऊपर से उनका वस्त्र डाल देना।’
गोविन्द ने जगदानन्द जी की आज्ञा से डरते डरते ऐसा ही किया। महाप्रभु ने जब बिस्तर पर पैर रखा तभी उन्हें कुछ गुदगुदा सा प्रतीत हुआ। वस्त्र को हटाकर देखा तो उसके नीचे गद्दा बिछा है और एक रंगीन तकिया लगा हुआ है। गद्दे तकिये को देखकर प्रभु को क्रोध आ गया।उन्होंने उसी समय जोर से गोविन्द को आवाज दी। गोविन्द का दिल धड़कने लगा। वह सब कुछ समझ गया कि प्रभु ने गद्दे तकिये को देख लिया और अब न जाने मुझे क्या क्या कहेंगे। गोविन्द डरते डरते धीरे-धीरे किवाड़ की आड़ में जाकर खड़ा हो गया। प्रभु ने फिर आवाज दी- ‘गोविन्द ! कहाँ चला गया, सुनता नहीं।’
धीरे-धीरे काँपती आवाज में गोविन्द ने कहा- ‘प्रभो ! मैं उपस्थ्सित हूँ, क्या आज्ञा है?’
प्रभु ने अत्यन्त स्नेह से सने हुए शब्दों में प्रेमयुक्त रोष के साथ कहा- ‘तुम सब मिलकर मुझे धर्म भ्रष्ट करने पर तुले हुए हो। मैंने अपना शरीर तुम लोगों के अधीन कर रखा है, किन्तु तुम चाहते हो कि मैं विषय भोगों में आसक्त रहूँ। विषयों के उपभोग के लिये ही तो मैंने घर बार छोड़कर संन्यास लिया है, घर पर मैं विषय नहीं भोग सकता था। क्यों ठीक हैं न?’
गोविन्द ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया, वह चुपचाप नीचा सिर किये हुए खड़ा रहा। स्वरूपगोस्वामी एक ओर चुपचाप बैठे हुए प्रभु को पद सुनाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे भी चुप ही बैठे रहे। प्रभु फिर कहने लगे- ‘पता नहीं, ये लोग भजन-ध्यान सब शरीर सुख के ही लिये करते हैं क्या? दिन रात्रि मेरे शरीर की ही चिन्ता, भाई चैतन्य तो इस शरीर से पृथक हैं, वह तो नित्य सुखमय, आनन्दमय, और प्रेममय है। उसे ये संसारी पदार्थ भला क्या सुख पहुँचा सकते हैं। जिसे चैतन्य समझकर तुम सुखी बनना चाहते हो, वह तो अचैतन्य है, नश्वर है, क्षणभंगुर है, विनाशी और सदा बदलते रहने वाला है, इसी को सुखी बनाने को प्रयत्न करना महामूर्खता है।’
स्वरूप गोस्वामी चुपचाप सुनते रहे। प्रभु ने फिर उसी प्रकार रोष के स्वर में कहा- ‘क्यों रे गोविन्द ! तुझे यह सूझी क्या? तैंने क्या सोचा कि मैं गद्दा तकिया लगाकर विषयी पुरुषों की भाँति सोऊँगा? तू ठीक ठीक बता तुझे पैसे कहाँ मिले? यह वस्त्र किससे माँगा? सिलाई के दाम कहाँ से आये?’
गोविन्द ने धीरे से सिर नीचा किये ही उत्तर दिया- ‘प्रभो ! जगदानन्द पण्डित मुझे इन्हें दे गये हैं और उन्हीं की आज्ञा से मैंने इस बिछा दिया है।’
जगदानन्द जी का नाम सुनकर प्रभु कुछ सहम गये। उन्हें इसके उपयोग न करने का प्रत्यक्ष परिणाम आँखों के सामने दीखने लगा। उनकी दृष्टि में जगदानन्द जी की रोष भरी दृष्टि साकार होकर नृत्य करने लगी। महाप्रभु फिर कुछ भी न कह सके। वे सोचने लगे कि अब क्या कहूँ, उनका रोष कपूर की तरह एकदम न जाने कहाँ उड़ गया। हृदय के भावों के प्रवीण पारखी स्वरूप गोस्वामी महाप्रभु के मनोभाव को ताड़ गये।क्रमशः
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