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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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इसीलिये धीरे से कहने लगे- ‘प्रभो ! हानि ही क्या है, जगदानन्द जी को कष्ट होगा, इन्होंने प्रेमपूर्वक बड़े परिश्रम से इसे स्वयं बनाया है। सेमल की रूई है, फिर आपका शरीर भी तो अत्यंत ही निर्बल है, मुझे स्वयं इसे केले के पत्तों पर पड़ा हुआ देखकर कष्ट होता है।अस्वस्थावस्था में गद्दे का उपयोग करने मे तो मुझे कोई हानि प्रतीत नहीं होती। रुग्णावस्था को ही आपत्तिकाल कहते हैं और आपत्तिकाल में नियमों का पालन न हो सके तो कोई हानि भी नहीं। कहा भी है, ‘आपत्तिकाले मर्यादा नास्ति।’

प्रभु ने धीरे-धीरे प्रेम के स्वर में स्वरूप गोस्वामी को समझाते हुए कहा- ‘स्वरूप ! तुम स्वयं समझदार हो। तुम स्वयं सब कुछ सीखे हुए हो, तुम्हें कोई सिखा ही क्या सकता है। तुम सोचो तो सही, यदि संन्यासी इसी प्रकार अपने मन को समझाकर विषयों में प्रवृत्त हो जाय तो अन्त में वह धीरे धीरे महाविषयी बनकर पतित हो जायेगा। विषयों का कहीं अन्त ही नहीं। एक के पश्चात् दूसरी इच्छा उत्पन्न होती जाती है। जहाँ एक बार नियम से भ्रष्ट हुए वहाँ फिर नीचे की ओर पतन ही होता जाता है।पानी का प्रवाह ऊपर से एक बार छूटना चाहिये, बस फिर वह नीचे की ही ओर चलेगा। जिसके खूब साफ सुधरे वस्त्र होते हैं, वही धूलि, मिट्टी और गन्दी जगह में न बैठने की परवा करता है, जहाँ एक बार वस्त्र मैले हुए कि फिर कहीं भी बैठने में संकोच नहीं होता। फिर वह वस्त्रों की रही सही पवित्रता की भी परवा नहीं करता। इसलिये तुम मुझसे गद्दे पर सोने का आग्रह मत करो। आज गद्दा है तो कल पलंग भी चाहिये।परसों एक पैर दबाने वाले नौकर के रखने की आवश्यकता प्रतीत होगी। क्या इसीलिये मैंने संन्यास लिया है कि ये ही सब कुछ भोगता रहूँ।’ 
प्रभु के इस मार्मिक उपदेश को सुनकर स्वरूप गोस्वामी फिर कुछ भी नहीं बोले। उन्होंने गोविन्द से गद्दे तकिये को उठाने का संकेत किया। गोविन्द ने संकेत पाते ही वे मुलायम वस्त्र उठाकर एक ओर रख दिये। प्रभु उन्हीं पड़े हुए पत्तों पर लेट गये।दूसरे दिन स्वरूप गोस्वामी बहुत से केलों के खोपले उठा लाये और उन्हें अपने नखों से बहुत ही महीन चीर-चीर कर प्रभु के एक पुराने वस्त्र में भर दिया। बहुत कहने सुनने पर प्रभु ने उस गद्दे को बिछाना स्वीकार कर लिया।

जगदानन्द जी ने गोविन्द के द्वारा जब सब समाचार सुना तब तो उन्हें अत्यन्त ही क्षोभ हुआ, किन्तु उन्होंने अपना क्षोभ प्रभु के सम्मुख प्रकट नहीं होने दिया, प्रभु भी सब कुछ समझ गये, इसलिये उन्होंने गद्दे तकिये वाली बात फिर छेड़ी ही नहीं।जगदानन्द जी की बहु दिनों से वृन्दावन  जाने की इच्छा थी। उन्होंने प्रभु पर अपनी इच्छा प्रकट भी की थी, किन्तु प्रभु ने इन्हें वृन्दावन  जाने की आज्ञा नहीं दी। महाप्रभु जानते थे, ये सरल हैं, सीधे हैं, भोले हैं और संसारी बातों से एकदम अनभिज्ञ हैं। इन्हें देश, काल तथा पात्र देखकर बर्ताव करना नहीं आता।यों ही जो मन में आता है कह देते हैं। सब लोग क्या जानें कि इनके हृदय में द्वेष नहीं है, वे तो इनके क्रोधयुक्त वचनों को सुनकर इन्हें बुरा भला ही कहेंगे। ऐसे सरल मनुष्य को रास्ते में अत्यन्त ही क्लेश होगा। यही सब समझ सोचकर प्रभु इन्हें गौड़ भेज देते थे क्योंकि वहाँ के सभी भक्त इनके स्वभाव से परिचित थे, किन्तु वृन्दावन जाने की आज्ञा नहीं देते थे। अब जगदानन्द जी ने फिर निश्चय किया कि ‘प्रभु आज्ञा दे दें तो अवश्य व्रजमण्डल की यात्रा कर आवें। यह सोचकर उन्होंने एक दिन एकान्त में स्वरूप गोस्वामी से सलाह करके प्रभु से वृन्दावन जाने की आज्ञा माँगी।’

