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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इसलिये वे तो मुँह में डालकर उनकी गुठलियों को धीरे-धीरे चूसने लगे। जो नहीं जानते थे वे जल्दी में मुँह में डालकर चबाने लगे। चबाते ही मुँह जहर कड़वा हो गया, नेत्रों में पानी आ गया। सभी सी-सी करते हुए इधर उधर दौड़ने लगे। न तो खाते बनता था। न थूकते ही। वृन्दावन के प्रभुदत्त प्रसाद को भला थूकें कैसे और खाते हैं तो प्राणों पर बीतती है। खैर, जैसे तैसे जल के साथ भक्त उन्हें निगल गये।
प्रभु हँसते-हँसते कह रहे थे- ‘व्रज का प्रसाद पाना कोई सरल नहीं है। जो विषय भोगों को ही सर्वस्व समझ बैठे हैं, उनको न तो व्रज की भूमि में वास करने का अधिकार है और न व्रज के महा प्रसाद को पाने का ही। व्रजवासी बनने का सौभाग्य तो उसे ही प्राप्त हो सकेगा जिसकी सभी वासनाएँ दूर हो गयी होंगी।’
इस प्रकार जगदानन्द जी के आने से सभी भक्तों को बड़ी प्रसन्नता हुई, वे उसी प्रकार सुखपूर्वक फिर प्रभु के पास रहने लगे। जगदानन्द जी का हृदय शुद्ध था, उनका प्रभु के प्रति प्रगाढ़ प्रेम था। वे प्रभु के शरीर से ही अत्यधिक प्रेम करते थे। यह ठीक भी है। जिस कागज पर चित्र बना हुआ है उस कागज को यदि कोई प्यार करता है तो वह एक-न-एक दिन उस पर खिंचे हुए चित्र के सौन्दर्य से भी प्यार करने लगेगा।जो सौन्दर्य को ही सर्वस्व समझकर कागज को व्यर्थ समझकर फेंक देता है तो कागज तो उसके हाथ से चला ही जाता है, साथ ही उसपर खिंचा हुआ चित्र और उसमें का सौन्दर्य भी उसे फिर कभी नहीं मिल सकता। यह हो नहीं सकता कि हम घृत से तो प्रेम करें और जिस पात्र में घृत रखा है उसकी उपेक्षा कर दें।
यपात्र के साथ घृत का आधाराधेय भाव का सम्बन्ध है। आधेय से प्रेम करने पर आधार से अपने-आप ही प्रेम हो जाता है। आधार का प्रेम ही आधेय के प्रेम को प्राप्त करा सकता है। यही सर्वशास्त्रों का सिद्धान्त है।
श्री रघुनाथ भट्ट को प्रभु की आज्ञा…
परमहंस रामकृष्ण देव एक कथा कहा करते थे– ‘एक बगीचें में बहुत से साधु पड़े हुए थे। वहाँ एक परम सुन्दरी स्त्री दर्शनों के लिये गयी। सभी साधु परम विरक्त थे, उन सबके गुरु आजन्म ब्रह्मचारी थे, इसलिये उन्होंने शिष्य भी ऐसे ही किये कि जिन्होंने जन्म से ही संसारी सुख न भोगा हो। वे सभी स्त्रीसुख से अनभिज्ञ थे।इसलिये उनके मन में उस माता के दर्शन से किसी प्रकार का विकार नहीं हुआ। उनमें से एक ने पहले स्त्रीसुख भोगा था, इसलिये उस माता के दर्शन से उसकी छिपी हुई कामवासना जाग्रत हो उठी। वह विषय सुख की की इच्छा करने लगा।इस कथा को कहकर वे कहते– ‘देखो, जिस वर्तन में एक बार दही जम चुका है, उसमे दूध के फटने का सन्देह ही बना रहता है, जो घड़ा कोरा है उसमें कोई भय नहीं। इसी प्रकार जो विषय सुख से बचे हुए है, वे कोरे घड़े के समान हैं।’
