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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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गोकुल में ये दोनों यमुना जी के तट पर एक गुफा में ठहरे। रहते तो दोनों गुफा में थे किन्तु भोजन के लिये जगदानन्द जी तो एक मन्दिर में जाते थे और वहाँ अपना भोजन अपने हाथ ये बनाकर पाते थे।सनातन जी महावन में से जाकर मधुकरी कर लाते थे। तब तक गोकुल इतना बड़ा गाँव नहीं बना था। गोस्वामियों की ही दो तीन बैठकें तथा मन्दिर थे। इसीलिये भिक्षा के लिये इन्हें डेढ़ दो मील रोज जाना पड़ता था।
एक दिन जगदानन्द जी ने सनातन जी का निमन्त्रण किया। सनातन जी तो समान दृष्टि रचाने वाले उच्च कोटि के भक्त थे। वे संन्यासी मात्र को चैतन्य का ही विग्रह समझकर उनके प्रति उदार भाव रखते थे।वे अपने गुरु में और श्रीकृष्ण में कोई भेदभाव नहीं मानते थे, इसलिये उन्होंने श्री चैतन्य देव को श्रीकृष्ण या अवतारी सिद्ध न करके श्रीकृष्ण लीलाओं का ही वर्णन किया है। उनकी दृष्टि में श्रीकृष्ण और चैतन्य में कोई भेदभाव होता तब तो वे सिद्ध करने की चेष्टा करते।मुकन्द सरस्वती नाम के एक संन्यासी थे, उन्होंने सनातन गोस्वामी को एक अपने ओढ़ने का गेरुए रंग का वस्त्र दिया था। सनातन जी तो एक गुदड़ी के सिवा कुछ रखते नहीं थे, उसे महात्मा की प्रसादी समझकर उन्होंने रख छोड़ा।
उस दिन जगदानन्द जी के निमन्त्रण में उसी वस्त्र को सिर से बाँधकर गये। सनातन जी के सिर पर गेरुए रंग का वस्त्र देखकर जगदानन्द जी ने समझा कि यह प्रभु का प्रसादी वस्त्र है, अतः बड़े ही स्नेह के साथ पूछने लगे- ‘सनातन जी ! आपने यह प्रभु का प्रसादी वस्त्र कहाँ पाया?
सनातन जी ने सरलता से कहा- ‘यह प्रभु की प्रसादी नहीं है। मुकुन्द सरस्वती नामक एक बड़े अच्छे संन्यासी हैं, उन्होंने ही यह वस्त्र मुझे दिया है।’
इतना सुनते ही जगदानन्द जी का क्रोध उमड़ पड़ा। वे भला इस बात को कब सहन कर सकते थे कि गौर भक्त होकर दूसरे संन्यासी के वस्त्र को सिर पर चढ़ावे। उनका आदर केवल चैतन्य देव के ही वस्त्र में सीमित था।जो कोई उसका आदर छोड़कर और का आदर करता है, उनकी दृष्टि में वह बुरा काम करता है। इसीलिये क्रोध में वे चूल्हे की हाँडी को उठाकर सनातन जी को मारने दौड़े। सनातन जी उनके ऐसे व्यवहार को देखकर लज्जित से हो गये। जगदानन्द जी ने भी हाँडी को चूल्हे पर रख दिया और अपनी बात के समर्थन में कहने लगे- ‘आप महाप्रभु के प्रधान पार्षदों में से हैं। भला, इस बात को कौन गौर भक्त सहन कर सकेगा कि आप किसी दूसरे संन्यासी के वस्त्र को सिर पर चढ़ावें।’