प्रभु ने कहा- ‘वैसे तो मैं आपको जाने के लिये अनुमति दे भी देता, किन्तु अब तो कभी अनुमति न दूँगा। मुझसे क्रुद्ध होकर जायँगे तो मेरा मन सदा उदास बना रहेगा।’
जगदानन्द जी ने प्रेमयुक्त मधुर वाणी से कहा- ‘प्रभो ! आप पर भला कोई क्रोध कर सकता है। फिर मैं तो आपका सेवक हूँ। मैं सच्चे हृदय से कह रहा हूँ, क्रोध करके मैं नहीं जाता हूँ। मेरी तो बहुत दिनों से इच्छा थी। उसे आपके सम्मुख भी कई बार प्रकट कर चुका हूँ।’
इस पर बात का समर्थन करते हुए स्वरूप दामोदर जी कहने लगे- ‘हाँ प्रभो ! इनकी बहुत दिनों की इच्छा है। भला, ये आप पद कभी क्रुद्ध हो सकते हैं। गसैड़ भी तो ये प्रतिवर्ष जाया ही करते हैं, इसी प्रकार इन्हें व्रज जाने की आज्ञा दे दीजिये।’
जगदानन्द जी बोले- ‘हाँ प्रभो ! वृन्दावन की पावन धूलि को मस्तक पर चढ़ाने की मेरी उत्कृष्ट इच्छा है, आपकी आज्ञा के बिना जा नहीं सकता।’
प्रभु ने कहा- ‘अच्छी बात है, आपकी उत्कृष्ट इच्छा है जो जाइये, किन्तु इतना ध्यान रखना कभी किसी से विशेष बातें न करना। यहाँ से काशी जी तक तो कोई भय नहीं। आगे डाकू मिलते हैं, वे बंगाली समझकर आपको मार ही डालेंगे। इसलिये वहाँ से किसी धर्मात्मा क्षत्रिय के साथ जाना। वृन्दावन में सदा सनातन के साथ ही रहना। उन्हीं के साथ तीर्थ और वनों की यात्रा करना।साधु महात्माओं को दूर से ही प्रणाम करना। उनसे बहुत अधिक सम्पर्क न रखना और न उनके साथ अधिक दिन ठहरना ही। व्रज की यात्रा करके शीघ्र ही लौट आना। सनातन से कह देना, मैं भी व्रज आऊँगा, मेरे लिये कोई स्थान ठीक कर लें। इस प्रकार उन्हें भाँति-भाँति से समझा बुझाकर वृन्दावन के लिये विदा किया।

जगदानन्द जी सभी गौर भक्तों की वन्दना करके और महाप्रभु की चरणरज सिर पर चढ़ाकर झाड़ीखण्ड के रास्ते से वृन्दावन की ओर चलने लगे। भिक्षा माँगते खाते वे काशी, प्रयाग होते हुए वृन्दावन पहुँचे। वहाँ रूप सनातन दोनों भाइयों ने इनका बड़ा सत्कार किया। ये सदा सनातन गोस्वामी के साथ ही रहते थे।उन्हीं को साथ लेकर इन्होंने व्रजमण्डल के बारहों वनों की यात्रा की। सनातन जी घर घर से भिक्षा माँग लोते थे और इन्हें लाकर दे देते थे और और ये अपना बना लेते थे। सनातन जी तो स्वयं व्रजवासियों के घरों से टुकड़े माँगकर ले आते थे और उन्हीं पर निर्वाह करते थे। कभी जगदानन्द जी के समीप भी प्रसाद पा लेते थे।सब वनों के दर्शन करते हुए ये महावन होते हुए गोकुल में आये।क्रमशः

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