इसके उदाहरण में वे अपने युवक भक्तों में से नरेन्द्र (विवेकानन्द) आदि का दृष्टान्त देकर कहते– ‘सर्वोत्तम तो यही है कि संसारी विषयों से एकदम दूर रहा जाय।विषय ही बन्धन के हेतु हैं।’ महाप्रभु चैतन्यदेव भी जिसे वासनाहीन अधिकारी समझते उसे संसार में प्रवेश करने को मना कर देते और आजन्म ब्रह्मचारी रहकर श्रीकृष्ण कीर्तन करने का ही उपदेश देते। विरक्त भक्तों को तो वे स्त्रियों से तनिक भी संसर्ग न रखने की शिक्षा देते रहते। स्वयं कभी भी न तो स्त्रियों की ओर आँख उठाकर देखते और न उनके अंग का ही कभी स्पर्श करते।
एक दिन की बात है कि आप टोटा यमेश्वर को जा रहे थे। उसी समय रास्ते में एक देवदासी कन्या अपने कोकिलकूजित कमनीय कण्ठ से महाकवि जयदेव के अमर काव्य गीत गोविन्द के पद को गाती जा रही थी। वसन्त का सुहावना समय था, नारीकण्ठ की मधुरिमा से मिश्रित उस त्रैलोक्य पावन पद को सुनते ही प्रभु का मनमयूर नृत्य करने लगा। उनके कानों में–
चन्दनचर्चितनीलकलेवरपीतवसनवनमाली।
केलिचलन्मणिकुण्डलमण्डितगण्डयुगस्मितशाली।
अर्थात-
एक सखी दूसरी सखी से कह रही है– ‘सखि ! देख तो सही, इन श्री हरि की कैसी अपूर्व शोभा है ! नील रंग के सुकोमल कलेवर पर सुगन्धित चन्दन लगा हुआ है, शरीर में पीले वस्त्र पहने हैं, गले में मनोहर वनमाला पड़ी हुई है। रासक्रीड़ा के समय कांचनमय मकर कुण्डल हिल हिलकर कमनीय कपोलों को अधिक शोभायुक्त बना रहे हैं और वे मन्द-मन्द मुसकाते हैं।’
यह पदावली एक प्रकार की मादकता का संचार करने लगी। अपने प्रियतम के ऐसे सुन्दर स्वरूप का वर्णन सुनते ही वे प्रेम में विह्वल हो गये और कानों में सुधा का संचार करने वाले उस व्यक्ति को आलिंगन करने के लिये दौड़े।प्रेम के उद्रेक में वे स्त्री-पुरुष का भाव एकदम भूल गये। रास्ते में कांटों की बाढ़ लगी हुई थी, उसका भी ध्यान नहीं रहा। पैर में कांटे चुभते जाते थे किन्तु आप उनकी कुछ भी परवा न करके उस पद की ही ओर लक्ष्य करके दौड़े जा रहे थे।पीछे आने वाले गोविन्द ने जोरों से दौड़कर और प्रभु को रोककर कहा– ‘प्रभो ! यह आप क्या कर रहे है, देखते नहीं हैं यह तो स्त्री है।’
‘स्त्री है’, इतना सुनते ही प्रभु सहम गये और वहीं गिरकर बडे ही करुणस्वर में अधीरता के साथ कहने लगे– ‘गोविन्द ! मैं तेरे इस उपकार के लिये सदा ऋणी रहूँगा, तूने आज मुझे स्त्री-स्पर्शरूपी पाप से बचाया। यदि समचमुच मैं भूल से भी स्त्री स्पर्श कर लेता तो समुद्र में कूदकर आज ही अपने प्राणों को गंवा देता।’
प्रभु की ऐसी दीनतायुक्त बातें सुनकर गोविन्द ने लज्जित भाव से कहा– ‘प्रभो ! आपकी रक्षा करने वाला मैं कौन हूँ, जगन्नाथ जी ने ही आपकी रक्षा की है। मैं भला किस योग्य हूँ?’
महाप्रभु फिर आगे नहीं गये और लौटकर उन्होंने यह बात अपने सभी विरक्त भक्तों के सम्मुख कही और गोविन्द की भूरि भूरि प्रशंसा करने लगे। तभी आपने गोविन्द से कहा– ‘गोविन्द ! तुम सदा मेरे साथ ही रहा करो। मुझे अब शरीर का होश नहीं रहता। पता नहीं, किस समय मैं क्या अनर्थ कर बैठूँ।’
काशीवासी पण्डित तपन मिश्र के पुत्र रघुनाथ भट्टाचार्य प्रभु के अनन्य सेवक थे।
क्रमशः
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