इस बात को सुनकर हँसते हुए सनातन जी कहने लगे- ‘मैं दूर से ही आपकी एकनिष्ठा की बातें सुना करता था, किन्तु आज प्रत्यक्ष आपकी निष्ठा का परिचय प्राप्त हुआ। श्रीचैतन्य चरणों में आपका इतना दृढ़ अनुराग है उसका लेशमात्र भी मुझमें नहीं है। आपकी एकनिष्ठा को धन्य है। मैंने तो वैसे ही आपको के लिये इसे पहन लिया था कि आप क्या कहेंगे?वैसे तो मैं गरुए वस्त्र का अधिकारी भी नहीं हूँ। वैष्णव को गेरुए वस्त्र का आग्रह ही नहीं होता।’ इस प्रकार इन्हें समझा बुझाकर शान्त किया। जगदानन्द जी की यह निष्ठा बुरी नहीं थी। किन्तु यही साध्य नहीं है। साध्य तो यही है कि वे गेरुए वस्त्र मात्र में चैतन्य के वस्त्र का अनुभव करते, उसमें शंका का स्थान ही न रह जाता।यदि कहें कि पतिव्रता स्त्री की भाँति पर पुरुष का मुख देखना जिस प्रकार पाप है उसी प्रकार मधु रस के उपासकों की अपने इष्टदेव के प्रति निष्ठा ही सर्वोत्तम कही जाती है, सो ठीक नहीं है। कारण कि पतिव्रता की दृष्टि में तो पति के सिवा संसार में कोई है ही नहीं। उसके लिये तो पति ही सर्वस्व है। पति को छोड़कर दूसरा कोई तीर्थ उसके लिये है ही नहीं।परकीया भाव में ऐसी निष्ठा प्रायः देखी जाती किन्तु उसमें भी संकीर्णता नहीं। वह भी संसार के सम्पूर्ण सौन्दर्य में अपने स्वामी के सौन्दर्य का ही मान करती है। जैसे श्रीकृष्ण के अन्तर्धान हो ताने पर गोपियों ने लता पत्ता और जीव जन्तुओं में श्रीकृष्णस्पर्शजन्य आनन्द का ही अनुभव किया। अस्तु, हमारा मतलब इतना ही है कि हमारी दृष्टि में यह प्राकृत निष्ठा है। उत्तम निष्ठा इससे दूर है, किन्तु इसके द्वारा उसकी प्राप्ति हो सकती है।
जगदानन्द जी कुछ काल व्रज में रहकर महाप्रभु के समीप पुरी में जाने की तैयारियाँ करने लगे। प्रभु के लिये सनातन जी के रासलीला-स्थली की रज, गोवर्धन पर्वत की शिला, गुंजाओं की माला और पके हुए सूखे पीलू ये चीजें प्रसाद के लिये दीं। इन अकिंचन, त्यागी, भिक्षुक भक्तों की ये ही चीजें सर्वस्व थीं। टैंटी और पीलू व्रज में अधिक होते हैं।बंगाल में तो लोग इन्हें पहचानते ही नहीं। पीलू बहुत कड़वा होता है और टैंटी उससे भी अधिक कड़वी। टैंटी का अचार ठीक पड़ता है। पकी टैंटी को व्रज में पैंचू बोलते हैं। देखने में वह लाल-लाल बड़ी ही सुन्दर मालूम पड़ती है, किन्तु खाने में ठीक आती है।व्रज की गौ चराने वाले ग्वाल पैंचू और पके पीलू खाया करते हैं। उनमें बीज ही बीज भरे रहते हैं। रस तो बहुत थोड़ा बीज में लगा हुआ होता है। बीजों में के रस को चूसकर ‘शरीफे’ के बीजों की भाँति उन्हें थूक देते हैं। ये ही व्रज के मेवा हैं। श्रीकृष्ण भगवान को ये ही बहुत प्रिय थे। क्यों प्रिय थे, इसका क्या पता ? इसी से जो खीजकर किसी भक्त ने कहा है-
काबुल में मेवा करी, ब्रज में टैंटी खायँ।
कहूँ कहूँ गोपाल का, भूलि सिटल्ली जायँ।
अस्तु, जगदानन्द जी सनातन जी के दिये हुए प्रसाद को लेकर, उनसे विदा होकर पुरी आये। प्रभु इन्हें सकुशल लौटा हुआ देखकर परम प्रसन्न हुए। इन्होंने सनातन जी की दी हुई सभी चीजें प्रभु के अर्पण कीं। प्रभु ने सभी को श्रद्धापूर्वक सिर पर चढ़ाया। सब चीजें तो प्रभु ने रख लीं, पीलुओं को उन्होंने भक्तों में बाँट दिया।भक्तों ने ‘वृन्दावन के फल’ समझकर उन्हें बड़े आदर से ग्रहण किया। एक तो वृन्दावन के फल फिर महाप्रभु के हाथ से दिये हुए सभी भक्त बड़े चाव से खाने लगे। जो पहले वृन्दावन हो आये थे वे तो जानते थे कि ये अमृतफल किस प्रकार खाये जाते हैं,
क्रमशः
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